कैंसर से बचाएगी स्वदेशी जीवनशैली

सुधारना होगा लाइफस्टाइल, तभी आएगी चेहरों पर स्माइल

विश्व कैंसर दिवस पर विशेषः

युवाओं में बढ़ रहे हैं कर्क रोग के आंकड़े

दृश्य 1- एक पर्व का अवसर है, टीवी पर विज्ञापन चल रहा है कि कुछ मीठा हो जाए। घर के लोग तय करते हैं कि इस बार पारंपरिक मिठाई नहीं बनाई जाएगी। चॉकलेट, कुकीज़, बिस्किट्स, केक, चिप्स और स्नैक्स (नमकीन) बाजार से आएगा। हर दृश्य कोई नया नहीं है, लगभग हर घर में दिखाई देने लगा। ताजा आंकड़ों को देखें तो लगभग 96.55% भारतीय घरों में प्रोसेस्ड फूड का उपयोग किया जा रहा है। इससे होगा क्या, आगे देखते हैं।

दृश्य 2- घर में मेहमान आए हुए हैं। घर में कुछ पकाने के बजाए बाजार से ऑर्डर करने पर हर कोई राज़ी है। दिक्कत भी क्या है, हर मोबाइल में फूड सर्विस एप हैं। तीस मिनट में पिज्जा घर के दरवाजे तक पहुंच रहा है। गर्मागरम पिज्जा लजीज लग रहा है। लेकिन यह कोई नहीं सोच रहा है कि जब घर में हम तीस मिनट में पिज्जा नहीं पका सकते तो ये पिज्जा बनाकर, फिर ट्रैफिक को चीरते हुए शहर के किसी भी कोने तक कैसे पहुंचा रहा है। इसका मतलब साफ है कि पहले से गूंथा हुआ बासा आटा और पहले से पकी हुई अधकचरी सब्जियों को प्रोसेस्ड सॉस के साथ पकाकर भेजा जा रहा है। भारत में प्रोसेस्ड और पैक्ड फूड की खपत तेजी से बढ़ रही है, जिसमें 20 वर्षों में 4000% की भारी वृद्धि हुई है और अब सालाना खपत लगभग ₹3.5 लाख करोड़ तक पहुंच गई है। इससे आपका क्या लेना-देना, वह भी आगे जानते हैं।

दृश्य 3- प्रत्येक दूसरे घर का हाल है देर रात तक जगना और सुबह देर से उठना। हमें इसी में सुख मिलने लगा है। देर तक टीवी देखना, मोबाइल से चिपके रहना। जमीन पर आलथी-पालथी लगाकर बैठना भूल चुके हैं। पूजा पाठ भी कुर्सी पर बैठकर हो रही है। छोटे-छोटे बच्चे भी टेबल कुर्सी के आदि हैं। व्यायाम के नाम पर शून्य। परिवार में ज्यादातर सदस्य मोटापे का शिकार हो रहे हैं।

दृश्य चार- टीवी पर लोकलुभावन कॉस्मेटिक्स के विज्ञापन आ रहे हैं। कोई गोरा करने का दावा कर रहा है, कोई त्वचा में चमक बढ़ाने का। तेरी साड़ी, मेरी साड़ी से सफेद कैसे? जैसे जुमलों से हम बाजारवादी शिकंजे में फंसते जा रहे हैं। नवजात बच्चों को बिना सोचे समझे विदेशी कम्पनियों के तेल, पावडर और क्रीम लगाई जा रही है। दादी-नानी के नुस्खे पुरान और बेकार लगने लगे हैं। छोटे बच्चों की मालिश परंपरागत तरीकों से नहीं, बल्कि बाजार के अनजाने विशेषज्ञों की राय पर हो रही है। अब आप कहेंगे कि यह तो आज की लाइफस्टाइल है, आपका क्या लेना देना?हमारा ही नहीं, हम सबका इससे लेना-देना है क्योंकि हर वर्ष 4 फरवरी को आने वाला विश्व कर्क (कैंसर) दिवस हमें फिर स्मरण करवा रहा है कि वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर कैंसर के लगभग 2 करोड़ नए मामले सामने आए हैं, जिनमें से 1 करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 2050 तक कैंसर के 3 करोड़ से अधिक नए मामले सामने आएंगे। अनुमान है कि 2026 तक भारत में कैंसर के नए मामलों की संख्या 15 लाख के पार पहुंच सकती है।अब इसके पीछे कई कारण हैं। पहला और महत्वपूर्ण कारण हमारी वही आधुनिक लाइफ स्टाइल है, जिस पर हम दंभ भरते हैं। नशा, खराब खानपान, पर्यावरण में मौजूद घातक तत्व, मोटापा कैंसर का कारण बनता है। जॉनसन एंड जॉनसन जैसी कई विदेशी कॉस्मेटिक कंपनियों के उत्पाद कैंसर का कारण बन रहे हैं। लेकिन हम पूरी तरह से अनजान केवल बाजारवाद की ताकतों के हिसाब से चलने के आदी हो चुके हैं। भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों का सबसे प्रमुख कारण तंबाकू का अत्यधिक सेवन है। पुरुषों में होने वाले लगभग 50% और महिलाओं में 20% कैंसर सीधे तौर पर तंबाकू (धूम्रपान और चबाने वाले तंबाकू) से जुड़े होते हैं। इसके साथ ही शराब का सेवन लिवर, गले और ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। तंबाकू और शराब का संयुक्त सेवन शरीर की कोशिकाओं को बहुत तेजी से क्षतिग्रस्त करता है, जिससे कैंसर की शुरुआत होती है।दूसरा प्रमुख कारण प्रोसेस्ड फूड, अधिक चीनी और हानिकारक फैट्स की मात्रा बढ़ना है। अनियत्रिंत खानपान व व्यायाम की कमी से होने वाला मोटापा कैंसर का बड़ा कारण है। शरीर में बढ़ा हुआ फैट हार्मोन्स के असंतुलन और आंतरिक सूजन को जन्म देता है, जो धीरे-धीरे स्वस्थ कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं में बदल सकता है। मोटापा एक दर्जन से अधिक कैंसर से कारण बनता है, जिनमें स्तन और कोलोन कैंसर जैसे कुछ बढ़ते हुए कैंसर भी शामिल हैं। 2024 में प्रोसेस्ड फूड बाजार का मूल्य $121.3 बिलियन (अमेरिकी डॉलर) था, जो 2033 तक $224.8 बिलियन तक जाने की उम्मीद है। अधिकांश घर अब पैकेटबंद भोजन का उपयोग करते हैं। वायु प्रदूषण में मौजूद PM 2.5 जैसे कण अब फेफड़ों के कैंसर के लिए धूम्रपान जितने ही जिम्मेदार माने जाते हैं। इसके अलावा, भोजन में कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग और रासायनिक रंगों की मिलावट सीधे हमारे डीएनए को नुकसान पहुंचा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में साफ पानी की कमी और कीटनाशकों के असुरक्षित उपयोग के कारण पेट और किडनी के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कैंसर भारत में मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। इसकी मुख्य वजह यह भी है कि बीमारी का देर से पता चलता है, अक्सर तीसरे या चौथे चरण में।

बचाव के लिए अपनाएं स्वदेशी जीवनशैली कहा गया है कि उपचार से बचाव भला। कैंसर से अपने लोगों को बचाने के लिए हमें स्व की ओर लौटना होगा। स्वदेशी जीवन शैली अपनाकर हम कैंसर के खतरे से बच सकते हैं। इसमें प्राकृतिक खान-पान, योग, आयुर्वेद और शारीरिक सक्रियता शामिल है। भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए पारंपरिक, समग्र दृष्टिकोण यानि होलिएस्टिक अप्रोच और संतुलित आहार महत्वपूर्ण हैं, जो शरीर को अंदर से मज़बूत बनाते हैं।

 स्वस्थ स्वदेशी जीवन शैली के लिए ये करें–

फल, सब्जियां, और साबुत अनाज का सेवन कैंसर के जोखिम को कम कर सकता है। प्रसंस्कृत और जंक फूड से परहेज करें।-नियमित व्यायाम और योग कैंसर से बचाव के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है और यह वजन नियंत्रित रखने में मदद करता है।-तंबाकू और शराब का सेवन न करना कैंसर से बचने का सबसे बड़ा उपाय है, क्योंकि ये फेफड़ों और अन्य कैंसर का प्रमुख कारण हैं।-भारत में कैंसर के लिए पारंपरिक और समग्र दृष्टिकोण अपनाना, जिसमें आयुर्वेद, योग, और ध्यान शामिल है, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के संतुलन में मदद कर सकता है।-सुंदरता की सनातन परिभाषा समझें, पाश्चात्य से आई हुई नहीं। आंतरिक सुंदरता पर बल दें। बाहरी सुंदरता के लिए भी हमारे पास हजारों देसी कारगर नुस्खे हैं। उन्हें उपयोग में लाएं। -प्लास्टिक का कम से कम उपयोग करें।

नियमित रूप से रखें उपवास

नियमित रूप से उपवास रखें। पहले हमारे यहां कोई सोमवार का व्रत रखता था, कोई मंगलवार का। प्रदोष, चतुर्थी, एकादशी की तिथियों में भी नियमित उपवास रखने की रीत थी। शोध में पता चला है कि भोजन के उपवास से कैंसर के खिलाफ शरीर का नेचुरल डिफेंस सिस्टम मजबूत बनता है। व्रत नेचुरल किलर सेल्स के काम को बढ़ाने में मदद करता है। ये इम्यून सिस्टम के ऐसे फैक्टर्स हैं, जो कैंसर सेल्स पर अटैक करते हैं। एक शोध से पता चला है कि मेटाबॉलिक शिफ्ट की वजह से उन्हें कैंसर सेल्स को नष्ट करने की क्षमता मिलती है। उपवास करने से शरीर में नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट बढ़ने लगते हैं, जो कोशिकाओं को कैंसर से होने वाले नुकसान से बचा सकते हैं। बजट 2026 में केंद्र सरकार ने भी कैंसर की दवाओं में दी है राहतविश्वभर में भले ही कैंसर के निदान के लिए कई उपचार उपलब्ध हैं, लेकिन इसके बाद भी कैंसर ऐसा रोग है, जिसका नाम सुनते ही हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि यह रोग तो शरीर को मृत्युशैया की तरफ ले ही जाता है, अपितु इसकी थैरेपी भी कष्टप्रद होती है। उपचार खर्चीला और थकाऊ होता है। हाल ही में प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026 में कैंसर और दुर्लभ रोगों से जूझ रहे मरीजों को बड़ी राहत दी गई है। जीवनरक्षक दवाओं पर सीमा शुल्क में छूट दी गई। केंद्रीय बजट 2026 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कैंसर और दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण राहत पैकेज की घोषणा की है। बजट में 17 कैंसर संबंधी दवाओं पर बेसिक कस्टम्स ड्यूटी हटाने और 7 दुर्लभ बीमारियों के उपचार में प्रयुक्त दवाओं और चिकित्सा पोषण आहार पर सीमा शुल्क में छूट प्रदान करने की घोषणा की गई है। इसका उद्देश्य इन जीवनरक्षक उपचारों को अधिक सुलभ और किफायती बनाना है। इन दवाओं पर लगने वाला शुल्क उपचार की कुल लागत को काफी बढ़ा देता था। शुल्क हटाने से अब यह उम्मीद की जा रही है कि उन्नत कैंसर उपचारों की लागत में सीधा और ठोस कमी आएगी। इससे आम और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को भी बेहतर इलाज तक पहुंच मिल सकेगी।

प्रियंका कौशल

पत्रकार

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