आनंद
वनवासी कल्याण आश्रम स्थापना से लेकर आज तक जनजाति समाज की शिक्षा के लिए निरंतर कार्यरत है। सुदूर वन क्षेत्र में शिक्षा की आवश्यकता को देख हमने ‘शिक्षा आयाम’ को एक महत्वपूर्ण अंग मानते हुए कार्य को गतिमान किया है। वर्तमान में औपचारिक और अनौपचारिक ऐसे दो प्रकार के प्रयासों द्वारा शिक्षा प्रसार हो रहा है।
हम सब जानते है कि 05 सितम्बर को देश भर में ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है। भारतरत्न डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिन है। एक भारतीय के नाते हमारे लिए यह एक गौरव है। वे महान दार्शनिक थे और एक समय था जब पश्चिमी विद्वानों ने हिन्दू धर्म की आलोचना की, तब इन्होंने ही हिन्दू धर्म का पक्ष रखा था। वे अपने जीवन काल में कई शिक्षा संस्थानों में कुलपति के पद पर कार्यरत रहे। अर्थात् शिक्षा के प्रति समर्पित व्यक्ति के जन्मदिन पर ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है।
मैं मानता हूं कि ‘शिक्षक दिवस’ जैसे निमित्त हम ‘शिक्षक’ के बारे में सहचिंतन करें तो वह प्रासंगिक होगा। शिक्षक अपने आचरण से शिक्षा के साथ संस्कार प्रवाह को भी प्रवाहित करता है। इसलिए उसे आचार्य भी कहते हैं। शिक्षा के साथ संस्कार की यह बात, व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करती है। आज भी सुदूर वनांचलों में शिक्षकों की बहुत आवश्यकता है। शिक्षक की प्रतिमा में यदि कहीं क्षय हुई हो तो उसके लिए भी शिक्षक स्वयं ही जिम्मेवार है। यदि निःस्वार्थ भाव के साथ कार्य करते हुए उसने समाज के सामने अपना आदर्श प्रस्तुत किया तो आज भी ऐसे लाखों परिवार होंगे जो अपने पुत्र को शिक्षक के चरणस्पर्श करने के लिए कहते हैं। छोटे-छोटे गांवों में आज भी ‘गुरूजी’ कहते हुए शिक्षक के प्रति अत्यंत आदर देखने को मिलता है।
मैंने कई एसे विद्यार्थी देखे हैं कि दस-बीस वर्ष के पश्चात भी प्राथमिक शाला के शिक्षक को मिलते हैं तो चरणस्पर्श करने में संकोच नहीं करते। इसी में उस शिक्षक की साधना के दर्शन होते हैं। एक विद्यार्थी के मन में अपने शिक्षक के प्रति जो पवित्र भाव है, उसका वह प्रगटीकरण है।
वैसे भी अपनी संस्कृति में गुरू को भगवान के रूप में देखा है। यदि गुरू और भगवान एक साथ मिले तो पहला प्रणाम गुरू को, (गुरु गोबिंद दोऊ खड़े……) यह विचार हमने सुना होगा। वैसे गुरू की संकल्पना शिक्षक की संकल्पना से कई अधिक ऊपर कह सकते हैं। शिक्षक विद्यार्थी को शिक्षित करता है और गुरू अपने शिष्य को जीवन के बारे में मार्गदर्शन करता है। फिर भी समाज में सर्वसामान्य मान्यता है कि शिक्षक और गुरू एक समान है। कहीं-कहीं व्यक्ति के बदले विचार को, तत्व को, ग्रंथ को गुरू के रूप में स्थान मिला है।
नगरों के विद्यालयों में अच्छी व्यवस्थाओं के बीच शिक्षक काम करते है। अच्छे मानदेय से लेकर विभिन्न प्रकार की सम्पन्नता उनके जीवन में देखने को मिलती है। परंतु उसी समय वन-पर्वतों में बहुत ही कम व्यवस्थाओं के बीच कई शिक्षक काम कर रहे हैं। शिक्षक कहीं सरकारी विद्यालयों में तो कहीं सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शिक्षक की भूमिका निभा रहे हैं।
वनवासी कल्याण आश्रम के शिक्षा आयाम द्वारा भी कई कार्यकर्ता शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। हमारे द्वितीय अध्यक्ष जगदेवराम उरांव भी प्रारंभिक समय में कल्याण आश्रम के विद्यालय में व्यायाम शिक्षक के रूप में जशपुर में कार्य करते थे। वे संस्कृत भी पढ़ाते थे। उनकी पढ़ाने की शैली के चलते वे विद्यार्थियों के बीच प्रिय शिक्षक के रूप में जाने जाते थे।
एक बार, मैंने कल्याण आश्रम के एक कार्यकर्ता को पूछा कि सरकारी नौकरी मिली थी, फिर भी उसके बदले कल्याण आश्रम में काम करना पसंद किया, ऐसे किसी कार्यकर्ता को हम मिल सकते हैं? स्मित हास्य करते हुए कार्यकर्ता ने कहा कि दूसरे किसी को क्यों, मैंने स्वंय ही कभी सरकारी नौकरी के बदले कल्याण आश्रम के विद्यालय में शिक्षक के नाते काम करने हेतु संकल्प किया और आज भी काम कर रहा हूं। ऐसे एक नहीं, दो नहीं कई कार्यकर्ताओं के उदाहरण हम दे सकते हैं जो शिक्षा के क्षेत्र को ‘एक जीवन व्रत’ मानते हुए शिक्षक के रूप में सुदूर वन क्षेत्र में कार्यरत हैं।
केवल अर्थ उपार्जन के लिए शिक्षक की नौकरी करना कोई बड़ी बात नहीं है। वह तो कोई भी कर सकता है। परंतु जीवन की सुख-सुविधा छोड़ कर, सभी प्रकार की असुविधा होते हुए भी जंगल के किसी विद्यालय में शिक्षक के रूप में काम करना सच में अभिनंदनीय है। जंगल में किसी पेड़ के नीचे अथवा किसी मंदिर के प्रांगण में कई एकल विद्यालय अथवा संस्कार केन्द्र आज भी चल रहे हैं। कभी ऐसे एकल विद्यालय को देखने जाना चाहिए। वहां अलग-अलग कक्षा के बालक-बालिकाओं को एक साथ तीन-चार घण्टों के लिए पढ़ाना कोई सामान्य बात नहीं है। यह एक प्रकार से माता सरस्वती की साधना है। किसी भी व्यक्ति के मन में निःस्वार्थ भावना को वह और अधिक बल देती है।
समाज परिवर्तन में भी शिक्षक की भूमिका बड़ी ही महत्वपूर्ण होती है। वह व्यक्ति, समाज, देश और राष्ट्र सभी के मन को आंदोलित करते हुए परिवर्तन करने की क्षमता रखता है। व्यक्ति अनुकूल एवं प्रतिकूल, दोनों परिस्थितियों में अडिगता के साथ चट्टान की तरह खड़ा रहे, ऐसा मनोबल शिक्षक के परिश्रम का ही परिणाम कह सकते हैं।
चाणक्य ने एक बात कही थी – शिक्षक कभी सामान्य नहीं होता। प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं। यह वचन ‘शिक्षक’ होने का महत्व बताता है। अंत में हम तो बस इतना ही कहते हैं कि जिस किसी युवा के मन में सुदूर वन क्षेत्र में, जंगल-पहाड़ों में शिक्षक के रूप में आना हो तो वनवासी कल्याण आश्रम आपका स्वागत करता है।
ऐसे संकल्प से शिक्षक दिवस को सार्थक करें। इति शुभम् !

