कई बार ऐसा सुनने में मिलता है कि जनजातीय समाज के लोग पिछड़े हैं, वह समाज के मुख्यधारा से अलग हैं, वह वनों में रहले हैं इसलिए शेष भारत के समाज से उनका कोई विशेष सरोकार नहीं है। ऐसा कहने वाले लोग या तो जनजातीय समाज के योगदान को नहीं जानते हैं या फिर वह भारत को कमजोर करने के लिए ऐसी विभाजनकारी सोच रखते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन को ही ले लीजिए, वनवासी समाज ने देश की स्वतंत्रता के लिए अनेक ऐसे संघर्ष और क्रांतियां की, जिनसे अन्य आंदोलनों को प्रेरणा मिली। ऐसे ही एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर बुधु भगत की 17 फरवरी 2026 को 234वीं जयंती है।

17 फरवरी को 1792 को झारखंड की राजधानी रांची के चान्हो प्रखंड स्थित सिलागाई में उनका जन्म हुआ था। अंग्रेज छोटा नागपुर के वनवासी इलाके में बहुत ही निर्दयता से लोगों की हत्या कर दिया करते थे।मुंडा जनजाति के वीर युवा योद्धा अंग्रेज़ों के चाटुकार जमीदारों तथा साहूकारों के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे। उधर उरांव जनजाति के युवाओं में भी अग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश बढ़ता जा रहा था। अंग्रेजी शासन की अधिनायकवादी प्रवृत्ति बुधु भगत को मन ही मन बहुत व्यथित कर रही थी। ऐसे में उन्होंने गांव के लोगों को अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित करना शुरू किया। उनके नेतृत्व में हजारों हथियारबंद योद्धाओं ने अंग्रेजों और जमीदारों की संयुक्त सेना को कड़ी चुनौती दी। इसे लरका क्रांति का नाम दिया गया।
लरका क्रांति में स्थानीय जनजातीय समाज के युवा गुरिल्ला युद्ध से अंग्रेजी सैनिकों की नाक में दम कर देते थे। यहां तक की सिर्फ तीर-कमान और कुल्हाड़ी से जनजातीय समाज के योद्धाओं ने अंग्रेजों के पसीने छुड़ा दिए। इससे पहले बुधु भगत ने सिंहभूम क्षेत्र में कोल विद्रोह को भी नेतृत्व प्रदान किया था। कोल विद्रोह की लपटे सिंहभूम तक ही नहीं बल्कि हजारी बाग, रांची, पलामू तक फैली। अंग्रेजों को समझ में नहीं आ रहा था जनजातीय समाज के इस प्रखर योद्धा से कैसे निपटे।

बुधु को बंदी बनाने की जिम्मेदारी कैप्टन इम्पे को दी गई। इम्पे ने बनारस की 85वीं अंग्रेजी सेना की छह कंपनियां और घुड़सवारों के दल को जंगल की ओर भेजा। स्वतंत्रता समर के भूले बिसरे सितारे पुस्तक में बताया गया है कि अंग्रेजों ने टिकू और निकटवर्ती गांव के हजारों ग्रामीणों को कैद में कर लिया, लेकिन बुधु भगत ने वीरतापूर्वक उन्हें मुक्त करा लिया। इस करारी हार से अंग्रेज और बौखला गए। बुधु ने योगारी पहाड़ की चोटी पर अपना सैनिक अड्डा बनाया था, जहां अंग्रेजों के विरुद्ध रणनीति तैयार होती थी। इसी बीच 13 फरवरी 1832 को बुधु भगत अपने साथियों के साथ सिलगाई गांव में ठहरे थे। कैप्टन इम्पे के नेतृत्व में अंग्रेजों की सेना ने सिलागाई गांव को घेर लिया। इस लड़ाई में बुधु भगत और उनके तीनों बेटे हलधर, गिरधर, उदयकरण तथा दोनों बेटियां रुनिया और झुनिया तथा भाई व भतीजे समेत 300 लोग वीरगति को प्राप्त हुए। बुधु भगत के समक्ष आत्मसमर्पण का भी विकल्प था, लेकिन उन्होंने मां भारती के लिए बलिदान का मार्ग चुना। अधिनायकवादी तथा साम्राज्यवादी ताकतें कितनी भी मजबूत क्यों न हों, संगठन के आगे सभी को झुकना पड़ता है, ऐसा ही हुआ। ब्रिटिश शासन को यह पता चल गया कि छोटा नागपुर क्षेत्र जैसे जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र में सामान्य प्रशासनिक नियम लागू करना करना मुश्किल है। छोटा नागपुर ब्रिटिश शासन के हस्तक्षेप से मुक्त रहा इसे नॉन रेगुलेशन एरिया घोषित किया गया। यहां तक की 1870 में छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट के जरिए जनजातीय भूमि और अधिकारों की रक्षा के लिए कंदम उठाने को ब्रिटिश शासन को मजबूर होना पड़ा।
वीर बुधु भगत सिर्फ झारखंड नहीं बल्कि संपूर्ण भारत में याद किए जाते हैं। उरांव समाज के अनेक लोकगीतों में उन्हें दैवीय शक्ति के रूप में याद किया जाता है। जब हम भारत माता के लाल बुधु भगत को स्मरण करें तो यह भी ध्यान रखें जनजातीय समाज ने इस देश को बनाने इसे सुंदर रूप देने में अग्रणी भूमिका निर्वहन की है, उसे भारतीय समाज से पृथक बताने वाली ताकतों से भी सावधान रहना होगा। यह कभी कन्वर्जन तो कभी लव जिहाद के रूप में समाज को तोड़ने का काम करती हैं। जनजातीय समाज के हमारे पुरखों ने हमें एक ऐसी विरासत दी है जो वन संपदा, संस्कृति एवं पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली के रूप में हमारे बीच विद्यामान है, इससे प्रेरणा लेते हुए देश और समाज की सेवा करना ही बुधु भगत जैसे वीर सपूतों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जया लक्ष्मी तिवारी

