मानसून मुझे बहुत ही पसंद है। अगर कहीं ठहरे हैं तो परनालों से बरसते पानी की सरगम से उपजे संगीत के क्या कहने। अगर चल रहे हैं तो भीगती हुई तारकोल की सड़क, कार के विंडस्क्रीन पर जमी धुंध और फुहारों को हटाता हुआ वायपर भी लयबद्ध संगीत उत्पन्न करता है। प्रकृति नीरस नहीं है, उसमें रस है, संगीत है, प्राणवायु है, जीवन है। आप प्रकृति से जुड़िए, आँखें खोलकर निहारिए और शांत रहकर गहरी साँस फेफड़ों में भरिए, कुछ देर में देवलोक का आभास होने लगेगा। भले ही किसी ने देवलोक देखा न हो, लेकिन अगर कहीं होगा तो शायद ऐसा ही होगा। मानसून में जागे हुए पेड़-पौधे और नवपल्लव मन में उत्साह जगाते हैं, गर्मी के दिनों में मन-मस्तिष्क पर पड़ी गर्द को उड़ाने के लिए पछुआ पवन काफी है।
बस्तर मुझे प्रकृति से जोड़ता है, पेड़ों की हरियाली से जोड़ता है, वनकाक की बतकही से जोड़ता है, मोर की आवाज और उसके नृत्य से जोड़ता है और वहाँ की संस्कृति तथा लोक से भी। बैगा, सिरहा और वनांचल के सहज जीवन से जुड़ते ही लगता है कि शहर की बहुत सारी दीवारें मन के भीतर से अपने आप ढहने लगी हैं। सभी ऋतुओं में बस्तर का सौंदर्य अलग-अलग रूपों में निखरता है, लेकिन मानसून में लगता है जैसे प्रकृति ने गुप्त पोटली खोल दी हो। बादल आते हैं, पहाड़ों पर टिक जाते हैं और जाने किससे बतियाते हुए बरसने लगते हैं। पानी पत्तियों पर गिरता है, चट्टानों पर फिसलता है और मन की तितलियाँ उड़ने लगती हैं।
जगदलपुर से नेतानार की ओर बढ़िए तो वातावरण धीरे-धीरे सुरमई होने लगता है। बरसात की धुंध और धुरवा समुदाय के चूल्हों से उठता धुआँ मिलकर आसमान को ऐसे ढँक लेते हैं, जैसे किसी ने कोल्हापुरी चादर ओढ़ा दी हो। आगे एक ओर कैलाश गुफा है, जो बरसात में बंद रहती है और दूसरी ओर कोलेंग का रास्ता। सर्पीली सड़क, बरसता हुआ मेह और दोनों ओर की हरियाली का मणिकंचन संयोग मन को बाँध लेता है।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान लगभग 200 वर्ग किलोमीटर में फैला है वन्यजीवन इसे अपने आप में एक अलग संसार बनाते हैं। बरसात में कांगेर पहुँचते ही सबसे पहले जो चीज घेरेगी, वह केवल हरियाली नहीं, हरियाली की गहराई होगी। जहाँ तक नजर जंगल को भेद सकती है, वहाँ तक हरियाली दिखाई देगी। लगता है मानसून के स्वागत में प्रकृति ने हरा लुगरा पहन लिया है। पत्तियों से बूँदें झर रही होंगी, बाँस के झुरमुट झकोरे खा रहे होंगे और कहीं छोटी-सी जलधारा सड़क पार करती हुई आगे निकल जाएगी। कुछ देर बाद भूलने लगेंगे कि आप घूमने आए हैं। लगने लगेगा, जंगल आपको घुमा रहा है।
साँप की तरह बलखाता रास्ता जंगल के भीतर ले जाता है। पहाड़ सामने आता है तो उसके पीछे से बादल निकलता है। लगता है अभी तक कहीं और बरस रहा था और अब अपनी हाजिरी देने यहाँ चला आया है। हवा में ठंडक है, पत्तियों पर नमी। आवाज दिखाई नहीं देती, मगर सुनाई देती है। आप उसी आवाज का पीछा करते हैं और अचानक तीरथगढ़ सामने आ जाता है। कांगेर घाटी का यह जलप्रपात मुनगाबहार नदी पर लगभग 300 फीट नीचे सीढ़ीनुमा प्राकृतिक संरचनाओं पर गिरता है। बरसात में जलराशि बढ़ती है तो उसका रूप और भी विराट हो जाता है। दूधिया झाग और उड़ती फुहारें ऐसी लगती हैं जैसे पानी नीचे गिरते-गिरते भाप बनकर फिर आकाश की ओर लौटना चाहता हो।
तीरथगढ़ के सामने कुछ देर चुप रहिएगा। आँखें बंद करके विशाल जलराशि की गर्जना सुनिए, नीचे से उड़कर आती फुहार को चेहरे पर पड़ने दीजिए और फिर देखिए कि पहाड़ कितनी सहजता से पानी को अपनी देह से नीचे उतार रहा है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने पहाड़ की चोटी पर विशाल कलश उलट दिया हो। कांगेर की खूबी यह भी है कि धरती के ऊपर जितना संसार है, उसके नीचे भी उतनी ही रहस्यमयी दुनिया छिपी है। कुटुमसर, कैलाश और दंडक जैसी गुफाएँ इस तिलस्म को और गहरा करती हैं। हाँ, मानसून में कुटुमसर और कैलाश गुफाएँ बंद रहती हैं। तो गुफा बंद है तो क्या हुआ? जंगल तो खुला है, आसमान खुला है, बादल खुले हैं, झरने खुले हैं और स्थानीय वनवासियों के हृदय के पट खुले हैं। बरसात का आनंद तो बेटिकट हो ही रहा है।कुटुमसर में मायली डोकरी से मिलना भी न भूलिए। उसके पास गीतों का खजाना है। आरोह-अवरोह के साथ जब वह गाती है तो शब्द भले पूरी तरह समझ न आएँ, लेकिन दीर्घ, ह्रस्व और प्लुत स्वरों में उठता-गिरता गान सामवेद-सा सुनाई देता है। लगता है जंगल की अपनी कोई भाषा है और मायली डोकरी उस भाषा की पुरानी पोथी खोलकर बैठी है।
कांगेर नदी और उसकी सहायक जलधाराएँ इस पूरी घाटी में जीवन की नसों की तरह बहती हैं। बरसात में इन्हें देखना किसी किताब के पन्ने पढ़ना नहीं, बल्कि किताब के भीतर उतर जाना है। कांगेर का तिलस्म इसी में है कि प्रकृति अपने को एक साथ खोलती भी है और छिपाती भी है। झरना सामने है, लेकिन उसका उद्गम जंगल में कहीं छुपा है। नदी दिखाई देती है, लेकिन उसका जन्म किसी दूर पहाड़ी में हुआ है। गुफा का मुहाना सामने है, मगर भीतर कौन-सी दुनिया है, यह अँधेरा ही जानता है। ऊपर मानसूनी बादल हैं, वे भी कुछ नहीं बताते। बस बरसते हैं।मानसून में कांगेर जाना केवल पर्यटन नहीं है। यह अपने भीतर थोड़ी जगह खाली करने की यात्रा है। बारिश की आवाज सुनिए, पत्तियों की सरसराहट सुनिए, पत्थरों से टकराते पानी को सुनिए, दूर किसी पक्षी की पुकार सुनिए और इन सबके बीच अपनी साँस की आवाज भी। इससे बड़ा कोई ध्यान-योग नहीं।
कभी किसी चट्टान के पास बैठकर देखिएगा। सामने बारिश हो, झरती जलराशि बढ़ रही हो और धुंध धीरे-धीरे घाटी को अपने आगोश में ले रही हो। कुछ देर बाद लगेगा कि आप किसी पहाड़ी जंगल में नहीं, किसी तिलस्मी कथा के पात्र बनकर बैठे हैं। अभी कोई रहस्य खुलेगा और कोई देवता पेड़ों के पीछे से झाँककर पूछेगा, “इतनी जल्दी कहाँ जा रहे हो?”मानसून में कांगेर जाइए, लेकिन पर्यटक बनकर नहीं, जंगल का थोड़ा-सा हिस्सा बनकर। फुहार को महसूस कीजिए, झरने की गर्जना भीतर समेटिए, पत्तियों पर ठहरी बूँदों को देखिए और स्थानीय लोगों से बतकही कीजिए। जंगल की शांति को अपने शोर से मत भरिए।
लौटते समय तस्वीरें होंगी, भीगे कपड़े होंगे, जूतों में लगी लाल माटी होगी, लेकिन असली चीज इनमें से कोई नहीं होगी। आपके साथ कांगेर की वह हरियाली लौटेगी जो आँखों के रास्ते चेतना में उतर गई होगी। तीरथगढ़ की गर्जना कानों में देर तक सुनाई देगी, बारिश की गंध कभी अचानक कमरे में गमक उठेगी और किसी दिन फिर बादल घिरेंगे तो मन उसी घाटी की ओर दौड़ पड़ेगा।तब समझ में आएगा कि कांगेर वैली को हमने देखा नहीं था, कांगेर वैली ने हमें कुछ देर अपने भीतर स्थान दिया था और बार-बार मन वहीं दौड़ेगा, जैसे किसी ने मोहनी डालकर सम्मोहित कर दिया हो। यही तो कांगेर का तिलस्म है। एक बार उसने अपनी जादुई लुगरे के पल्ले से बाँध लिया तो फिर दौड़े चले आओगे। बाकी जो है, सो तो हैइए है।
आचार्य ललित मुनि
( इण्डोलॉजिस्ट एवं लोकसंस्कृति के अध्येता हैं )
