केवल भक्ति ही नहीं सामाजिक समरसता के संवाहक थे – संत शिरोमणि रविदास

संत रविदास जयंती पर विशेष: जात-पात का नहीं अधिकारा, राम भजे सो उतरे पारा

केवल भक्ति ही नहीं सामाजिक समरसता के संवाहक थे संत शिरोमणि रविदास

जब देश में बाहरी आक्रांता मुगलों का भय, आतंक, अपमान, मंदिर विध्वंस जैसा बर्बर माहौल था। ऐसे में हिंदू समाज में जातिभेद, कर्मकांड, कुरीतियों का बोलबाला हो गया था। देव भूमि, सामाजिक समरसता की भूमि, प्रेम, स्नेह औऱ समानता की भूमि भारत पर निरंतर बाहरी हमलों ने भेदभाव, छूआछूत और वैमनस्यता का बीज बो दिया। ऐसे में सभी लोग समाज-धर्म की रक्षा में लग गये और विकास का प्रवाह रुक गया। ऐसे ही समय माघ पूर्णिमा विक्रमी संवत् 1433 सन् 1376 को संत शिरोमणि रविदास जी का जन्म वाराणसी में चर्मकार परिवार में हुआ। इनकी लौकिक शिक्षा नहीं हुई पर बाल्यकाल से ही रविदास जी का मन ईश्वर भक्ति की ओर लग गया। उस काल में लोग पेशेगत व्यापार ही करते थे। अतः उन्होंने भी चर्मकार का कार्य शुरु किया। इनकी पत्नी का नाम लोना था। इनके व्यवसाय में ठीक से मन ना लगने के कारण पिता ने मकान के पीछे एक झोपड़ी दी, वे उसमें रहकर भगवत भक्ति व कुछ चर्मकारी व्यवसाय करने लगे।

एक बार उन्होंने संत रामानंद जी को कहा कि मैं तो चर्मकार हूँ, आप मुझे अपना शिष्य बना लें। सन्त रामानंद जी ने कहा कि हमारे यहां कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। उन्होंने रैदास जी को अपना शिष्य बनाकर कहा भक्ति करो, भजन लिखो व व्यवसाय भी करते रहो। तब रविदास जी ने लिखा कि-

“जीव कै जाती वरन कुल नांहि, जाती भेद है जग मूरखाई।

नीति-समृति-शास्त्र सब गावें, जाती भेद शउ मूढ़ बतावें।

रविदास जन्म के करनै ,होत न कोऊ नीच

नर को नीच कर डाटि है, ओछे कर्म की कीन

ब्राह्मण छतरी बैस सूद्र, रविदास जनम है नाहिं।

जो चाहई सुबरन कऊ, पावह करमन नाहिं।।

यानि जन्म से नहीं बल्कि कर्म से व्यक्ति ऊँची या नीची जाति का होता है। संत रविदास का उद्घोष- “जात-पात का नहीं अधिकारा, राम भजे सो उतरे पारा” हमें आज भी राह दिखा रहा है।

मीराबाई बनीं शिष्या

इनकी प्रबल भक्ति और लोक जागरण का कार्य देखकर सभी जातियों के लोग उनके शिष्य बने। इनके शिष्यों में प्रमुख रूप से काशी नरेश, झाली रानी, मीराबाई का नाम आता है। एक बार चित्तौड़ के महाराणा ने इनको निमंत्रण दिया। संत रैदास चित्तौड़ पधारें, महाराणा ने खूब सम्मान किया। भोजन के समय सबको अहसास हुआ कि सबके बगल में रैदास बैठे हैं तो इससे सब लोग रैदास की भक्ति को मान गये।

गुरु ग्रन्थ साहिब में 40 पदों को मिला स्थान

संत रविदास को सारे देश में सम्मान मिला। उनके 40 पदों को गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान मिला। आज बड़ी संख्या में लोग है जो अपने आपको रैदासी कहकर गौरव अनुभव करते हैं। स्वयं रैदास ने कहा कि उनके परिवार के लोग वाराणसी के आसपास मरे होए जानवर धोने का कार्य करते हैं पर मैं तो प्रभु का दास बना रहा इस कारण विप्र, आचार्य, सब दंडवत प्रणाम, सम्मान करते हैं। 

मुसलमान बनाने के भी हुए प्रयास

संत रैदास को मुसलमान बनाने के भी प्रयास हुए। ‘सदना पीर’ उन्हें मुसलमान बनाने आया पर इनकी अध्यात्मिक साधना से प्रभावित होकर स्वयं उनका शिष्य हो गया। उसका नाम रामदास पड़ा।

सिकंदर लोदी ने भी उन्हें डराकर और लालच देकर मुस्लिम बनाने का प्रयास किया। संत रविदासजी उसे यह उत्तर देते हैं-

वेद वाक्य उत्तम धरम, निर्मल वाका ज्ञान।

यह सच्चा मत छोड़कर, मैं क्यों पढूँ कुरान।

श्रुति-सास्त्र-समृति गई, प्राण जाय पर धर्म न जाई।

कुरान बिहश्त न चाहिए, मुझकों हूर हजार।

वेद धर्म त्यागू नहीं, जो गल चलै कटार।

वेद धर्म है पूरण धर्मा, करी कल्याण मिटावै भरमा।

सत्य सनातन वेद हैं, ज्ञान धर्म मर्याद।

जो न जाने वेद को, वृथा करें बकवाद।

सिकंदर लोदी ने धमकी दी तो निर्भीकता से उत्तर दिया-

मैं नहीं दब्बू बाल गंवारा, गंग त्याग गहें लाल किनारा।

प्राण तजू पर धरम न देऊँ, तुझसे शाह सत्य कह देऊँ।

चोटी-शिखा कवहूँ नहीं त्यागूँ, वस्त्र समेत देह भाल त्यागूँ।

कंठ कृपाण का करौ प्रहारा, चाहे डुबाओ सिन्धु मंझारा।

वहीं प्रभु भक्ति में लीन होकर संत रविदास कहते हैं-

अब केसे छुटे राम रट लागी।

प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी।।

प्रभु जी तुम धन वन हम मोरा। जैसे चितवन चंद चकोरा।।

प्रभु जी तुम दिया हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राति।।

प्रभु जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं लिलत सुहागा।।

प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै रैदासा

उन्होंने केवल भक्ति ही नहीं कि, बल्कि आमजन को जाग्रत करने का भी बीड़ा उठाया। उन्होंने कम शब्दों में गहरी जीवनोपयोगी बातें भी कही।

रैन गँवाई सोये करि, दिवस गवायो खाय

हीरा जन अमोल है, कौड़ी बदले जाय

अंतर गति राचै नहिं, बाहर करै उजास

ते नर जमपुर जायेंगे, सत भाषै रैदास

‘मन चंगा तो कठोती में गंगा’ ये घटना भी इन्हीं से सम्बंधित है।


हिंदुओं के मतांतरण को रोका

भारत में तुगलक, सैयद और लोदी जैसे कट्टर इस्लामिक आक्रांताओं के समय संत रविदास ने हिन्दुओं का धर्मांतरण होने से रोका। उनके गुरु रामानंद जी का ही अनुसरण करते हुए वे मतांतरण को रोकने में लगे रहे। उनके गुरु अयोध्या में धर्मांतरण कर चुके लगभग 34,000 हिन्दुओं को वापस सनातन परंपरा में लेकर आए थे। गुरु रामानंद जी द्वारा अपने सबसे तेजस्वी शिष्यों रविदास, कबीर, धन्ना, पीपा, सैन एवं सात अन्य अनुयायियों को पूरे भारतवर्ष में हो रहे धर्मांतरण के विरुद्ध खड़ा होने का व्रत दिलाया था।संत रविदास जी जैसी महान विभूति किसी जाति विशेष की नहीं, वरन् समूचे हिन्दू समाज के संत हैं। संत रविदास जी का जीवन प्रेरणादायी है। जिस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जाति विहीन समाज की स्थापना के लिए कटिबद्ध है। स्वयंसेवकों की केवल एक पहचान है और वह है – हिन्दू।

संत रविदास के सिद्धांतों का पालन करें तो भारत को विश्वगुरू बनने से कोई नहीं रोक पाएगा- माननीय सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत

वर्ष 2023 में मुंबई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा था कि संत शिरोमणि रविदास जी के समरसता के सिद्धांतों पर यदि सभी अमल करें तो भारत को विश्वगुरू बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। आज भारत जो प्रगति कर रहा है, उसकी जड़ें भारतीय संतों की परंपरा में हैं। संत रविदास जी इसके अभिन्न अंग हैं। उनके काम और उनके काम के परिणामों को देखकर ही समकालीन संतों ने उन्हें संत शिरोमणि की उपाधि दी थी।मोहन भागवत जी ने कहा कि पहले सिर्फ लूट के लिए आक्रमण होता था। इस्लामी आक्रमण के बाद स्थिति और भी बदल गई।एक ऐसा हमला हुआ, जिसने हमारी व्यवस्था को जड़ से बदल दिया। संत रविदास जी को सत्य का बोध हुआ, उनका जुनून सत्य की खोज था। उन्होंने जोर देकर कहा कि ज्येष्ठ-कनिष्ठ का विचार सरासर गलत है। सत्य, करुणा, आंतरिक पवित्रता और निरंतर कड़ी मेहनत रविदास जी का उपदेश था। उन्हें पता था कि परंपरा से क्या रखना है और क्या फेंकना है। संत रविदास जी की आध्यात्मिक शक्ति के कारण अनेक प्रतिष्ठित लोग उनके शिष्य बने। संत रविदास जी ने सदाचारी बनकर सम्मान पाने का संदेश दिया। संत रविदास जी वैरागी थे, इसलिए वे सत्य कह सकते थे। देश को विश्वगुरु बनाने के लिए हर भारतीय में संत रविदास जी की वैराग्य भावना होनी चाहिए। सद्भाव एक उन्नत समाज की नींव है। होठों पर आज सद्भाव दिख रहा है। यह अंतर्मन से आना चाहिए, आइए हम सब प्रयास करें। संत रविदास जी ने प्रत्येक मामले में कैसा व्यवहार किया, आइए हम इसका अध्ययन करें, अभ्यास करें और देश को आगे बढ़ाएं।

महान कवि, समाज सुधारक व संत शिरोमणी रविदास जी की जयंती पर कोटिश: नमन।

प्रियंका कौशल

वरिष्ठ पत्रकार।


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