11/07/2025

सूर्य इस शब्द में ही गूढ़ता भरी हुई है। इक्कींसवी सदी का एक चौथाई हिस्सा समाप्त हो रहा है, फिर भी सूर्य का आकर्षण और सूर्य संबंधी ज्ञान / अज्ञान, आज भी वैसा ही है, जैसा हजारों वर्षों पहले था!
मानव जाति के उन्नति और उत्क्रांति के काल में विश्व के लगभग सभी समूह प्रकृति को पूजते थे। दक्षिण अमेंरिका की इन्का/माया संस्कृति हो, ग्रीक और इजिप्शियन सभ्यता हो, या रोमन, हिंदू और चिनी परंपरा। इन सभी सभ्यताओं में और इन सभी स्थानों पर, प्रकृति पूजन के साथ सूर्य की भी पूजा होती थी। उस प्रारंभिक काल में तत्कालीन मानव जाती को यह समझ में आया होगा, कि हमें मिलने वाली ऊर्जा सूर्य से मिलती है। दिन और रात, और ऋतु और मौसम में बदलाव भी सूर्य के कारण होते हैं। इसलिये अलग-अलग नामो से, अलग-अलग पद्धति से, सूर्य देवता की उपासना सब जगह होती रही। युरोपियन्स ने इन प्रकृति पूजकों को ‘पेगन’ यह लेबल लगाया था। यह तुच्छता दर्शक और उनको हीन समझने वाला शब्द था।
भारत में भी सूर्य की उपासना अनादि काल से हो रही है। यजुर्वेद में एक सुक्त है- ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ (7/42)।
अर्थात, सूर्य को सभी जड़, चेतन पदार्थों की आत्मा कहा गया है। शुक्ल यजुर्वेद में ‘सूर्य सूक्त’ या ‘मित्र सुक्त’ इस शीर्षक से कुल 17 श्लोक दिये हैं। भारत में होने वाली सूर्य पूजा यह केवल किसी अनाकलनीय प्रकृति भगवान की पूजा नहीं है, तो सूर्य के सभी तत्व और गुणधर्म की जानकारी होते हुए की गई उपासना है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल में 527 से 599 सूक्त, सूर्य के वर्णन करने वाले सूक्त है। इसमें सूर्य के सप्तवर्णी (सात रंग के) किरण होते है, ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। इसीलिए भारत में प्राचीन समय से सूर्यदेवता के जो मंदिर है, उनमें यह वैज्ञानिक जानकारी कूट-कुटकर भरी है। उसमें से कुछ ही हम ‘डीकोड’ कर सके हैं। बाकी बची हुई प्रचुर जानकारी, अभी भी अनसुलझी पहेली बनी हुई है।
भारत की इस सूर्य पूजा परंपरा को प्राचीन समय में अनेक देशों ने अपनाया। सूर्य का संस्कृत में नाम है ‘मित्र’। हमारे बारह सूर्य नमस्कारों का प्रारंभ ही ‘ओम मित्राय नमः’ से होता है। सूर्य का यह ‘मित्र’ नाम, इजिप्शियन संस्कृति से लेकर युरोप तक, कई स्थानों पर मिलता है। जर्मनी में फ्रॅन्कफर्ट के पास ‘झालबर्ग’ नाम के रोमन कालीन किले में एक संग्रहालय है। उसमें पहली/दूसरी सदी के सूर्यदेवता की प्रतिमा में, सूर्य के लिए, ‘मित्रा’ शब्द का प्रयोग किया गया हैं। मित्रा या सूर्य इस शब्द का और उस देवता के पूजा का संबंध भारत के साथ स्पष्ट रूप से दिखाया है।
प्राचीन समय में विशाल, एकसंघ और अखंड भारत में सूर्य के अनेक मंदिर थे। बाद में इस्लामी आक्रमकों की ‘बुत शिकन’ मानसिकता के कारण इनमें से अधिकतम मंदिर गिराये गये, ध्वस्त किये गये। उनमें से कुछ ही मंदिरों का पुनर्निर्माण हो सका।

जिस सबसे प्राचीन सूर्य मंदिर का उल्लेख इतिहास में आता है, वह आदित्य सूर्य मंदिर आज के पाकिस्तान के मुल्तान में है। इस सूर्य मंदिर का उल्लेख ग्रीक सेनानी ‘एडमिरल स्कायलेक्स’ ने किया है। एडमिरल स्कायलेक्स, ईसा पूर्व वर्ष ५१५ में इस क्षेत्र में आया था। उन दिनों मुलतान यह ‘काश्यपपूर’ इस मूल नाम से जाना जाता था। यह मंदिर कम से कम, 5000 वर्ष पुराना होगा, ऐसी मान्यता है। उसके बाद आये चिनी प्रवासी ह्युएन त्सांग ने वर्ष 641 में इस मंदिर को भेट दी। वे लिखते है, ‘यह आदित्य मंदिर अत्यंत भव्य और विपुलता से भरा हुआ है। इसमें सूर्य देवता की प्रतिमा सोने की बनी हुई है। वह मौल्यवान और दुर्लभ रत्नोंसे अलंकृत है।’
आगे चल कर अल् बिरुनी इस अरब इतिहासकार ने ग्यारहवी सदी में किये हुए मुलतान यात्रा में इस मंदिर का उल्लेख किया है। आठवीं सदी में, अर्थात, वर्ष 712 में उम्मयाद साम्राज्य के तत्कालीन खलिफा ने, मोहम्मद बिन कासिम को सिंध प्रांत पर आक्रमण करने भेजा। इस मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहीर को इस युद्ध में परास्त करके, मुलतान समेत लगभग पूरा सिंध प्रांत अपने आधिपत्य में ले लिया। तब उसके ध्यान में आया कि मुल्तान का आदित्य मंदिर और उसके आसपास लगने वाला बाजार, यह उसके कमाई का बड़ा साधन बन सकता है। इसलिये उसने यह मंदिर तोड़ा नहीं, वैसे ही रहने दिया। इस मंदिर से मिलने वाला राजस्व, उसके लिए मोटी तगड़ी कमाई था। बाद में जब आसपास के क्षेत्र के हिंदू राजा मुल्तान पर आक्रमण करके मुस्लिम आक्रांताओं को खदेड़ने आते थे, तब यह कासिम धौंस देता था, कि ‘मुल्तान पर आक्रमण करोगे तो याद रखो, तुम्हारा आदित्य सूर्य मंदिर मैं ध्वस्त कर दूंगा।’
उस समय इस सूर्य मंदिर की प्रसिद्धि इतनी जबरदस्त थी, कि यह मंदिर ध्वस्त ना हो इसलिये हिंदू राजा मुल्तान पर आक्रमण करने से डरते थे। अर्थात, इस आदित्य मंदिर को बंधक रख कर, मोहम्मद बिन कासिम ने अनेक वर्षों तक बिना युद्ध किये समूचे सिंध प्रांत पर राज किया। सन् 1026 में मोहम्मद गजनी ने इस मंदिर को पूर्णतः ध्वस्त किया। ऐसा कहते है, इस मंदिर में सूर्य के बारे में अनेक रहस्यमय जानकारी विविध मूर्ति और ‘विशिष्ट रचना’ द्वारा दर्शायी गयी थी। ‘सांब पुराण’ में इस मंदिर का उल्लेख है।
आज के हमारे खंडित भारत में भी अनेक छोटे-बड़े सूर्य मंदिर है। यह सूर्य मंदिर, हमारे पुरखों को सूर्य सृष्टि के संबंध में जो जानकारी थी, वो हमारे सामने रख रहे है। इन मंदिरों में, पूर्व दिशा में ओड़िसा में कोणार्क का सूर्य मंदिर, उत्तर में जम्मू-काश्मीर स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर, और पश्चिम में गुजरात में मोढेरा का सूर्य मंदिर, यह तीन सूर्य मंदिर एक त्रिकोण बनाते है।

इनमें से जम्मू-काश्मीर राज्य में अनंतनाग के पास स्थित ‘मार्तंड सूर्य मंदिर’ यह आठवीं सदी में, वर्ष 764 में बनाया गया था। कार्कोट वंश के चंड प्रतापी राजा ‘ललितादित्य मुक्तापीड’ ने इस मंदिर का निर्माण किया। इसके लिये ललितादित्य ने काश्मीर की उंचाई पर स्थित ऐसी समतल भूमि का चयन किया, जहां से पुरा प्रदेश अच्छे से दिख सके। अत्यंत भव्य ऐसे इस सूर्य मंदिर में, अनेक खगोलशास्त्रीय घटनाएँ और सूत्र उकेरे गये थे।
लेकिन पंद्रहवी सदी के प्रारंभ में, सिकंदर शाह मिरी इस क्रूरकर्मा अफगान शासक ने यह मंदिर ध्वस्त किया, ढहा दिया। इस कारण, बड़े पैमाने पर खगोलशास्त्रीय इतिहास भी मंदिर के मलबे में दब गया।
गुजरात में मोढेरा का सूर्य मंदिर यह उसके बाद बनाया गया मंदिर है। वर्ष 1026-27 में, आज के गुजरात के मेंहसाणा जिले में, चालुक्य राजवंश के भीम राजा (प्रथम) ने इस मंदिर का निर्माण किया। हो सकता है, कि इस जगह पर कोई छोटा सूर्य मंदिर होगा और राजा भीम (प्रथम) ने भव्य रूप से उसका पुनर्निर्माण किया हो। उन दिनों, पुष्पावती नदी के किनारे का यह स्थान, खगोलशास्त्रीय दृष्टि से सटीक था, इसलिये इस जगह का चयन किया गया। रहस्य से भरा मंडप, सभा मंडप और बीचोंबीच पानी का कुंड, ऐसी इस मंदिर की रचना है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। इस मंदिर की विशेषता यह हैं, कि यह मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है। इस मंदिर के अक्षांश-रेखांश है- 23” 58’ – 72” 13’।
आज से एक हजार वर्ष पूर्व, उस जमाने के मंदिर निर्माताओं ने, ठीक कर्क रेखा पर मंदिर कैसे बनाया होगा, यह एक आश्चर्य हैं!
इस मंदिर के गर्भगृह की रचना ऐसी है कि, दिन और रात जब समान होते हैं, उस दिन, अर्थात 21 मार्च और 23 सितंबर को, जब सूर्य विषुववृत्त को पार करता हैं, तब सूर्य की पहली किरण, गर्भगृह की सूर्य प्रतिमा को प्रकाशित करती है। वैसे ही, वर्ष का सबसे बड़ा दिन और सबसे बडी रात जब होती है, तब इस मंदिर की छाया नहीं होती। (अभी इस मंदिर में सूर्य देवता की मूर्ति नहीं है)। मंदिर पर अनेक प्रकार की मूर्तियां और आकृतियां उकेरी गयी है। इसमें सूर्य मालिका और पंच महाभूतों का (वायू, पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल) संबंध (relation) बताया है। यह मंदिर 52 स्तंभों पर खड़ा है। यह स्तंभ, वर्ष के 52 सप्ताहों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भारत के प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों के त्रिकोण का तीसरा मंदिर है, ओडिशा में, कोणार्क का सूर्य मंदिर। तुलना से सबसे नया मंदिर यही है। यह मंदिर बहुत प्राचीन होगा। नौंवी सदी के इस मंदिर के अनेक संदर्भ मिलते है। बाद में यह मंदिर भव्य रूप में फिर से बनाया गया होगा।
तेरहवीं सदी के भारत में इस्लामी आक्रांताओं का प्रवेश हुआ था। बख्तियार खिलजी ने नालंदा और अन्य विश्वविद्यालय ध्वस्त किए थे। परंतु भारत के पूर्व किनारे पर इन आक्रांताओं का आतंक अभी प्रारंभ नहीं हुआ था। उत्कल प्रांत में अभी भी हिंदू राजाओं का राज था। पूर्ब गांग (रुधी गांग या प्राच्य गांग) राजवंश का राज चल रहा था। इस राज वंश के नरसिंह देव (प्रथम) ने वर्ष 1250 में, समुद्र किनारे, कोणार्क का सूर्य मंदिर स्थापित किया।

कोणार्क का पूर्व में नाम ‘कैनपरा’ था। सातवीं-आठवीं सदी तक यह पूर्वी दिशा के देशों के साथ व्यापार करने वाला एक बंदरगाह था। लेकिन सूर्य मंदिर के कारण इसका नाम कोणार्क हुआ। कोणार्क का अर्थ होता हैं, कोण + अर्क। संस्कृत में सूर्य को ‘अर्क’ कहा जाता है। इसलिये ‘सूर्य मंदिर के कारण तैयार हुआ कोण’, ऐसा इसका मोटे तौर पर अर्थ होता है।
यह मंदिर अति भव्य स्वरूप में बनाया गया था। आज इस मंदिर के जो भग्नावशेष दिखते है, उससे इसके भव्य रूप की कल्पना हम कर सकते है। सात घोडों के रथ में भगवान सूर्य देवता बैठे है, ऐसा इस मंदिर का स्वरूप है। और रथ भी कितना बड़ा? तो कुल 24 बड़े पहियों का रथ, 12-12 पहिये दोनों तरफ!
इस रथ को जो सात घोड़े जोड़े है, वे सूर्यकिरण के सात रंगों का प्रतीक है। ऋग्वेद में इसका स्पष्ट उल्लेख है। इन्हें सप्ताह के सात दिनों का प्रतीक भी मान सकते है। इस मंदिर की वास्तुकला यह स्वतंत्र अध्ययन का विषय है। संपूर्ण मंदिर केवल और केवल पत्थरों से बनाया हुआ है। कहीं पर भी चुना, मिट्टी का उपयोग नहीं है। ये पत्थर भी कम से कम 35 किलोमीटर दूर से लाये गये है। मंदिर में अनेक भूमितीय आकार और आकृतियां बनी हुई है। भूमिति, खगोलशास्त्र और अध्यात्म का अद्भुत संगम, सुंदर मिलाप इस मंदिर में दिखाई देता है।
ये सूर्य मंदिर होने के कारण इसमें खगोलशास्त्र की जानकारी और कुछ बारीकियां दिखती होगी यह स्वाभाविक ही है। मंदिर के रथ को जो 24 पहिये लगे है, वह विशेष है, और उनमें कुछ रहस्यमय अर्थ छुपा है। रथ का पहिया यह सूर्य घड़ी (Sun Dial) है। दुनिया की यह एक मात्र सूर्य घड़ी है जो वर्टिकल है। दुनिया में अनेक स्थानों पर सूर्य घड़ी है, जो दिन का समय दिखाती है। लेकिन वे सब हॉरिजॉन्टल है। कुछ वर्षों के बाद जयपुर के सवाई जयसिंह ने निर्माण किये हुए जंतर-मंतर में जो सूर्य घड़ी है, वह भी हॉरिजॉन्टल ही है। दिन में, विशिष्ट समय पर सूर्य की जो छाया आती हैं, उसके अनुसार समय बताने की सुविधा सूर्य घड़ी में होती है।
कोणार्क मंदिर के रथ के पहिये भी ऐसे ही अचूक, सटीक और सही समय दिखाते है। इसके हर पहिये में आठ बड़े आरे (spoke) रहते है। यह आठ आरे, दिन के आठ प्रहरों को दिखाते है। कुछ दशक पहले तक, अपने यहां काल मापन के लिये ‘प्रहर’ को इकाई माना जाता था। एक प्रहर तीन घंटों का होता है। लेकिन इन आठ आरीयों के बीचोंबीच एक छोटी सी (पतली सी) आरी होती है। अर्थात एक प्रहर के दो भाग किये है। हर भाग देढ घंटे का हैं, अर्थात नब्बे मिनिट का।
इसमें एक और मजेदार बात है। जो आठ छोटे आरे है, उन पर तीस मणी, समान अंतर पर लगाए गए है। अर्थात, नब्बे मिनिट भाग 30 करने पर, एक मणी की कीमत तीन मिनिट होती है। मणी भी पूर्णतः गोल आकार के नहीं है। इलिप्टीकल है। उनकी रचना ऐसी हैं, की उन पर पड़ने वाली छाया के अनुसार उनके भी तीन भाग होते है। इसका अर्थ, अब इस सूर्य घड़ी के काल मापन की सबसे छोटी इकाई हैं, एक मिनिट।
अब उस पहिये के अक्ष (केंद्र बिन्दु) पर एखाद छोटी छडी रखने के बाद, उस बारीक छड़ी से, पहिये पर पड़ने वाली सूर्यप्रकाश की छाया से हमें दिन का बिल्कुल सही समय मिलता है।
अब यह प्रश्न मन में आता है कि, सूर्य का प्रवास तो छह महीने उत्तरायण और छह महीने दक्षिणायन में होता है। ऐसी स्थिति में, काल मापन कैसे होगा? इसलिये रथ के दोनों तरफ पहिये है। रथ की दिशा इस प्रकार रखी गई है कि उत्तरायण में एक तरफ के पहिये से समय देखना है, तो दक्षिणायन में दूसरी तरफ के पहिये से।
कितना अद्भुत है यह…!
775 वर्ष पूर्व, हमारे पूर्वजों ने इतनी कुशलता से इस सूर्य घड़ी की रचना की है, जैसे लगता है आज के जमाने के दीवार के घड़ी में हम समय देख रहे है। हमारे पूर्वज कितने परिपूर्णवादी (perfectionist) थे इसका और क्या प्रमाण चाहिये?
कोणार्क के रथों के पहिये से, दिन का समय हम जान सकते है, यह भी हमें बहुत बाद में पता चला। कुछ वर्ष पूर्व, एक साधु, एक पतली लकड़ी लेकर रथों के पहियों पर आई हुई छाया से कुछ देख रहा था। उससे लोगों को पता चला कि इससे हम समय देख सकते है।
लेकिन यह समय केवल सूर्य के प्रकाश में ही देखना संभव हैं। रात का क्या? तो कहा जाता है कि रथ के इन्हीं पहियों में चंद्रमा घड़ी भी छुपी हुई है। इस चंद्र घड़ी का उपयोग करके, रात का समय भी निकाल सकते है। सूर्य घड़ी के लिए केवल दो पहिये आवश्यक होते है। बाकी 22 पहियों का क्या काम? क्योंकि प्रत्येक पहिये पर की गई नक्काशी अलग-अलग है। दिन और रात के हर प्रहर में लोगों की दिनचर्या क्या होती है, ये उन पर रेखांकित किया गया है। दुर्भाग्य से इस चंद्र घड़ी को ‘डीकोड’ करना, हमें आज भी साध्य नहीं हुआ है। वह अभी तक एक रहस्य ही है।
ये सभी सूर्य मंदिर भारत के विशाल पट पर जिस पद्धति से निर्माण किये गये है, वो पद्धति, वो पैटर्न, हमें कुछ बताना चाहते है। हमारे दुर्भाग्य से पूर्वजों की यह रहस्यमय भाषा हम आज भी ठीक से समझ नहीं पाए है।
एक उदाहरण देता हूँ…
मध्य प्रदेश के सागर जिले में, रहली नाम का एक छोटा गाँव है। मराठी भाषिक लोगों के लिए इसका खास महत्व है। सागर के गोविंदपंत (खेर) बुंदेला के मृत्यु के पश्चात, खेर परिवार की एक महिला, लक्ष्मीबाई खेर ने, वर्ष 1790 में, रहली में विठ्ठल भगवान के एक सुंदर मंदिर का निर्माण किया। इसलिये रहली को, मराठी भाषिक ‘प्रति पंढरपूर’ कहते है।
किंतु रहली का महत्व इससे अलग है। इस रहली में, सुनार और देहार नदियों के संगम पर एक छोटासा और उपेक्षित ऐसा प्राचीन सूर्य मंदिर है। इस मंदिर की विशेषता यह है, कि कर्क वृत्त पर निर्मित यह मंदिर, मोढेरा और कोणार्क, इन दो मंदिरों के बिल्कुल बीच में बना है। जी हां… एकदम बीचोंबीच, बिल्कुल मध्य में। अक्षांश-रेखांश देखकर हम समझ सकते है।
कोणार्क मोढेरा रहेली
19”53’ 23”58’ 23”37’
86”05 72”13’ 79”06’
रेखांश का गणित देखिये।
कोणार्क 86”05’ – मोढेरा 72”13’ = 13”92’
इसको अगर दो से भाग किया, तो उत्तर हैं, – 6”96’
अब मोढेरा के रेखांश में ये जोड़े तो,
72”13 + 6”96’ = 79”09’
रहेली के सूर्य मंदिर के ये रेखांश है।
अक्षांश-रेखांश को कुछ देर के लिए छोड़ भी दे, तो भी मोढेरा और कोणार्क का वायू अंतर (air distance), या सेना की भाषा में ‘क्रो फ्लाय डिस्टन्स’, निकाला तो हम देखते हैं, कि बिल्कुल मध्य में यह रहेली का, उपेक्षित ऐसा छोटासा सूर्य मंदिर आता है।
हजारों वर्ष पूर्व, हमारे पूर्वजों के पास पृथ्वी की दूरी नापने की क्या पद्धति रही होगी, जिससे इन सूर्य मंदिर की रचना की होगी?
ये सब अनाकलनीय और रहस्य से भरा है। हमारे पुरखों का खगोलशास्त्र का ज्ञान जबरदस्त था। मंदिरों की रचना और मूर्तियों के माध्यम से यह ज्ञान, हमारे सामने रखने का प्रयास भी किया है।
और हम आधुनिकता का डंका बजाने के बाद भी, हमारे प्राचीन ज्ञान को, हमारे संचित को, हमारी विरासत को ठीक से समझ ही नहीं पाए है!

