चमकते मॉल, फूड ऐप्स पर मिलते ऑफर और दो मिनट में तैयार होने वाले खाने के दौर में हमारी थाली तेजी से बदल रही है। पिज़्ज़ा, बर्गर और पैकेज्ड स्नैक्स अब केवल भोजन नहीं, बल्कि एक तरह का स्टेटस सिंबल बनते जा रहे हैं। सुविधा और स्वाद की इस तेज रफ्तार दुनिया में हम शायद यह भूलते जा रहे हैं कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य, संस्कार और समाज की बुनियाद भी है।जिस देश में अन्न को “ब्रह्म” कहा गया, जहाँ अन्न को माता अन्नपूर्णा का स्वरूप माना जाता है, वहाँ यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं?
भारतीय संस्कृति में भोजन को केवल पोषण नहीं, बल्कि एक पवित्र परंपरा माना गया है। “अन्नं ब्रह्म” का संदेश हमें यह सिखाता है कि अन्न जीवन का आधार है। हमारे घरों में आज भी यह संस्कार दिया जाता है कि थाली में अन्न का एक भी दाना व्यर्थ न जाए। यह केवल अनुशासन नहीं, बल्कि प्रकृति और संसाधनों के प्रति सम्मान की सीख है। लेकिन भोजन की परंपरा केवल खाने तक सीमित नहीं थी। हमारे घरों में एक समय ऐसा था जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर भोजन करता था। यह केवल पेट भरने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि परिवार के बीच संवाद, स्नेह और विश्वास को मजबूत करने का माध्यम था। दिनभर की भागदौड़ के बाद भोजन का समय परिवार को जोड़ने वाला एक सुंदर अवसर होता था।
आज स्थिति बदलती जा रही है। बाहर खाने की बढ़ती आदत, होटल और रेस्टोरेंट संस्कृति और तेज जीवनशैली ने उस पारिवारिक परंपरा को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया है। अब अक्सर लोग टीवी देखते हुए, मोबाइल चलाते हुए या अलग-अलग समय पर अकेले ही भोजन कर लेते हैं। घर में रहते हुए भी परिवार के सदस्य अपने-अपने संसार में व्यस्त दिखाई देते हैं।दरअसल हमारे पूर्वजों की परंपराएँ केवल सामाजिक रीति नहीं थीं, बल्कि उनमें गहरी वैज्ञानिक सोच छिपी हुई थी। इस विषम परिस्थिति को भी अगर कोई सहज कर सकती है तो वो मातृशक्ति ही है। उन्हें ही अपने परिवार को वापस जड़ों की और लौटने की दिशा में प्रयास करना होगा। हमारे पूर्वजों ने भले ही किताबी ज्ञान न लिया हो पर उन्हें स्वस्थ रहने का वैज्ञानिक विश्लेषण पता था। यानी उनकी विचारधारा कितनी ऊंचाईयों पर थी। यही वज़ह है कि भारतीय पारंपरिक भोजन संतुलन का अद्भुत उदाहरण है। दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी और दही—ये सब मिलकर एक सम्पूर्ण आहार बनाते हैं। यही संतुलन स्वस्थ शरीर और तेज दिमाग की असली कुंजी है। इस बीच विडंबना भी यह है कि एक ओर जहाँ लाखों लोग पर्याप्त भोजन नहीं पा पाते, वहीं भारत में हर वर्ष लगभग 6 से 7 करोड़ टन भोजन बर्बाद हो जाता है। शादी-ब्याह और आयोजनों में प्लेटों में बचा भोजन हमें यह याद दिलाता है कि हमें केवल स्वस्थ ही नहीं, बल्कि संवेदनशील भी बनना होगा।
मुझे अपना बचपन याद आता है। जब भी मैं अपनी मौसी के घर जाती थी, तो भोजन के समय विशेष सावधानी रखनी पड़ती थी। मौसाजी को थाली में अनाज का एक भी दाना छोड़ना बिल्कुल पसंद नहीं था। उस समय यह थोड़ा कठोर लगता था, लेकिन धीरे-धीरे वही बात आदत बन गई। आज मैं अपने बच्चों को भी यही सिखाती हूँ कि अनाज की कीमत और उसका सम्मान कभी नहीं भूलना चाहिए।
खान-पान की बात भला श्रीअन्न के उल्लेख के बिना कैसे पूरा हो सकता है।आज आधुनिक विज्ञान भी वही बात दोहरा रहा है जो हमारे पूर्वज जानते थे। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित किया। यह भारत के मोटे अनाज की वैश्विक पहचान का प्रमाण है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के शोध बताते हैं कि बाजरा और अन्य मिलेट्स में उच्च फाइबर, आयरन और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है। यह मधुमेह, मोटापा और हृदय रोग के खतरे को कम करने में सहायक है। अर्थात जो भोजन हमारी दादी-नानी हमें प्यार से खिलाती थीं, वही आज दुनिया में “सुपरफूड” के रूप में लोकप्रिय हो रहा है।भारत में आज मोटे अनाज का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। देश में मिलेट्स का वार्षिक उत्पादन लगभग 1.7 से 1.8 करोड़ टन तक पहुँच चुका है, जो विश्व उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत है। यही कारण है कि भारत को मिलेट्स का वैश्विक केंद्र भी कहा जाने लगा है।छत्तीसगढ़ भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य में कोदो, कुटकी और रागी जैसे मोटे अनाज के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस दिशा में देश में कई प्रेरणादायक उदाहरण भी सामने आए हैं। मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले की बैगा जनजाति की महिला लहरी बाई ने कुटकी, सांवा और ज्वार जैसे मोटे अनाज की 150 से अधिक दुर्लभ प्रजातियों को संरक्षित करने का अद्भुत कार्य किया है। उनके इस प्रयास की सराहना देश के प्रधानमंत्री ने अपने रेडियो कार्यक्रम “मन की बात” में भी की थी।इसी तरह रायगढ़ में खुले छत्तीसगढ़ के पहले मिलेट कैफे ने भी लोगों के बीच मोटे अनाज के प्रति जागरूकता बढ़ाई है। यहाँ महिलाओं के स्व-सहायता समूह कुटकी और रागी से बने पौष्टिक और स्वादिष्ट व्यंजन तैयार कर लोगों को परोस रहे हैं। दरअसल हमारी प्राचीन परंपराएँ केवल परंपरा नहीं थीं, बल्कि गहरी वैज्ञानिक समझ पर आधारित थीं। मोटे अनाज न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी अनुकूल हैं। कम पानी में उगने वाले ये अनाज भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। आज आधुनिक खान-पान ने पारंपरिक भोजन को पीछे धकेल दिया है, लेकिन इसके साथ ही जीवनशैली से जुड़ी कई बीमारियाँ भी बढ़ी हैं। चाहे एलोपैथी हो या आयुर्वेद, अधिकांश चिकित्सक आज भी संतुलित और घर का बना भोजन लेने की ही सलाह देते हैं।
आज की युवा पीढ़ी के सामने असली चुनौती आधुनिकता को अपनाने की नहीं, बल्कि अपनी पहचान को बचाए रखने की है। आधुनिक होना गलत नहीं है, लेकिन अपनी जड़ों को भूल जाना निश्चित ही सही नहीं है। यदि हम कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें तो स्थिति काफी बदल सकती है—अपनी थाली में मोटे अनाज और ताज़ी सब्जियों को शामिल करें।
जितनी भूख हो, उतना ही भोजन लें।
परिवार के साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा को फिर से जीवित करें।
स्थानीय और मौसमी भोजन को प्राथमिकता दें। सामाजिक माध्यमों पर स्वस्थ भोजन की संस्कृति को बढ़ावा दें। भारतीय अनाज केवल हमारी परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य की सेहत का आधार हैं। यदि युवा पीढ़ी जागरूक हो जाए तो “स्वस्थ भारत” का सपना साकार हो सकता है। याद रखिए—मजबूत शरीर, गहरे रिश्ते और स्वस्थ राष्ट्र की शुरुआत आपकी थाली से ही होती है।
रूमा सेनगुप्ता
(लेखिका पत्रकार हैं)

