राष्ट्रवाद के शंखनाद के साथ संपन्न हुआ छह दिवसीय महोत्सव

बोड़ला में हिंदू संगम का ऐतिहासिक समापन : मौनी अमावस्या पर उमड़ा जनसैलाब, शिव मंदिर का हुआ भूमिपूजन

माननीय सह सरकार्यवाह श्री रामदत्त चक्रधर जी ने दी सामाजिक समरसता की सीख

बोड़ला/कबीरधाम। धर्मनगरी बोड़ला की पावन धरा पर आयोजित 6 दिवसीय हिंदू संगम का रविवार, मौनी अमावस्या को गौरवशाली समापन हुआ। अंतिम दिन बोड़ला में श्रद्धा और राष्ट्रवाद का ऐसा ज्वार उमड़ा कि समूचा क्षेत्र भगवामय नजर आया। इस ऐतिहासिक धर्मसभा में मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री रामदत्त चक्रधर, प्रांत संघचालक डॉ टोपलाल वर्मा एवं सभी समाज के समाज प्रमुख सहित बड़ी संख्या में सनातनी उपस्थित रहे।

चंद्रशेखर वर्मा ने हिंदू संगम के उद्देश्य को बताया

कार्यक्रम के दौरान युवाओं को विशेष रूप से संबोधित करते हुए चंद्रशेखर वर्मा ने हिंदू संगम आयोजन के उद्देश्यों और इसकी विस्तृत रूपरेखा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस आयोजन का मूल लक्ष्य समाज को अपनी जड़ों से जोड़ना और सांस्कृतिक गौरव को वापस लाना है। वर्मा ने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा, धर्म और राष्ट्र का निर्माण एक-दूसरे के पूरक हैं। युवाओं को अपनी ऊर्जा का उपयोग समाज को संगठित करने और सनातन मूल्यों की रक्षा के लिए करना चाहिए।

श्री रामदत्त चक्रधर जी का उद्बोधन: संगठित हिंदू ही सुरक्षित भारत की गारंटी

मुख्य वक्ता रामदत्त चक्रधर जी ने हजारों की संख्या में उपस्थित सनातनी बंधुओं को संबोधित करते हुए कहा कि हिंदू समाज को जाति और पंथ के बंधनों से ऊपर उठकर राष्ट्र की एकता के लिए कार्य करना होगा। उन्होंने कहा कि हिंदू केवल एक पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक जीवन मूल्य है। जब हम संगठित होते हैं, तो दुनिया हमारी ओर सम्मान से देखती है। स्वदेशी, स्वावलंबन और पारिवारिक संस्कार ही हमारे समाज के असली कवच हैं। आज यहां उपस्थित माताओं-बहनों और युवाओं का यह उत्साह बताता है कि भारत अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। सह सरकार्यवाह श्री रामदत्त जी ने हुंकार भरते हुए कहा कि हिंदू समाज की एकता ही राष्ट्र की अखंडता का आधार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब-जब हिंदू संगठित हुआ है, भारत ने विश्व पटल पर गौरव प्राप्त किया है। मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं और श्रीमद्भागवत के श्लोकों के माध्यम से उन्होंने हजारों की संख्या में उमड़े जनसैलाब को राष्ट्र धर्म और सनातन संस्कारों की सीख दी।उन्होंने आगे कश्मीर का उदाहरण देते हुए समाज को सचेत किया। उन्होंने कहा कि हिंदू केवल एक पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक शाश्वत जीवन मूल्य है। हमें जाति, पंथ और संप्रदायों के संकीर्ण घेरों से ऊपर उठना होगा। संगठित हिंदू ही सुरक्षित भारत की गारंटी है।उन्होंने जोर देकर कहा कि समाज में ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं होना चाहिए, क्योंकि समरस समाज ही एक शक्तिशाली राष्ट्र की नींव रख सकता है।संघ के शताब्दी वर्ष का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वयंसेवकों और समाज के उत्तरदायित्वों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य केवल संगठन बनाना नहीं, बल्कि समाज को संगठित करना है। उन्होंने स्व यानी स्वदेशी, स्वावलंबन और स्व-भाषा पर जोर देते हुए कहा कि आज भारत हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रहा है और दुनिया में नंबर एक की ओर अग्रसर है।हिंदू नववर्ष के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि,1 जनवरी हमारा नववर्ष नहीं है। हमारा नववर्ष चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर शुरू होता है, जो प्रकृति और संस्कृति के अनुकूल है।उन्होंने पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध को छोड़ अपनी जड़ों सनातन परंपराओं की ओर लौटने का आह्वान किया।

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