
भद्राचलम से जगदलपुर के रास्ते में एर्राबोर का नामफलक देखते ही छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की वह काली रात याद आ गई, जब इंसानियत शर्मसार हो गई थी। सुकमा जिले के घने जंगलों के मुख्य मार्ग के बीच बसा यह छोटा-सा गांव 2006 में ऐसी विभीषिका का साक्षी बना, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। उस रात नक्सलियों की क्रूरता की सारी सीमाएं लांघ दी, न केवल घर जलाए, बल्कि लोगों के सपनों और भरोसे को भी राख कर दिया।
बारिश का मौसम था। लोग दिनभर की थकान के बाद अपने अस्थायी शिविरों में सोने की तैयारी कर रहे थे। किसी को अंदेशा नहीं था कि मौत दबे पांव उनकी ओर बढ़ रही है। अचानक गोलियों की आवाज़, चीखें और आग की लपटें चारों ओर फैल गईं। नक्सलियों ने निर्दोष ग्रामीणों पर धावा बोल दिया। जिन्होंने कभी हथियार नहीं उठाए, जो केवल अपने परिवार और रोज़ी-रोटी की चिंता करते थे, वे उस हिंसा का शिकार बने।
हमलावरों ने घरों में आग लगा दी। भागते लोगों को घेरकर बेरहमी से मारा गया। बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों तक को नहीं बख्शा गया। एक माँ की गोद से उसका शिशु छीन लिया गया, एक बूढ़े पिता की आंखों के सामने उसका बेटा मार दिया गया। उस रात चीखें इतनी थीं कि जंगल भी कांप उठा होगा। आग की लपटों में जलते घर केवल मिट्टी और लकड़ी के ढांचे नहीं थे, वे उन परिवारों की यादें, उम्मीदें और भविष्य थे।

नक्सलवाद अपने आपको शोषण के खिलाफ लड़ाई बताता है, लेकिन एर्राबोर की घटना ने दिखा दिया कि यह लड़ाई नहीं, बल्कि निर्दोषों के खिलाफ आतंक है। जिन आदिवासियों के नाम पर बंदूक उठाई जाती है, उन्हीं आदिवासियों को निशाना बनाया गया। क्या यही न्याय है? क्या यही क्रांति है? यदि किसी विचारधारा को बचाने के लिए बच्चों और महिलाओं का खून बहाना पड़े, तो वह विचारधारा नहीं, अमानवीयता है।
इस त्रासदी के बाद गांव में सन्नाटा पसर गया। जो बच गए, वे भी भीतर से टूट गए। कई परिवार हमेशा के लिए बिखर गए। बच्चों की आंखों में डर बस गया, और महिलाओं के दिलों में असुरक्षा की गहरी रेखा खिंच गई। एर्राबोर केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं रहा, वह पीड़ा का प्रतीक बन गया।
आज भी जब उस घटना को याद किया जाता है, तो सवाल उठता है—आखिर इस हिंसा से किसका भला हुआ? जिन लोगों की जान गई, वे किसी राजनीतिक खेल का हिस्सा नहीं थे। वे साधारण ग्रामीण थे, जिनकी सबसे बड़ी इच्छा अपने परिवार को सुरक्षित रखना थी। लेकिन नक्सलियों की क्रूरता ने यह बुनियादी अधिकार भी उनसे छीन लिया।
सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण नक्सली अब समर्पण कर कर रहें हैं इस क्षेत्र में बदलाव की बयार बहती दिख रही है। सहमे सहमे लोग खुलकर बोलने लगे हैं, प्रशासन उन तक पहुंचने लगा है। सुविधाएं पहुंचने लगी है, जो मार्ग बरसों बंद रहे वहां तक बसें जाने लगी है।
शासकीय माफी योजना से हजारों हत्याएं करने वालों को नक्सलियों को माफी देकर बसाया जा रहा है। लेकिन इन्होंने जो मानवता का चीर हरण किया, निर्दोष और मासूम वनवासियों की हत्याएं की, उसकी सजा इनको कौन देगा? क्या एर्राबोर के प्रभावितों को कभी न्याय मिल पाएगा?
इस स्थान पर नक्सलियों के साथ मुठभेड़ अपना सर्वोच्च बलिदान करने वाले सिपाहियों की प्रतिमाएं स्मारक के रुप में स्थापित है। मैंने रुककर इन्हें प्रणाम किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। जिनके प्राणों कि आहुति के बाद बस्तर में शांति स्थापना हो रही है। लेकिन एर्राबोर नृशंस हत्याकांड के प्रभावितों को क्या न्याय मिल पाएगा? यही सोचते हुए आगे बढ़ गया।
— आचार्य ललितमुनि
( वरिष्ठ पत्रकार)
