राखी के धागों में निहित है सामाजिक समरसता का संदेश

लोक पर्वों के भीतर समाज को जोड़ने, संबंधों को सींचने और जीवन-मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने की परंपरा निहित है, रक्षाबंधन भी ऐसा ही पर्व है। सामान्यतः इसे भाई-बहन के स्नेह और भाई द्वारा बहन की रक्षा के संकल्प से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी परंपरा को थोड़ा गहरे उतरकर देखें तो यह केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, संरक्षण और सामाजिक समरसता का संस्कार दिखाई देता है।

रक्षाबंधन को श्रावणी पर्व भी कहा गया है। इसकी प्राचीन परंपरा शिक्षा, स्वाध्याय और उपाकर्म से जुड़ी रही है। श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर स्नान, नवीन यज्ञोपवीत धारण, ऋषि, देव और पितरों का तर्पण तथा रक्षा-सूत्र बांधने की परंपराओं का उल्लेख मिलता है। अर्थात् आरंभ से ही इस पर्व का अर्थ केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें व्यक्ति, समाज, प्रकृति और अपनी परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व का भाव भी जुड़ा हुआ था।

समय के साथ पर्व का स्वरूप बदलता गया। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधने लगी और भाई उसकी रक्षा का वचन देने लगा। यह रूप इतना लोकप्रिय हुआ कि धीरे-धीरे रक्षाबंधन की पहचान ही भाई-बहन के पर्व के रूप में बन गई। किंतु भारतीय परंपरा में रक्षा का अर्थ इतना संकुचित कभी नहीं रहा। संकट के समय किसी की रक्षा के लिए, किसी के आरोग्य और दीर्घायु की कामना के लिए भी रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा रही है।

रक्षाबंधन की पौराणिक कथाओं में भी यही भाव दिखाई देता है। इंद्राणी द्वारा इंद्र के लिए रक्षा-विधान करने की कथा हो अथवा भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी कथा, दोनों में रक्षा का भाव प्रमुख है। राजा बलि और देवी लक्ष्मी की कथा में भी राखी केवल भाई-बहन के रक्त संबंध का प्रतीक नहीं बनती, बल्कि विश्वास और वचन के रिश्ते का माध्यम बनती है।

यही बात रक्षाबंधन को भारतीय समाज की दृष्टि से विशेष बनाती है। भारतीय समाज सदियों से अनेक जातियों, भाषाओं, पंथों, क्षेत्रों और जीवन पद्धतियों में विभाजित दिखाई देता है, लेकिन इन विविधताओं के बीच एक अंतर्धारा ऐसी रही है, जिसने समाज को भीतर से जोड़े रखा। हमारे पर्व और संस्कार उसी अंतर्धारा के वाहक रहे हैं। रक्षाबंधन का सूत्र इसी सामाजिक एकता का एक सहज प्रतीक है।

सोचिए, एक छोटा-सा धागा आखिर करता क्या है? उसमें न कोई विशेष शक्ति दिखाई देती है, न वह किसी को बांधने के लिए पर्याप्त मजबूत होता है। फिर भी जब वह विश्वास और आत्मीयता के भाव से कलाई पर बंधता है तो उसका अर्थ बदल जाता है। वह धागा केवल धागा नहीं रह जाता, वह संकल्प बन जाता है। रक्षा का संकल्प, साथ खड़े रहने का संकल्प और संकट में अपनेपन का भरोसा देने का संकल्प।

यही भारतीय सामाजिक समरसता की मूल भावना है। समरसता का अर्थ यह नहीं कि समाज में सभी लोग एक जैसे हो जाएं। भारत की विशेषता तो उसकी विविधता में रही है। यहां अलग-अलग जातियां, समुदाय, भाषाएं और परंपराएं अपनी विशिष्टता के साथ जीवित रही हैं। समरसता का अर्थ है कि विविधता के बावजूद मन में परस्पर सम्मान और आत्मीयता बनी रहे। रक्षाबंधन का सूत्र इसी भाव को सहज भाषा में व्यक्त करता है।

रक्षाबंधन की एक विशेषता यह भी रही है कि इसकी परिधि केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। अनेक स्थानों पर पुरोहित अपने यजमान को रक्षा-सूत्र बांधते हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भी राखी बांधने की परंपराएं रही हैं। इस प्रकार रक्षा का संबंध केवल परिवार से नहीं, समाज से भी जुड़ता है।इसी दृष्टि से रक्षाबंधन को सामाजिक समरसता से जोड़ने वाली वे परंपराएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं, जिनमें समाज के वंचित और उपेक्षित परिवारों के बीच जाकर रक्षासूत्र बांधा जाता है। वहां राखी किसी रिश्ते की औपचारिकता नहीं रहती, बल्कि यह संदेश बन जाती है कि समाज में कोई अकेला नहीं है। सामाजिक जीवन में किसी व्यक्ति की पीड़ा केवल उसकी निजी पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे समाज की चिंता है।

रक्षा केवल शरीर की नहीं होती। हमारी संस्कृति की रक्षा भी आवश्यक है, प्रकृति की रक्षा भी आवश्यक है, सामाजिक विश्वास की रक्षा भी आवश्यक है और मानवीय संवेदनाओं की रक्षा भी आवश्यक है। जिस समाज में व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के सम्मान और अधिकार की रक्षा के लिए खड़ा होता है, वही समाज वास्तव में मजबूत होता है।

रक्षाबंधन का यह व्यापक अर्थ भारतीय चिंतन में ‘परस्पर संरक्षण’ की भावना से जुड़ा हुआ है। समर्थ व्यक्ति कमजोर के साथ खड़ा हो, शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित को आगे बढ़ाए, संपन्न व्यक्ति जरूरतमंद की सहायता करे और समाज का प्रत्येक वर्ग दूसरे वर्ग के सुख-दुःख में सहभागी बने, तभी सामाजिक समरसता का वास्तविक स्वरूप सामने आएगा।इसीलिए रक्षाबंधन को केवल बाजार में सजी रंग-बिरंगी राखियों और मिठाइयों के पर्व तक सीमित कर देना इसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को छोटा कर देना होगा। राखी की असली सुंदरता उस कलाई में नहीं, उस भावना में है जिसके साथ उसे बांधा जाता है।

भारतीय परंपरा में सूत्र का प्रतीक बहुत गहरा है। एक सूत्र अनेक मोतियों को जोड़ता है, लेकिन हर मोती अपनी अलग पहचान बनाए रखता है। यही भारत की सामाजिक संरचना का भी सुंदर रूपक है। यहां विविधता समाप्त करके एकता पैदा करने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि विविधताओं को एक सूत्र में जोड़कर एकता का निर्माण किया गया। रक्षाबंधन इसी भारतीय दृष्टि को जीवन में उतारने वाला पर्व है।आज जब समाज में अनेक स्तरों पर दूरी और अविश्वास दिखाई देता है, तब रक्षाबंधन का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। हमें यह विचार करना होगा कि हम किसकी रक्षा का संकल्प ले रहे हैं और किसके साथ खड़े होने को तैयार हैं। यदि राखी की डोर कलाई से आगे बढ़कर हृदय तक पहुंच जाए, तो वह सचमुच समाज को जोड़ने वाली डोर बन सकती है।

रक्षाबंधन अंततः यही तो कहता है कि हम अलग-अलग होकर भी एक-दूसरे से जुड़े हैं। हमारी खुशियां एक-दूसरे से जुड़ी हैं और हमारी सुरक्षा भी एक-दूसरे से जुड़ी है। एक धागा अपने आप में कमजोर हो सकता है, लेकिन जब अनेक धागे मिलकर मजबूत बंधन बनाते हैं तो उसे तोड़ना कठिन होता है। इसी तरह व्यक्ति अकेला कमजोर हो सकता है, परंतु आत्मीयता, विश्वास और परस्पर सहयोग से जुड़ा समाज बहुत शक्तिशाली होता है।

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