मोदी सरकार जब 2014 में आई तो भारतीय राजशाही ने सोचा भी न था कि ये सरकार लगातार तीन चुनाव जीत कर बनी रहेगी। रेल्वे स्टेशन पर चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बना रहेगा क्योंकि इस पद पर पवित्र परिवार का स्थाई पट्टा है। लेकिन जनता ने इनका भ्रम तोड़ दिया। भारतीय राजनीति के स्थापित शक्ति-संतुलन में एक स्पष्ट और निर्णायक परिवर्तन दिखाई दिया।
दशकों तक सत्ता के केंद्र में रहे राजनीतिक परिवारों और दलों के लिए यह पराजय केवल चुनावी नहीं थी, बल्कि वैचारिक और मनोवैज्ञानिक भी थी। यह तथ्य किसी राजनीतिक मत का विषय नहीं, बल्कि चुनावी आँकड़ों की वास्तविकता है कि 2014, 2019 और 2024, तीनों आम चुनावों में लगातार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक असाधारण घटना रही है।
यह भी एक स्थापित तथ्य है कि 2014 से पहले वर्तमान प्रमुख विपक्षी दल को लंबे समय तक विपक्ष में बैठने का व्यावहारिक अनुभव नहीं रहा। संसदीय इतिहास यह बताता है कि प्रभावी विपक्ष की भूमिका केवल संख्या से तय नहीं होती। उसके लिए संसदीय परंपराओं की समझ, नियमों का सम्मान और संयमित भाषा का अभ्यास उतना ही आवश्यक होता है जितना सरकार को घेरने का साहस। सत्ता में रहकर राजनीति करना और विपक्ष में रहकर लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाना, दोनों की प्रकृति अलग होती है।
पिछले कुछ वर्षों में संसद के भीतर जिन मुद्दों को लेकर सबसे अधिक हंगामा हुआ और उन मुद्दों का क्या हुआ उस पर दृष्टि डालना आवश्यक है। राफेल विमान सौदे को लेकर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि सौदे में किसी प्रकार की अनियमितता के प्रमाण नहीं मिले। इसके बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से प्रभावहीन होता चला गया।
इसी तरह पेगासस स्पाइवेयर प्रकरण में यह आरोप लगाया गया कि सरकार ने विपक्षी नेताओं और पत्रकारों की जासूसी करवाई, लेकिन अब तक किसी न्यायिक या तकनीकी जांच में यह निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हो पाया कि भारत सरकार ने इसका अवैध उपयोग किया। स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति भी किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सकी।
चीन और सीमा विवाद के प्रश्न वास्तविक और गंभीर हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि भारत-चीन सीमा विवाद 1962 से चला आ रहा है। इसे केवल वर्तमान सरकार की विफलता के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक सच्चाई को अधूरा और एकांगी बनाता है।
2023 में सामने आई Hindenburg Research की रिपोर्ट भी एक निजी फर्म द्वारा जारी की गई थी, जिसका व्यावसायिक उद्देश्य शेयर बाजार में शॉर्ट-सेलिंग से लाभ कमाना था। भारतीय बाजार नियामक संस्थाओं की जांच के बाद यह सिद्ध नहीं हुआ कि सरकार की संलिप्तता से कोई घोटाला हुआ हो।
2024 में अडाणी समूह को लेकर अमेरिका में उठे आरोपों की स्थिति भी यही है कि कानूनी प्रक्रिया अभी प्रारंभिक स्तर पर है और किसी भी न्यायालय ने न तो समूह को और न ही भारत सरकार को दोषी ठहराया है। कानून में आरोप और दोषसिद्धि के बीच का अंतर समझना लोकतांत्रिक विवेक का हिस्सा है।
2026 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान संसद में जो दृश्य देखने को मिला, वह इसी पृष्ठभूमि में अधिक चिंताजनक प्रतीत होता है। चर्चा के दौरान चीन और पूर्व थलसेना अध्यक्ष मनोज नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का हवाला देकर कार्यवाही बाधित की गई। संसदीय नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के समय विषयांतर की अनुमति नहीं होती। अध्यक्ष द्वारा बार-बार व्यवस्था देने के बावजूद अवरोध जारी रहना, संसदीय मर्यादा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।
मैने भारतीय संसद में इससे पहले भी तीखे विरोध और जोरदार बहसें देखी हैं। विपक्ष की भूमिका केवल सरकार का विरोध करना नहीं रही, बल्कि उसे तर्क और विचार के स्तर पर चुनौती देना भी रही है। अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर और जॉर्ज फर्नांडिस, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने विपक्ष में रहते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया, लेकिन भाषा, आचरण और गरिमा की एक रेखा को कभी पार नहीं किया। उनके भाषण आज भी इसलिए याद किए जाते हैं क्योंकि वे भावनाओं से नहीं, तर्क और तथ्य से संचालित थे।
संसद में किये गये इनके आचारण को आम जनता देखती है और इन्ही हरकतों और कारगुजारियों के चलते ये हर चुनाव में मात खाते हैं और आरोप ईवीएम पर लगाते हैं। ईवीएम को लेकर संदेह प्रकट करना राजनीतिक अधिकार हो सकता है, लेकिन तथ्य यह है कि अब तक किसी न्यायालय या चुनाव आयोग ने यह सिद्ध नहीं किया कि ईवीएम प्रणाली को व्यापक स्तर पर हैक किया गया है। जब एक ही प्रणाली से अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग स्तर के चुनावों में भिन्न परिणाम सामने आते हैं, तब केवल हार की स्थिति में ईवीएम पर सवाल उठाना तार्किक रूप से कमजोर प्रतीत होता है।
संसद में हंगामा, बहिष्कार और नारेबाजी कोई नई बात नहीं है, लेकिन भाषा, आचरण, विषय चयन और व्यवहार में संसदीय परंपराओं का पालन लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है। विपक्ष का दायित्व केवल सरकार को घेरना नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करना भी है।
जब आलोचना तथ्य, मर्यादा और गंभीरता से रहित होती है, तो वह जनसमर्थन अर्जित करने में असफल रहती है। अंततः लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है, और उसका निर्णय अक्सर आरोपों से नहीं, बल्कि आचरण और विश्वसनीयता को देखकर बनता है। बाकी जो है सो तो हैइए है।

~ आचार्य ललितमुनि
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

