
भगवान राम ने ‘रामाराम’ में की थी भू-देवी की पूजा
आज से शुरू हुई जात्रा, 700 वर्ष से लग रहा है मेला*बस्तर के सुकमा जिले में स्थित रामाराम मे चिटमिट्टीन अम्मा देवी का प्राचीन मंदिर स्थित है। स्थानीय जनजातीय लोगों में देवी मां के प्रति गहरी आस्था है। जिस कारण रामाराम सुकमा का महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। हर वर्ष यहां मेला भरता है और चितमिट्टिन माता की जात्रा निकाली जाती है। आज से रामाराम में तीन दिवसीय जात्रा शुरू हुई है। जो 4 फरवरी तक चलेगी। मेले का आयोजन देवी मां चितमिट्टिन अम्मा मंदिर ट्रस्ट करता है।

इस मंदिर और स्थान को लेकर मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम अपने वनवास काल के दौरान दक्षिण की ओर बढ़ने के दौरान रामाराम पहुँचे थे। श्री राम ने यहां भू-देवी की आराधना की थी। पास ही एक पहाड़ी पर श्रीराम के पदचिह्न बने हुए हैं।छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम अपने वनगमन के समय कुटुमसर से सुकमा होते हुए शबरी नदी के तट पर स्थित रामाराम पहुंचे थे। आज यह स्थल माँ रामारामीन चिटमिट्टीन अम्मा देवी मंदिर से क्षेत्र के तौर पर प्रसिद्ध है।
मान्यता है कि रामाराम में तीन देवीयों का मिलन होता है, जो आपस में बहनें हैं। इनमें माता चिटमिट्टीन, रामारामिन और मुजरिया छिन्दगढ़ का मिलन यहां होता है। इन सभी का स्वागत आदिवासी परम्पराओं के साथ होता है।बीते 708 सालों से यहां मेले का आयोजन होता आ रहा है। सुकमा जमीदार परिवार रियासत काल से यहां देवी-देवताओं की पूजा करता आ रहा है। रामारामिन देवी सुकमा जमीदारो की इष्ट देवी हैं।
यहां पर प्रतिवर्ष फरवरी माह में भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें क्षेत्र के श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर माता के दर्शन करते है। सुकमा जिले में लगने वाला यह पहला और सबसे बडा मेला होता है। इसके बाद पूरे क्षेत्र में मेले का दौर प्रारंभ होता है। रामाराम मेले में पूरे बस्तर समेत ओडिशा, तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश से भक्त पहुंचते हैं। प्रचलित कथाओं के मुताबिक यहां पर भगवान श्रीराम ने भू-देवी की पूजा-अर्चना की थी। जिसके बाद यहा का नाम रामाराम पड़ा था और यही कारण है कि क्षेत्र के लोग शुभ कार्य शुरू करने से पहले मिट्टी की पूजा करते हैं।
बस्तर के इतिहास के अनुसार 708 सालों से यहां मेला आयोजन होता आ रहा है। इस मेले के बाद पूरे इलाके में मेले भरने का दौर जारी हो जाएगा। यहां पर आसपास के 100 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है।यह मेला केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं बल्कि बस्तर की सभ्यता-संस्कृति, लोककला और लोक उत्सव का भी परिचायक है। यह जात्रा आपसी मेलमिलाप, व्यापार, मनोरंजन, पर्यटन का भी आधार है।
प्रियंका कौशल
पत्रकार
