रूमा सेनगुप्ता
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम ट्रेड डील का घोषणा-पत्र सामने आते ही देश का राजनीतिक और आर्थिक माहौल गर्म हो गया है। इस समझौते को लेकर विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष पर लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं। किंतु यदि तथ्यों पर शांतिपूर्वक विचार किया जाए, तो क्या यह नहीं लगता कि हाल के दिनों में विपक्ष ने रचनात्मक विमर्श की अपेक्षा नकारात्मक राजनीति को अधिक प्राथमिकता दी है?

यह सही है कि इस डील को अभी पूर्ण कानूनी रूप दिया जाना बाकी है और विस्तृत औपचारिक समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि कोई भी सरकार ऐसा समझौता नहीं करेगी जिससे उसके अपने देश के हित प्रभावित हों। देश के कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों का मत है कि यदि इस ट्रेड डील को राजनीतिक चश्मे से हटकर आर्थिक दृष्टि से देखा जाए, तो इसके कई प्रावधान भविष्य में भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाले सिद्ध हो सकते हैं।
समझौते के अनुसार अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ घटाकर लगभग 18 प्रतिशत करने पर सहमति जताई है। यह कदम भारतीय निर्यातकों के लिए राहतकारी माना जा रहा है। टैरिफ में कमी से दवा, कपड़ा, आईटी सेवाएँ और इंजीनियरिंग सामानों की मांग बढ़ने की संभावना है। चूँकि अमेरिका पहले से ही भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है, इसलिए निर्यात में संभावित वृद्धि से विदेशी मुद्रा भंडार सुदृढ़ होगा और रुपए की स्थिरता को भी बल मिलेगा।
दोनों देशों ने लगभग 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी की दिशा में गंभीर प्रतिबद्धता का संकेत है। यदि इसे चरणबद्ध और संतुलित रूप से लागू किया जाता है, तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर में सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे सकता है।

सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और डिजिटल विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों के संभावित निवेश से भारत की उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी। इससे विशेष रूप से युवाओं और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए रोजगार के नए अवसर खुल सकते हैं।
ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह समझौता अहम माना जा रहा है। इससे वैश्विक बाजार में अस्थिरता की स्थिति में भी ऊर्जा आपूर्ति और दरें संतुलित रखने में सहायता मिलेगी।
डील में डिजिटल व्यापार और उन्नत तकनीक सहयोग पर भी विशेष बल दिया गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और डेटा आधारित सेवाओं में साझेदारी से भारतीय स्टार्टअप और आईटी कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नई पहचान मिल सकती है। इसके अतिरिक्त, गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने की प्रतिबद्धता से छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) के लिए अमेरिकी बाजार तक पहुंच आसान हो सकती है।
वैश्विक परिदृश्य में यह समझौता भारत की रणनीतिक स्थिति को और सुदृढ़ कर सकता है। आर्थिक साझेदारी प्रायः कूटनीतिक संबंधों को भी मजबूती देती है। ऐसे में यह आवश्यक है कि किसी भी समझौते का मूल्यांकन केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से न किया जाए, बल्कि उसके दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को भी ध्यान में रखा जाए।
निश्चित रूप से स्वस्थ लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, परंतु आलोचना तथ्यों और विवेक पर आधारित होनी चाहिए। भ्रामक आशंकाओं से राजनीतिक वातावरण गरमाने के बजाय यह अधिक उचित होगा कि विपक्ष अपनी रचनात्मक भूमिका निभाते हुए इस समझौते के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों पर संतुलित चर्चा करे। अंततः उद्देश्य यही होना चाहिए कि भारत का व्यापारिक बाजार वैश्विक मंच पर और सशक्त होकर उभरें।
-रूमा सेनगुप्ता

