आभासी दुनिया से बच्चों को बचाने में कारगर होंगे पारिवारिक संस्कार

आज का दौर तकनीक का दौर है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने जीवन को आसान, तेज और सुविधाजनक जरूर बनाया है, लेकिन इसके साथ एक गहरी चिंता भी जुड़ गई है—बचपन का बदलता स्वरूप। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में बच्चों के बीच सोशल मीडिया की बढ़ती लत अब एक सामाजिक और पारिवारिक संकट का रूप लेती दिख रही है। सार्वजनिक स्थानों से लेकर घर के भीतर तक, मोबाइल स्क्रीन ने बच्चों की दिनचर्या, सोच और व्यवहार पर गहरा प्रभाव डाला है। अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि बच्चे पढ़ाई, खेलकूद और सामाजिक मेलजोल से दूर होकर एक आभासी दुनिया में खोते जा रहे हैं। ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, भारत में 14 से 16 वर्ष आयु वर्ग के बहुत बड़े प्रतिशत बच्चे स्मार्टफोन का नियमित उपयोग कर रहे हैं। यह उपयोग केवल शैक्षणिक उद्देश्य तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया, गेमिंग और मनोरंजन सामग्री पर अधिक केंद्रित है। कई सर्वे यह भी बताते हैं कि बच्चे रोज़ाना तीन से चार घंटे या उससे अधिक समय ऑनलाइन बिता रहे हैं। यह समय यदि नियंत्रित और सकारात्मक उपयोग में न आए तो मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

सोशल मीडिया की लत को लेकर न्यायपालिका भी चिंता जता चुकी है। हाल के वर्षों में अदालतों ने इंटरनेट और सोशल मीडिया पर बच्चों की सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया है। यह बात सही है कि वयस्कों के लिए क्या देखना है और क्या नहीं, यह उनका व्यक्तिगत चुनाव हो सकता है, लेकिन बच्चों के मामले में जोखिम कहीं अधिक है। उनकी समझ, निर्णय क्षमता और भावनात्मक परिपक्वता अभी विकसित हो रही होती है। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।बच्चों में बढ़ती डिजिटल निर्भरता का असर उनके व्यवहार में भी दिखने लगा है। कई अभिभावक शिकायत करते हैं कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग ने बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, आलस्य और एकाकीपन बढ़ा दिया है। आभासी दुनिया में मिलने वाली त्वरित संतुष्टि—लाइक्स, फॉलोअर्स, वर्चुअल जीत—उन्हें वास्तविक जीवन की मेहनत और धैर्य से दूर कर रही है। यही कारण है कि छोटी-छोटी असफलताओं पर भी वे अत्यधिक निराश या आक्रामक हो जाते हैं।

कोरोना काल के बाद से ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल माध्यमों पर निर्भरता बढ़ी, जो उस समय की आवश्यकता थी। परंतु धीरे-धीरे यही आवश्यकता आदत और फिर लत में बदलती चली गई। इंटरनेट पर उपलब्ध हर सामग्री बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होती। कई बार काल्पनिक कहानियाँ, हिंसक गेम, भ्रामक ट्रेंड और खतरनाक चुनौतियाँ बच्चों के मन पर ऐसा प्रभाव डालती हैं कि वे गलत कदम उठाने से भी नहीं हिचकते। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।

हालाँकि तकनीक का दूसरा पक्ष भी है। इंटरनेट पर शैक्षणिक सामग्री, ज्ञानवर्धक वीडियो, कौशल विकास के कोर्स और रचनात्मक मंच भी उपलब्ध हैं। समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसका अनियंत्रित और असंतुलित उपयोग है। इसलिए समाधान प्रतिबंध मात्र नहीं, बल्कि सही दिशा, मार्गदर्शन और संस्कारों में छिपा है। यहीं पर भारतीय पारिवारिक व्यवस्था और सांस्कृतिक परंपराओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय संस्कृति में परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि मूल्यों, व्यवहार और जीवन दृष्टि का पहला विद्यालय रहा है। यदि बच्चों का भविष्य अंधेरे में जाता हुआ प्रतीत हो रहा है, तो संस्कार रूपी प्रकाश जलाने की जिम्मेदारी भी परिवार की ही है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों से संयम की अपेक्षा करना व्यर्थ है। इसलिए पहला कदम अभिभावकों को स्वयं उठाना होगा। घर में कुछ समय “नो मोबाइल जोन” तय किए जा सकते हैं—जैसे भोजन के समय, सोने से पहले का समय, या पारिवारिक बातचीत का समय। इससे बच्चों को यह संदेश जाता है कि परिवार और आपसी संवाद किसी भी स्क्रीन से अधिक महत्वपूर्ण है।

बच्चों के हाथ में बहुत कम उम्र से मोबाइल देना उचित नहीं। उन्हें अच्छे-बुरे का अंतर समझाने के लिए नैतिक कहानियाँ, प्रेरक प्रसंग और जीवन मूल्यों से जुड़े उदाहरण सुनाए जाएँ। भारत की महान विभूतियों—स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे व्यक्तित्वों के जीवन प्रसंग बच्चों को बताएं। उन्हें समझाएँ कि इन महान लोगों ने अपने आत्मबल, अनुशासन और नैतिकता के बल पर जीवन को सार्थक बनाया, न कि आभासी लोकप्रियता के सहारे। बच्चों के साथ अधिक समय बिताना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। संयुक्त परिवार हो या एकल, हर सदस्य की भूमिका महत्वपूर्ण है। दादा-दादी, नाना-नानी जैसे बुजुर्ग बच्चों को कहानियों, अनुभवों और स्नेह के माध्यम से जीवन की गहराई सिखा सकते हैं। माता-पिता यदि रोज़ कुछ समय केवल बच्चों के लिए सुरक्षित रखें—बिना मोबाइल के—तो बच्चे भावनात्मक रूप से अधिक सुरक्षित महसूस करेंगे। शारीरिक गतिविधियाँ और खेल भी डिजिटल लत को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। घर के भीतर की सुविधा हो या बाहर का मैदान, बच्चों को खेलों के लिए प्रेरित करें। खेल न केवल शरीर को स्वस्थ रखते हैं, बल्कि टीमवर्क, धैर्य और अनुशासन भी सिखाते हैं। कला, संगीत, चित्रकला, पुस्तक पढ़ने की आदत जैसे रचनात्मक शौक भी बच्चों का ध्यान सकारात्मक दिशा में मोड़ सकते हैं।

बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर चीज वास्तविक नहीं होती। वहाँ की दुनिया अक्सर सजाई-संवारी, आंशिक या काल्पनिक होती है। लाइक्स और फॉलोअर्स से अधिक मूल्यवान वास्तविक दोस्ती, परिवार का स्नेह और जीवन के अनुभव हैं। भावनाओं पर नियंत्रण, धैर्य और आत्मसम्मान की शिक्षा उन्हें आभासी तुलना की दौड़ से बचा सकती है।ऑनलाइन सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। बच्चों को सिखाया जाए कि वे अपनी निजी जानकारी—नाम, पता, स्कूल का नाम, पासवर्ड—कभी भी सोशल मीडिया पर साझा न करें। अभिभावक बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें, लेकिन ऐसा नियंत्रण संवाद और विश्वास के साथ हो, न कि केवल डर के आधार पर। नैतिक शिक्षा का महत्व आज और बढ़ गया है। सात्विकता, धैर्य, संयम, सेवा भाव—ये केवल धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि संतुलित जीवन के आधार हैं। सुबह जल्दी उठना, योग और ध्यान जैसी आदतें मन को शांत करती हैं और डिजिटल उत्तेजना की लत को कम करने में मदद करती हैं। बच्चों को दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित करें। इससे उनमें सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू है—अभिभावकों का अत्यधिक लाड़-प्यार। कई बार बच्चे किसी भी जिद पर मोबाइल या स्क्रीन टाइम पा जाते हैं। इससे उनके मन में यह धारणा बन जाती है कि हर इच्छा तुरंत पूरी होनी चाहिए। यह आदत भविष्य में उन्हें निराशा सहने की क्षमता से वंचित कर देती है। बच्चों को “ना” सुनने और असफलता को स्वीकार करने की शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है। नई तकनीक का उपयोग गलत नहीं, परंतु संतुलन आवश्यक है। बच्चों को तकनीक का उपयोग सीखने, रचनात्मकता और ज्ञान के लिए करना सिखाएँ, न कि केवल मनोरंजन और पलायन के लिए। परिवार, समाज और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर ऐसी वातावरण बनाना होगा जहाँ डिजिटल साधन सहायक हों, संचालक नहीं।

अंततः समाधान कानूनों से अधिक संस्कारों में है। प्रतिबंध जरूरी हो सकते हैं, पर स्थायी समाधान परिवार के भीतर से ही निकलेगा। भारतीय पारिवारिक व्यवस्था ने सदियों से संवाद, अनुशासन, प्रेम और मूल्यों के सहारे पीढ़ियों को दिशा दी है। आज फिर उसी जड़ों की ओर लौटने का समय है।यदि हम बच्चों को समय, स्नेह, मार्गदर्शन और मूल्य देंगे, तो वे आभासी दुनिया में खोने के बजाय वास्तविक दुनिया में मजबूत पहचान बनाएँगे। संस्कारों की यह रोशनी ही उन्हें डिजिटल अंधेरे से बचाकर संतुलित, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बना सकती है। यही आज की सबसे बड़ी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी है।

– रूमा सेनगुप्ता

( लेखिका पत्रकार हैं)

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