भारतीय चिंतन में पूर्वजों का स्थान एवं पितृऋण की अवधारणा

पितृपक्ष की प्रतीक्षा साल भर रहती है, इस पक्ष में अपने पितरों का श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। नियत तिथि पर तर्पण होता है, श्राद्ध किया जाता है। …

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छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में पितर पाख

गणेश पक्ष आते ही पितर पाख की आहट सुनाई देने लगती है, क्योंकि इस पाख में पितरों का आगमन होता है और उनका श्रद्धापूर्वक उन्हें याद करते हुए श्राद्ध किया …

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“नारी सशक्तिकरण के पुरोगामी : बेचे थाको विद्यासागर चिरंजीबी होए”

(26 सितम्बर जयंती पर सादर समर्पित) “बेचे थाको विद्यासागर चिरंजीबी होए”-जीते रहो विद्यासागर, चिरंजीवी हो!यह बंगाल के साड़ी बुनकर – साड़ियों में बुनते थे,इसे आधुनिक भारत में नारी सशक्तिकरण के …

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राजनीति राष्ट्र के लिए : पं. दीनदयाल उपाध्याय का राजनीतिक दर्शन

भारतीय राजनीति के वृहदाकाश में दैदीप्यमान पं. दीनदयाल उपाध्याय अपने राष्ट्रीय विचारों और प्रखर चिंतक, विचारक के तौर पर लब्धप्रतिष्ठित हैं। सनातन हिन्दू संस्कृति के मुखर पक्षधर और तदानुरुप रीति-नीति …

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सम्राट चन्द्रगुप्त से एकात्म मानवदर्शन तक पं दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की यात्रा

दीनदयाल उपाध्याय का नाम स्मरण में आते ही एकात्म मानवदर्शन सामने आ जाता है, लेकिन इस विचार तक पहुंचने से पहले उनकी कलम कई अलग-अलग विषयों से होकर गुजर चुकी …

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द्रोण–एकलव्य का मिथ्यांकन : भारतीय स्मृति पर वामपंथी वैचारिक आक्रमण – कैलाशचंद्र

भारतीय संस्कृति पर आक्रमण तलवारों से नहीं, कथाओं से हुआ है। जो सभ्यता पाँच हज़ार वर्ष तक किसी विदेशी साम्राज्य के सामने नहीं झुकी, वह बीते पचास वर्षों में एक …

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व्यक्ति ‘धर्मप्रवण’ बने और समाज धर्माधिष्ठित रहे (धर्म निरपेक्ष नहीं)

रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहा है कि समाज को देना ‘चैरिटी’ है और समाज को वापस लौटाना ‘धर्म’ है। भारत सदियों से यही परंपरा निभाता आया है। तीर्थयात्रियों के रहने के …

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अंत्योदय से विकसित भारत तक : दीनदयाल जी के विचारों की यात्रा

“एक बीज जड़ों, तनों, शाखाओं, पत्तियों, फूलों और फलों के रूप में व्यक्त होता है, फिर भी हम बीज के माध्यम से उसकी एकता को पहचानते हैं।”— पंडित दीनदयाल उपाध्याय …

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