टूटते परिवार, बिखरते बच्चे

एकल परिवारों में एकांकी जीवन जीने को मजबूर बच्चे और वृद्ध

भारत को केवल भारतीयता ही बचा सकती है

परिवार प्रबोधन:आज की महती आवश्यकता

गाजियाबाद की घटना दिल दहला देने वाली है। तीन बच्चियां, जो कि सगी बहनें हैं, आधी रात में खिड़की से कूदकर आत्महत्या कर लेती हैं। देश में यह पहली घटना नहीं है, पहले भी कई किशोर इसी तरह प्राण दे चुके हैं। इसके पीछे दो कहानियां हैं, या यू कहें कि दो तरह की समस्या है, पर दोनों का हल एक ही है, वह है भारतीयता का बोध, यानि स्व का बोध, परिवार प्रबोधन का बोध।

पहले समस्या पर बात करते हैं, फिर समाधान पर आएंगे। परिवार के अनुसार बच्चियां ऑनलाइन कोरियन गेम्स खेल रही थीं। गेम में 50 टास्क थे, अंतिम पचासवें टास्क में उन्होंने अपनी जान दे दी। इसका आशय है कि बच्चियां लंबे समय से कोरियन गेम खेल रही थीं, लेकिन परिवार ने ध्यान नहीं दिया। असल समस्या एकल परिवारों में एकांकीपन की है। बच्चे क्या खेल रहे हैं, कैसे जीवन जी रहे हैं, उनके मन में, उनके कमरों में, उनके मोबाइल फोन में क्या चल रहा है, ये देखने वाला कोई नहीं है। या तो वे ऑनलाइन गेम में ट्रैप होकर जान गवां रहे हैं, या फिर किसी रैकेट का शिकार होकर अपनी अस्मिता दांव पर लगा रहे हैं। जब तक कोई बड़ी घटना ना हो जाए, तब तक ना परिवारों को पता चलता है, ना ही पड़ोसियों को। ऐसा वातावरण हमने स्वयं बनाया है कि हम घर, परिवार,मोहल्ला, सोसायटी, समाज से कटकर रह गए हैं। सबके बीच में होते हुए भी नितांत अकेले।

अब समय है कि हम अपनी विरासत को पहचानें। भारत की परंपरा संयुक्त परिवारों की रही है। हमने केवल घर या परिवार ही नहीं तोड़े, बल्कि अपने वृद्धजनों और बच्चों को तोड़कर रख दिया है। अधिकांश परिवारों में बीच की पीढी यानि 30 से 50 वय की उम्र वाले सदस्य, चाहे स्त्री हो पुरुष, अर्थोपार्जन में लगे हैं। उनसे बड़ी और बाद की पीढ़ी अपने खाली समय का उपयोग कैसे कर रही है, इससे किसी कोई लेना देना नहीं है। वृद्ध लोगों की सेवा नहीं हो रही है, बच्चों की सही पालना नहीं हो रही है। हमें इस समस्या से छूटने के लिए एक साथ आना होगा। सेवा, संयम, सहनशीलता, समर्पण जैसे गुणों का पुनः विकास करना होगा। केवल परिवार ही नहीं, पास पड़ोस की चिंता भी करनी होगी। जैसा हमारे पूर्वज करते आए हैं। यह बहुत पुरानी बात भी नहीं है। पर हमारी पीढ़ी ने एक सिरा छोड़ दिया है, जो हमें फिर से पकड़ना होगा। हमें अपने परिवार का प्रबोधन करना होगा। यह स्वयं के घर से प्रारंभ कर सोसायटी, फिर मोहल्ले और पूरे क्षेत्र में करना होगा।

अब आप कहेंगे कि ये परिवार प्रबोधन क्या है? अरे वही है, जो हमारे घरों में बीस-तीस वर्ष पूर्व तक होता रहा है, कई घरों मे आज भी होता है। घर के सभी सदस्य कम से कम दिन में एक बार एकत्र हों। एक दूसरे की पूछ परख करें। दिन में कोई भी समय का भोजन सब साथ में करें। साथ में पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन करने का नियम बनाएं। सप्ताह में कोई ऐसा कार्यक्रम हो, जब घर के पास-पड़ोस के लोग भी एकत्रित हों। सब एक दूसरे को जानें। चाहें तो बारी-बारी से सभी सत्यनारायण भगवान की कथा करें। हनुमान चालीसा का आयोजन करें। सुंदर कांड पढ़ने का नियम बनाएं। तीज-त्यौहार महोल्ले, कॉलोनी, सोसायटी के साथ मिलकर मनाएं। एक-दूसरे के घर प्रसाद भेंजे।

इस सबका बच्चों और वृद्धों पर ही नहीं, बल्कि हर आयु के लोगों पर चमत्कारी असर होगा। आपस में प्रेम, स्नेह और सहयोग बढ़ेगा। कोई भी स्वयं को अकेला अनुभव नहीं करेगा। विपत्ति आने पर कई हाथ सहयोग के लिए उठेंगे। बच्चों की निगरानी स्वमेव होती रहेगी। घर, परिवार, मोहल्ला सुरक्षित होगा तो जीवन के दैनिक कार्य भी सुचारू होंगे। जीवन में निश्चिंतता आने पर हर कार्य के ज्यादा अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे।

प्रियंका कौशल

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