
संघकार्य को जीवन का ध्येय मानकर पूरी निष्ठा से उसे साधने वाले श्री शांताराम सराफ का जन्म 10 मार्च, 1932 को महाराष्ट्र के जलगांव जिले के यावल में हुआ। घर में वे रामभाऊ नाम से पुकारे जाते थे। उनके पिता श्री त्र्यंबक सराफ तथा माता श्रीमती कमलादेवी थीं। छह भाई-बहनों में वे दूसरे क्रम पर थे। घर का वातावरण अंग्रेज़-विरोधी तथा राष्ट्रभावना से ओतप्रोत था, जिसने उनके विचारों को बाल्यकाल में ही मजबूत दिशा दी।
प्रचारक बनने का निर्णय :
प्रचारक जीवन शुरू करने से पहले वे सागर के एक बैंक में कार्यरत थे। नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक प्रचारक बनने के निर्णय पर परिवार में कड़ा विरोध हुआ, किंतु उनकी निष्ठा और संकल्प अडिग रहे।
• 1963 में उन्हें दुर्ग जिला प्रचारक
• 1967 में रायपुर विभाग प्रचारक
• 1989 में छत्तीसगढ़ के प्रथम प्रांत प्रचारकबनाया गया। आगे चलकर वे मध्य क्षेत्र के प्रचार प्रमुख और संपर्क प्रमुख बनाए गए, जिनका केंद्र जबलपुर रहा।
रायपुर संघ कार्यालय की कहानी :
शांताराम जी के समय रायपुर में संघ का कोई स्थायी कार्यालय नहीं था। जयस्तंभ चौक के पास जयराम सिनेमा के ऊपर एक छोटा कमरा मिला। रात एक बजे तक सिनेमा का शोर चलता रहता, पर वे शांत चित्त रहकर वहीं से संघ कार्य का संचालन करते रहे। बाद में उनके प्रयासों से ‘जागृति मंडल’ नामक निजी संघ कार्यालय बना। इसके निर्माण में उन्होंने स्वयं श्रमिकों के साथ काम तक किया। बीमारी के दौरान जब उन्हें फिजियोथेरेपी की आवश्यकता हुई, तब उन्होंने कार्यालय में ही एक फिजियोथेरेपी केन्द्र शुरू करवाया, जो आज भी सामान्य लोगों को सस्ती और सतत सेवा प्रदान कर रहा है।
कठिन परिस्थितियों में कार्य :
छत्तीसगढ़ लंबे समय तक वामपंथी हिंसा से प्रभावित रहा। इसके बावजूद शांताराम जी मोटरसाइकिल से निर्भीक होकर पूरे प्रदेश का प्रवास करते थे। आपातकाल में उन्हें मीसा के अंतर्गत जेल भेजा गया। बाद में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा दी जाने वाली सम्मान-निधि को भी वे स्वयं पर न खर्च कर सेवा कार्यों में अर्पित कर देते थे। वे मधुर भाषी, सुरीले गायक और कुशल घोषवादक थे, किंतु अपने गीतों की रिकॉर्डिंग की अनुमति कभी नहीं देते थे।
सादगी, अनुशासन और भक्ति :
शांताराम जी की दिनचर्या अत्यंत सरल व अनुशासित थी। पुराने गणवेश में पहने जाने वाले लांग बूट, पोंगली और पट्टी जब बंद हुए, तो उनके परिचितों ने उनके लिए एक स्वेटर बुना। वे उसे सबको हर्षपूर्वक दिखाते थे।वे गणेशभक्त थे—स्नान के बाद प्रतिदिन गणेश प्रतिमा को चंदन लगाकर ही शाखा जाते, और सायंकाल कार्यालय में होने वाले हनुमान चालीसा पाठ में नित्य उपस्थित रहते।
मदकू द्वीप और प्राचीन विरासत का पुनर्जीवन :
छत्तीसगढ़ जनजाति-बहुल क्षेत्र है और यहां मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण की गतिविधियाँ काफी सक्रिय थीं। मुंगेली जिले के मदकू द्वीप में ईसाई मिशनरियां बहुत प्रभावी थीं। शांताराम जी के अथक प्रयास से वहां पुरातात्विक उत्खनन प्रारंभ हुआ। पुरातत्वविद अरुण शर्मा के निर्देशन में हुए उत्खनन में 19 प्राचीन शिवलिंग मिले, जिससे इस स्थान का महत्व पुनर्स्थापित हुआ।
उनके प्रयासों से यह स्थल धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन केंद्र बन गया। इसी प्रकार नवागढ़ का गणेश मंदिर भी उनके मार्गदर्शन से निर्मित हुआ।व्यक्तित्व की विशेषताएँ :
• उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी—सैकड़ों फोन नंबर और कार्यकर्ताओं के नाम उन्हें याद रहते थे।
• जेब में टॉफियाँ रखना उनकी आदत थी; जहां भी जाते, बच्चों को टॉफी देकर तुरंत उनसे मित्रता कर लेते।
• मराठीभाषी होते हुए भी गांवों में वे स्थानीय बोली में ही संवाद करते थे।
• छत्तीसगढ़ के वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व का बड़ा भाग उनकी छत्रछाया में विकसित हुआ।
• संघ परिवार के सभी संगठनों के लिए उन्होंने स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ता तैयार किए।
स्थानीय परंपराओं, लोकदेवताओं और तिहारों के प्रति उनमें गहरी श्रद्धा थी।
अंतिम समय और विरासत :
5 सितम्बर 2025, रायपुर में 93 वर्ष की आयु में उनका शांतिपूर्ण निधन हुआ। उनका जीवन संघ की उस परंपरा का सशक्त उदाहरण है जिसमें व्यक्ति स्वयं को मिटाकर समाज में स्थायी आधार तैयार करता है। छत्तीसगढ़ में संगठन कार्य को मजबूत करने, जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक पुनर्जागरण लाने, और हजारों कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शक बनने वाले शांताराम सराफ वास्तव में संघ नींव के ध्येय-समर्पित पुष्प थे।।।
भारत माता की जय ।।
संदर्भ: पांचजन्य (21 सितम्बर 2025)संकलन: स्वयंसेवक एवं टीम
