
बस्तर की धरती पर दंतेवाड़ा का दंतेश्वरी मंदिर केवल एक प्रसिद्ध देवी स्थल ही नहीं है, यह उस सांस्कृतिक भूगोल का केंद्र है, जहां आस्था, लोकविश्वास, जनजातीय परंपराएं और प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध एक दूसरे में घुला हुआ दिखाई देता है। शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम क्षेत्र में स्थित मां दंतेश्वरी को बस्तर की आराध्य देवी माना जाता है। बस्तर की धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृति में इस मंदिर का स्थान इतना गहरा है कि यहां देवी की उपस्थिति केवल गर्भगृह तक सीमित नहीं लगती, बल्कि पूरे अंचल के लोकजीवन में अनुभव की जाती है।
दंतेश्वरी मंदिर की परंपरा बस्तर के राजवंश, स्थानीय समाज और देवी आराधना की दीर्घ सांस्कृतिक यात्रा से जुड़ी रही है। बस्तर दशहरा जैसी विश्वप्रसिद्ध लोकपरंपरा में भी दंतेश्वरी मइया की केंद्रीय भूमिका है। यहां देवी को राजपरिवार की कुलदेवी के साथ साथ बस्तर के जनमानस की आराध्य शक्ति के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि दंतेवाड़ा आने वाला श्रद्धालु केवल एक मंदिर के दर्शन नहीं करता, बल्कि वह बस्तर की उस सांस्कृतिक दुनिया में प्रवेश करता है जहां देवी और लोकजीवन के बीच की दूरी बहुत कम है।
बस्तर की सांस्कृतिक संरचना को समझना हो तो देवी आराधना को समझना जरूरी है। यहां देवी केवल पूजा के समय स्मरण की जाने वाली शक्ति नहीं हैं। वे गांव, जंगल, खेत, पशुधन, परिवार और सामुदायिक जीवन की संरक्षक शक्ति के रूप में लोकविश्वास में उपस्थित हैं। जनजातीय समाज में प्रकृति के विभिन्न रूपों, ग्राम देवताओं और कुल देवी देवताओं के प्रति गहरी आस्था रही है। इस व्यापक लोकविश्वास के बीच दंतेश्वरी मइया की आराधना एक ऐसी परंपरा के रूप में सामने आती है, जिसमें क्षेत्रीय समाज की सांस्कृतिक एकता भी दिखाई देती है।
बस्तर की जनजातीय संस्कृति में देवी के प्रति श्रद्धा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यहां देवी से सुरक्षा, समृद्धि, स्वास्थ्य और जीवन की निरंतरता की कामना की जाती है। जंगल और जमीन से जुड़ा जीवन होने के कारण अनिश्चितताओं से भरे परिवेश में किसी संरक्षक शक्ति पर विश्वास स्वाभाविक रूप से लोकजीवन का हिस्सा बना। इसलिए देवी की पूजा में केवल आध्यात्मिक भाव नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन की चिंताएं और उम्मीदें भी शामिल हैं।
दंतेश्वरी मइया के प्रति यही श्रद्धा रक्षाबंधन की एक विशेष परंपरा में भी दिखाई देती है। यहां राखी केवल भाई की कलाई पर बांधा जाने वाला सूत्र नहीं रह जाती। वह देवी की कृपा और सुरक्षा का प्रतीक बनकर घर परिवार और जीवनोपयोगी साधनों तक पहुंचती है।
रक्षाबंधन से दो दिन पहले दंतेश्वरी मंदिर में एक विशेष तैयारी शुरू होती है। मंदिर के बारह लंकवार के सदस्यों और कुछ सेवादारों द्वारा हाथ से सूती धागा गूंथकर तैयार किया जाता है। इस धागे की खासियत यही है कि यह बाजार से खरीदी गई सजावटी राखी नहीं है। इसके पीछे मंदिर से जुड़े लोगों का श्रम, परंपरा और आस्था जुड़ी हुई है।
मंदिर के पुजारी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस धागे को विधि विधान से माई शीतला सरोवर के जल से अभिषेक कराया जाता है। इसके बाद पूजा अर्चना की जाती है और धागे को दंतेश्वरी मइया के चरणों में रखकर विशेष पूजा की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में साधारण सूती धागा एक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक का रूप ले लेता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि लोकपरंपराओं में किसी वस्तु का महत्व केवल उसके भौतिक स्वरूप से निर्धारित नहीं होता। उससे जुड़ी प्रक्रिया उसे अर्थ देती है। हाथ से बनाया गया धागा, पवित्र जल, देवी के चरण, पूजा और सामूहिक श्रद्धा, इन सबके मिलने से वह रक्षा धागा बन जाता है। यही कारण है कि श्रद्धालु इसे केवल राखी की तरह नहीं, बल्कि देवी का प्रसाद और आशीर्वाद मानकर ग्रहण करते हैं।
बस्तर क्षेत्र के लोगों की दंतेश्वरी मइया के प्रति अतुल श्रद्धा इस परंपरा का आधार है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि रक्षाबंधन के अवसर पर पूजा के बाद श्रद्धालु अपने हाथों में तो बहनों द्वारा राखी बंधवाते ही हैं, लेकिन देवी से प्राप्त रक्षा धागे का उपयोग इससे कहीं व्यापक रूप में करते हैं।
घर में रखे मवेशियों को भी यह रक्षा धागा बांधा जाता है। गाड़ियों और अन्य महत्वपूर्ण साधनों पर भी इसे बांधने की परंपरा है। इसके पीछे गहरा लोकविश्वास है कि देवी का यह रक्षा सूत्र जीवन में आने वाली विघ्न बाधाओं और अनिष्ट से रक्षा करेगा।
यह परंपरा बस्तर के लोकजीवन की उस दृष्टि को सामने लाती है जिसमें मनुष्य स्वयं को अपने आसपास की दुनिया से अलग करके नहीं देखता। परिवार के साथ पशुधन भी महत्वपूर्ण है। आजीविका के साधन भी महत्वपूर्ण हैं। घर भी महत्वपूर्ण है और उन सभी की सुरक्षा के लिए देवी का आशीर्वाद मांगा जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो दंतेश्वरी मइया की राखी एक व्यक्ति की कलाई से निकलकर पूरे परिवार और उसके जीवन संसार तक पहुंच जाती है।
रक्षाबंधन से एक दिन पहले दंतेश्वरी मंदिर में राखी के नाम से विशेष भव्य आरती की जाती है। दंतेश्वरी मइया के साथ यहां विराजमान अन्य देवी देवताओं और भैरव जी को भी वही रक्षा धागा अर्पित किया जाता है।
यह अनुष्ठान इस परंपरा को और व्यापक अर्थ देता है। देवी को राखी अर्पित करना मानो अपने आराध्य से यह प्रार्थना करना है कि आने वाला वर्ष सुख, शांति और सुरक्षा से भरा रहे। मंदिर में होने वाली पूजा और आरती के बाद यही रक्षा धागा प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को दिया जाता है।
रक्षाबंधन देश के अनेक हिस्सों में भाई बहन के प्रेम और पारिवारिक संबंधों का त्योहार है। बस्तर में भी इसका यह भाव मौजूद है, लेकिन दंतेश्वरी मइया से जुड़ी यह परंपरा इसे एक अलग सांस्कृतिक आयाम देती है। यहां रक्षा का अर्थ केवल व्यक्ति की रक्षा नहीं, बल्कि उस पूरे जीवन संसार की रक्षा है जिससे परिवार जुड़ा है।
इस परंपरा में जनजातीय और लोकजीवन की सामुदायिक भावना भी दिखाई देती है। धागा हाथ से तैयार होता है, मंदिर की परंपरा के अनुसार उसकी पूजा होती है, देवी को अर्पित किया जाता है और फिर श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित होता है। इसमें लोकविश्वास की अधिकता दिखाई देती है।
शायद यही कारण है कि दंतेश्वरी मइया की राखी को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखना इसके सांस्कृतिक अर्थ को छोटा कर देना होगा। यह बस्तर के लोगों और उनकी आराध्य देवी के बीच उस आत्मीय संबंध की अभिव्यक्ति है, जिसमें जीवन की छोटी बड़ी सभी चिंताओं के लिए देवी की शरण ली जाती है।
आचार्य ललित मुनि
( इण्डोलॉजिस्ट एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं)
