विवाहेतर संबंध: रोमांच के नाम पर अव्यवस्था का ‘प्रैक्टिकल कोर्स’— कैलाश चन्द्र जी

आधुनिक महानगरीय जीवन की एक विचित्र विडम्बना है—लोग भावनात्मक रूप से थके हुए भी हैं और उत्साह की तलाश में भी। इसी विरोधाभासी भूख के बीच एक पुरानी परंपरा है, जिसका नया ग्लैमर-पैक्ड संस्करण बाज़ार में फिर से उभर आया है—विवाहेतर संबंध। आज यह किसी शाइन-वॉश किए गए रोमांस की तरह पेश किया जाता है; इंस्टा-रील्स इसका एड बना देती हैं, और सीरीज़ इसे “थ्रिलर” जैसा रूप दे देती हैं।

पर असलियत?

वह इतनी उलझी हुई, इतनी हास्यास्पद और इतनी आत्मघाती है कि इसे देखकर लगता है—मानव प्रकृति कभी-कभी स्वयं को बर्बाद करने के लिए कितनी मेहनत कर लेती है।इसी जटिल वास्तविकता को समझाने के लिए चलिए एक व्यंग्यात्मक यात्रा पर निकलते हैं—विवाहेतर संबंध नहीं, बल्कि उसकी अव्यवस्था, उसकी मज़बूरी और उसकी कॉमिक-ट्रैजेडी की दुनिया में।

रोमांच की शुरुआत: एक फिसलन, जिसे लोग “भाग्य” समझ लेते हैं

अफेयर कोई संस्कारी, योजनाबद्ध, रणनीतिक निर्णय नहीं होता—यह अक्सर भावनात्मक थकान का एक छोटा-सा झटका होता है।एक मुस्कान, एक संदेश, एक कॉफी—और मनुष्य तुरंत मान लेता है कि ब्रह्मांड ने उसे कोई ‘अलौकिक अवसर’ दिया है।

असल में यह opportunity नहीं, मनोवैज्ञानिक फिसलन है।

थोड़ा अकेलापन, थोड़ा उत्साह, और थोड़ा flirting—और व्यक्ति अचानक खुद को “आख़िर मैं भी जी रहा हूँ!” के भ्रम में पाता है। सबसे मज़ेदार यह है कि रोमांच का यह फौरी नशा केवल शुरुआत में होता है।

आगे जाकर रोमांच कम होता जाता है और सिरदर्द बढ़ता जाता है।

दोहरी जिंदगी का थियेटर: बहाने, झूठ और creativity की forced practiceविवाहेतर संबंध का असली रोमांच secret meetings में नहीं, बल्कि जुगाड़ में है।हर अफेयर चलाने वाला व्यक्ति अनजाने में एक full-time scriptwriter बन जाता है।

• ऑफिस की “अचानक” मीटिंग

• जिम का “extra session”

• मोबाइल की “battery down”

• Traffic का “unusual jam”

• और घर पहुंचकर वह “थकान में भी मुस्कान” वाला अभिनय

यह वह कला है जिसमें झूठ बार-बार बोला जाता है, पर rehearsal कभी नहीं की जाती। और यही कारण है कि व्यक्ति खुद अपने ही झूठों में फँसता जाता है।

इस दोहरी जिंदगी का सबसे हास्यास्पद पहलू यह है कि प्रेम कम और logistics ज्यादा होती है—इतना कि कई लोग प्रेमी से ज़्यादा बॉडीगार्ड की तरह व्यवहार करने लगते हैं।

Location का विज्ञान: जहां कोई देख ले, वही आपका भाग्य-विधाता बन जाएगाकिसी को लगता है पार्क सुरक्षित है, किसी को होटल। किसी को कॉफी शॉप ठीक लगती है, किसी को मॉल।

लेकिन आधुनिक surveillance युग में privacy का नामोनिशान नहीं बचा।CCTV, digital payments, entry logs, mobile location, accidental acquaintances—हर जगह किसी न किसी deity का आशीर्वाद आपको मिल सकता है:“देख लिया मैंने!” सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि दुनिया में जितने स्थान हैं, उनमें से 99.9% स्थान पकड़े जाने के लिए उपयुक्त हैं। और बाकी 0.1% में पहुंचने के पहले ही दिल की धड़कनें confession कर देती हैं।

भावनात्मक विभाजन: एक शरीर, दो पहचानें और तीन गुना थकानमनुष्य एक ही समय पर सीमित संख्या में भूमिकाएँ निभा सकता है।पर विवाहेतर संबंध में उसे दो अलग-अलग वर्जन्स में अपग्रेड कर दिया जाता है—• घर का जिम्मेदार, शालीन, संतुलित नागरिक• प्रेमिका/प्रेमी के सामने हायपर रोमेंटिक , पोएटिक , एनर्जीटिक वर्जन समस्या यह है कि बैटरी एक ही है।और इस दोहरी चार्जिंग में व्यक्ति की इमोशनल लाइफ धीरे-धीरे लो पावर मोड में चली जाती है।

यह कोग्निटिव डिससोंनेंस —यानी दो विपरीत दुनिया साथ लेकर चलने की मजबूरी—लोगों को एक अजीब-सी मानसिक थकावट देती है।व्यक्ति मुस्कुराता ज़रूर है, पर अंदर खाली होता जाता है।

गलत नाम का खेल: रोमांस का सबसे घातक ‘टंग-स्लिप’यह ट्रेजेडी कम और कॉमेडी ज्यादा है। भावनाओं की ऊँचाई पर अचानक गलत नाम निकल जाना— यह व्यक्ति की दोहरी दुनिया की सबसे ईमानदार अभिव्यक्ति होती है। यह स्लीप किसी डिक्शनरी में तो गलती कहलाती है, पर वास्तविक जीवन में यह “पूर्ण-नाश के शंखनाद” के रूप में जाना जाता है। यही वह क्षण होता है जब प्रेम और हाज़िरजवाबी दोनों धोखा दे देते हैं।बाउंडरीज का टूटना: एक चाहता कमिटमेंट , दूसरा चाहता इस्कपे विवाहेतर संबंध अपनी प्रकृति से ही असंतुलित होते हैं। किसी एक को भावनाएँ गहराई तक ले जाती हैं और दूसरा व्यक्ति केवल थ्रील के लिए आता है। यह मिसमैच अंत में एक इमोशनल एक्सप्लॉशन बन जाता है।यह रिश्ता जितना गुप्त होता है, उतना ही फ्रैजाईल होता है। यह थ्रील की चाह में शुरू होता है और भावनात्मक कर्ज़ बनकर समाप्त होता है।

घर की दुनिया में अचानक आए गिफ्ट्स और ओवरक्टिंग —शक की पहली घंटीअफेयर में व्यक्ति गिल्ट मिटाने के लिए घर पर एक्स्ट्रा स्वीट बन जाता है।

• अचानक फ्लावर्स

• अननेसेसरी गिफ्ट्स

• बेवजह काइंडनेस

• फॅमिली टाइम में अनयूजुअल एनथुसिआस्म पति/पत्नी इन संकेतों को देखकर एक ही बात समझते हैं— या तो प्रमोशन मिला है, या “कुछ गड़बड़ है”। और अक्सर दूसरा अनुमान सही निकलता है।

तकनीक की तलवार: जो कुछ छुपाया जाता है, वही क्लाउड पर ऑटो बैकअप हो जाता हैआज की टेक्नोलॉजी जितनी सुविधा देती है, उतनी ही धोखा देती है।

सीक्रेट चैट्स , डीलेटेड मेसेजेस , हिडन एल्बमस , अलटरनेट अप्प्स —सब किसी न किसी रूप में क्लाउड या बैकअप में जीवित रहते हैं।एक छोटा-सा स्क्रीनशॉट , एक गलती से खुला नोटिफिकेशन , या एक फ़ॉर्वर्डेड मैसेज — पूरी कांस्पिरेसी को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है। विवाहेतर संबंध तकनीक में नहीं फँसते, लापरवाही में फँसते हैं।

सामाजिक मनोविज्ञान: शहरी अकेलापन, डिजिटल आकर्षण और प्रेम का भ्रमआधुनिक शहरों में लोग भीड़ में रहते हैं, पर अकेले होते हैं। वर्चुअल कन्वर्सेशन्स असली वार्मथ का भ्रम पैदा करती हैं।काम का दबाव, संबंधों की मोनोटॉनी , और इंस्टेंट ग्रेटिफिकेश का आकर्षण—इन सबका मिश्रण विवाहेतर संबंधों को जन्म देता है। लेकिन इनका अंत हमेशा एक ही जगह होता है—उस इमोशनल अंधेरे में, जहांन थ्रील बचता है, न संतोष, न स्थिरता।

विवाहेतर संबंध कोई रोमांस नहीं—एक व्यवस्थित अव्यवस्था हैयह संबंध थ्रील से अधिक टेंशन देते हैं। रोमांस से अधिक लीजिस्टिक्स देते हैं।आनंद से अधिक एंग्जायटी देते हैं।और अंत में— व्यक्ति खुद से, अपने घर से और अपने मानसिक संतुलन से दूर होता जाता है।विवाहेतर संबंध मॉडर्न ग्लैमर की दुनिया में जिस आकर्षक पैकिंग में दिखते हैं, उतनी ही गहरी अव्यवस्था छुपाए हुए होते हैं।यह प्रेम नहीं, अव्यवस्था का एक प्रैक्टिकल कोर्स है— जिसे कोई भी समझदार व्यक्ति शुरू ही न करे।

— कैलाश चन्द्र

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