कहाँ चली गई वह दाई? – 5 मई अंतर्राष्ट्रीय दाई दिवस विशेष

पुरानी बात है, मैं छठवीं में पढता था। बारिश का मौसम याने जुलाई का महीना था, रात को दादी ने कहा कि ‘जा, रामकली को बुलाकर ला।’ रामकली दाई थी, …

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तमसो मा ज्योतिर्गमय: स्त्री–पुरुष की संयुक्त सहभागिता से सभ्य समाज का पुनर्निर्माण—कैलाश चन्द्र

“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमय”—यह मंत्र केवल आध्यात्मिक प्रार्थना नहीं, बल्कि मानव जीवन के विकास की संपूर्ण प्रक्रिया का सार है। यह हमें असत्य से सत्य की …

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मानवता के दीपक : पद्म श्री दामोदर गणेश बापट

कुछ लोग इस संसार में आते हैं, अपना जीवन जीते हैं और बिना किसी विशेष पहचान के समय के प्रवाह में विलीन हो जाते हैं। वहीं कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते …

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अमेरिका से आ रहा था धर्मान्तरण के लिए धन!- प्रियंका कौशल

कभी हमारे पड़ोस में, मोहल्ले या शहर में रहने वाला कोई परिचित अपना धर्म परिवर्तन कर ले तो हम ये सोचते रह जाते हैं कि आखिर इसने ऐसा क्यों किया? …

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अमेरिकी मिशनरी से आता था बस्तर में धर्मांतरण के लिए धन!

लोगों को ईसाई बनाने के लिए 95 करोड़ का लेनदेन ईडी के प्रेसनोट में चौंकाने वाले तथ्य रायपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में धर्मान्तरण के लिए विदेशी फंडिंग का …

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बस्तर के बच्चों को अनाथ करने वाले राक्षसों को नायक बताना बंद करो! – प्रियंका कौशल

बस्तर में हजारों बच्चे ऐसे हैं जिनके माता-पिता नक्सल क्रूरता के शिकार हुए हैं। सैकड़ो बच्चों ने अपने पिता या माता, या फिर दोनों को ही नक्सल हिंसा में खो …

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सहअस्तित्व से ही सुरक्षित रहेगा पृथ्वी का कल

मानव सभ्यता आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। विज्ञान और तकनीक ने जीवन को …

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नारी शक्ति वंदन अधिनियम: महिला सशक्तिकरण से राष्ट्र रचना तक – डाॅ श्रद्धा मिश्रा

खत्म हुआ दशकों का इंतजार, नारी शक्ति को मिला अधिकार। महिलाएं अब केवल सहभागी नहीं रहेंगी, बल्कि नेतृत्वकर्ता बनकर देश के विकास को नई दिशा देंगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम …

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असहज सच से मुंह मोड़ने की ‘सेकुलर’ कीमत – बलबीर पुंज

सच से आंखें चुराकर समाज कभी मजबूत नहीं बनता। जब किसी संकट को जानबूझकर नकार दिया जाता है, तो वह और गहरी जड़ पकड़ लेता है। स्वतंत्र भारत में दशकों …

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बस्तर: अब जब सांस ले रहा है, तो रास्ता कैसा हो?

बस्तर को हमने बहुत लंबे समय तक एक ही नजर से देखा—संघर्ष, नक्सल, बंदूक और असुरक्षा की नजर से। इतनी लंबी अवधि तक यही तस्वीर हमारे सामने रखी गई कि …

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