राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध – एक अलौकिक अनुभव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विजय दशमी के पावन पर्व पर अपनी एक शताब्दी की यात्रा पूरी कर ली है। हम सब ने बहुत कुछ जाने अनजाने में इस संस्था के कार्य और उनकी संरचना के बारे में सुना है या फिर स्वयं भी किसी न किसी रूप में अनुभव किया है। मेरा भी इस संगठन से जुडाव कुछ इसी प्रकार हुआ।मैं 31मई 2011 को भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुआ। तब तक, मैने इस संगठन के बारे में केवल अखबारों में, पत्रिकाओं में या फिर कभी किसी राजनीतिक चर्चाओं में सुना था। मैं अब यह कह सकता हूं कि एक ऐसा संगठन जिसने अपने आप को केवल मानवता और राष्ट्र को समर्पित कर दिया, मैं स्वयं सेना की नौकरी में कार्यान्वित होने के कारण इस संगठन के उत्कृष्ट कार्यो से अनभिज्ञ रहा। ऐसा भी नहीं, कि मैंने अपने सेना के सेवाकाल में, इस संगठन के कार्यों का अनुभव नहीं किया, लेकिन कभी ध्यान ही नहीं दिया कि, यह निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता है।

सेवानिवृत्त के बाद, मुझे इस संगठन के कुछ कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला, इसमें मुझे एक अप्रत्याशित सुख का अनुभव हुआ। कभी कभी, कुछ विविध संगठन मुझे अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित करने लगे, मैं जाने लगा, मुझे भी जाकर बहुत अच्छा लगता था। आत्मीयता, सहजता, नम्रता का व्यवहार मुझे बहुत ही प्रभावित करता था।

सभी को आदर, सदैव भाषा की मर्यादा का पालन, अनुशासन और समय का पालन, मुझे अपने सेना के सेवाकाल की यादों में ले जाता था।धीरे-धीरे, मै बिल्कुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक की कार्यशैली में पूरी तरह से रम गया। मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के सम्पर्क में भी आने लगा, उनकी विचारधारा, नैतिक मूल्य और राष्ट्र के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की भावना मुझे बहुत ही प्रभावित करने लगी, क्योंकि ये वही मूल्य थे जिनको मैं सेना में रहते हुए पूर्णरूपेण स्वीकार कर चुका था। इसलिए मुझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में फिर से अपनापन लगने लगा और मैं प्राकृतिक रूप से इस परिवार का एक छोटा सा हिस्सा बन गया।

‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ का यह वाक्य केवल वाक्य नहीं है, मैने इन 12/13 वर्षों में इस पर कैसे अमल किया जाता है स्वयं देखा है। ‘संकल्प से सिद्धि’ किस प्रकार प्राप्त होती है, यह मैंने अनुभव की है। जब भी कोई समस्या, किसी भी क्षेत्र से हो, आती है, तो उस पर गहन विचार किया जाता है, सामूहिक चर्चा होती है, सभी को पूर्ण स्वतंत्रता होती है अपने विचार रखने की, और फिर, इस समस्या के समाधान के विकल्पों पर विचार कर के निर्णय लेने की पद्धति, एक समावेशी कार्यशैली जिसमें सभी भागीदार हों को इंगित करती है। यही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विशेषता है।मैं पूर्ण रूप से आश्वस्त हूं और पूरे विश्वास के साथ कहना चाहता हूं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना एक दैवीय संयोग है । भारत की पहचान, भारत की संस्कृति की निरंतरता, भाषाओं, विरासत,धरोहर और परंपराओं की रक्षा के लिए ईश्वर ने इस संगठन की स्थापना की है। अगर विजय दशमी के दिन, वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना परम पूजनीय डा. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नहीं की जाती, तो हमारे प्रिय भारत का भविष्य क्या होता शायद कोई नहीं बता सकता। केवल कल्पना की जा सकती है। कठिन परिस्थितियों में, कोई भी साधन न उपलब्ध होने के बाबजूद भी ये मुठ्ठी भर कर्मठ, निष्ठावान कार्यकर्ता, अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना सर्वोच्च समर्पित कर के ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के मार्ग पर प्रशस्ति हो गये और हमारे प्राणों से भी प्यारे भारत की भारतीयता की रक्षा की।असंख्य कठिनाइयों, सामाजिक, प्रशासनिक, राजनीतिक विरोध और बहुत ही न्यूनतम साधनों के साथ के बावजूद लगन, ये भारत के वीर अपनी प्रतिबद्धता और निष्ठा के साथ समर्पण भाव से केवल राष्ट्र और समाज निर्माण के लिए दृढ़ संकल्प के साथ लगे रहे। भारत को और भारतीयता को बचाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का योगदान अकल्पनीय है, अनुकरणीय है।आज जब यह बटवृक्ष बहुत विशाल रुप धारण कर चुका है तो मुझे लगता है कि यह उन महान विभूतियों के संघर्ष, त्याग तपस्या और बलिदान के कारण ही संभव हुआ है। मैं स्वयं भी एक सैनिक हूं,और निस्वार्थ सेवा, सेवा परमोधर्म, त्याग, बलिदान के अर्थ भली-भांति समझता हूं, लेकिन जो राष्ट्र प्रेम, समाज सेवा और राष्ट्र प्रथम की भावना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक प्रदर्शित करते हैं उसके लिए शायद कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं है यह एक उत्कृष्ट, अद्वितीय और अनुकरणीय मूल्य हैं जिनको हम शब्दों में नहीं बांध पायेंगे, केवल इसका अनुभव ही कर पायेंगे।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार आज राष्ट्र के हर आवश्यक क्षेत्र, जैसे कि आदिवासी और जन जातीय उत्थान,महिला सशक्तिकरण, जनसंख्या असुंतलन, राष्ट्रीय सुरक्षा, परिवार प्रबोधन, सामाजिक समरसता, विज्ञान और तकनीकी विकास, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और आधुनिकीकरण, कृषि क्षेत्र में सुधार, प्रचार के विश्वसनीय माध्यम, विमर्श निर्माण, शिक्षा पद्धति का भारतीयकरण, क्रीडा विकास, नागरिक कर्तव्य, नक्सली गतिविधियां पर नियंत्रण पूर्वोत्तर राज्यों का विकास, व्यक्ति/चरित्र निर्माण , भारतीय विरासत/परंपराओं की रक्षा, पारंपरिक भाषाओं का उत्थान, भारतीय खान-पान में गर्व, राष्ट्रीय तीज त्यौहारौं को उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाना , आधार भूत संरचना का विकास, न्याय व्यवस्था का भारतीयकरण, प्रशासनिक सुधार, रोजगार के अवसर, स्वाबलंबन, पर्यावरण ,आत्मनिर्भरता, इत्यादि सभी क्षेत्रों में बहुत ही गुणात्मक रूप से हो चुका है।बहुत ही उत्कृष्ट और अकल्पनीय कार्य हो रहा है । भविष्य के लिए भी बिल्कुल स्पष्ट प्रतिमान स्थापित किये जा चुके हैं और उनको प्राप्त करने के लिए पूरी गति से कार्य चल रहा है।एक बहुत ही महत्वपूर्ण दृष्टिकोण की तरफ में आप सब का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। इस संगठन में जब आप पूरी तरह से रम जाते हैं तो आप को स्वयं यह अनुभव होता है कि आप राष्ट्र के सबसे शिक्षित, अनुभवी और त्यागी महापुरुषों के बीच में है। सभी पढ़े-लिखे हैं, अनुभवी है और यह सब अनुभव केवल पुस्तकों से न होकर, जमीन पर जाने से, लोगों से मिलकर, स्वयं अनुभव करके और कुछ प्रतिष्ठित और ज्ञानी लोगों से चर्चा करके प्राप्त हुआ है। जब भी आप कार्यकर्ताओं से विचार विमर्श करते हैं तो आपको एक बहुत ही रोचक अनुभूति होती है। सादा जीवन उच्च विचार को चरितार्थ करते हुए, यह संगठन और स्वयंसेवक कभी भी, किसी भी उपलब्धि का श्रेय लेने को मुखर नहीं रहते,श्रेय लेना उनका व्यक्तित्व नहीं है। सदैव इनका भाव रहता है राष्ट्र की, मानवता की, पर्यावरण की परिवार की समाज की किस प्रकार सेवा की जा सकती है। सेवा, सहायता, विकास, प्रगति गरीब कल्याण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र की एकता एवं अखंडता ही इस संगठन का मूल मंत्र है और ये भारत के वीर उस पथ पर निश्चल, निडर होकर सदैव आगे बढ़ते जा रहे हैं।मेरा यह सौभाग्य रहा कि जाने अनजाने में ही सही मैं इस अद्वितीय संगठन से जुड गया हूं। मैं स्वयं अपने आपको गौरवान्वित अनुभव करता हूं कि एक ऐसा संगठन जो भारत, भारतीयता, और भारतीयों के लिए कार्य करती है और राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र प्रथम के अतिरिक्त इसके केंद्रबिंदु में और कोई भी विचार नहीं है, मैं उस संगठन से संबंधित हूं। इस दौरान मैं कुछ अभूतपूर्व महानुभावों से भी मिला जिन्होंने मेरे जीवन को एक सकारात्मक नई दिशा दी है। मेरे अपने व्यक्तित्व में भी मैं बहुत कुछ सकारात्मक परिवर्तन देख सकता हूं। मैं जितना भी इस संगठन से जुडता जा रहा हूं मुझे उससे भी ज्यादा सुख की अनुभूति होती है। यह मैं समझता हूं कि एक दैवीय प्रवृत्ति है कि आप जब त्यागी, निस्वार्थवादी महानुभावों से मिलते हैं तो सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है और आप अपने-आप सबल होकर इन राष्ट्र प्रेमियों के साथ कदम से कदम मिलाकर कर भारत को यश और कीर्ति के शिखर पर ले जाने के मार्ग पर प्रशस्त हो जाते हैं।मैं अपने अदभुत अनुभूति को इसलिए लिख रहा हूं कि जिनके भी हृदय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में कुछ भ्रांतियां हैं वो अवश्य ही इस संगठन से जुड़ें , सभी भ्रांतियां दूर हो जायेंगी, और एक नवीन ऊर्जा का निर्माण होगा जो सकारात्मक होगी और राष्ट्र और व्यक्ति के निर्माण में सार्थक होगी। तेरा वैभव अमर रहे मां।

हम चार दिन रहें न रहें।

भारत माता की जय

About विश्व संवाद केंद्र छत्तीसगढ़

View all posts by विश्व संवाद केंद्र छत्तीसगढ़ →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *