‘आठें कन्हैया’ नाम सुनते ही कृष्ण जनमाष्टमी की मन में एक सहज-सी तस्वीर उभरती है। घर की साफ की गई दीवार पर बनी नाव खेती हुई आठ छोटी छोटी मानवाकृतियाँ । कहीं चार-चार की दो कतारें, कहीं एक ही पांत में आकृतियां। उनके आसपास रंगों की हल्की सजावट और सामने पूजा की तैयारी। ये चित्र किसी बड़े कलाकार की कूची से नहीं बनते। गांव की महिलाएं इन्हें अपने हाथों से बनाती हैं। यही इनकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।
जन्माष्टमी देश के दूसरे हिस्सों में भी पूरे उत्साह से मनाई जाती है। मंदिर सजते हैं, झांकियां निकलती हैं, कृष्ण को झूला झुलाया जाता है और आधी रात उनके जन्म का उत्सव होता है। ‘आठें कन्हैया’ नाम की अपनी सरल व्याख्या है। कृष्ण देवकी की आठवीं संतान थे और उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। आठवीं संतान और अष्टमी, दोनों का संबंध लोक की स्मृति में इस तरह जुड़ा कि कृष्ण के जन्म का यह पर्व ‘आठें कन्हैया’ कहलाने लगा। लोक ने पौराणिक कथा को अपने शब्द दिए और फिर उसे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया।
लेकिन इस नाम को अर्थ देने वाली चीज केवल शब्द नहीं, वे आठ आकृतियां हैं जो दीवार पर बनाई जाती हैं। कभी-कभी किसी परंपरा को समझने के लिए उसके बड़े अनुष्ठानों से ज्यादा उसके छोटे संकेतों को देखना पड़ता है। आठें कन्हैया में भी यही बात है। दीवार पर बनी आकृतियां कृष्ण जन्म की कथा को दृश्य रूप देती हैं। बच्चे उन्हें देखकर पूछते हैं, बड़े उन्हें कथा सुनाते हैं और इस तरह त्योहार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहता है। यहीं से लोक और पुराण का मिलन होता है।
कृष्ण की जन्मकथा अपने आप में बड़ी मार्मिक है। मथुरा के कारागार में देवकी और वसुदेव, कंस का भय, सात संतानों की मृत्यु और आठवीं संतान के रूप में कृष्ण का जन्म। फिर आधी रात वसुदेव का नवजात कृष्ण को लेकर यमुना पार करना और गोकुल पहुंचना। यह कथा शास्त्रों में अपने विस्तार के साथ मौजूद है, लेकिन लोक उसे अपने अनुभव के करीब ले आता है।
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में कृष्ण जन्म की रात का अपना ही चित्र मिलता है। कहीं देवकी की ममता है, कहीं वसुदेव की चिंता, कहीं कारागार का अंधेरा और कहीं बाहर बरसती वर्षा। संस्कृत के श्लोकों में कही गई कथा जब छत्तीसगढ़ी बोली में गाई जाती है तो वह सुनने वाले के घर की कथा लगने लगती है। यही लोक की विशेषता है। वह किसी कथा को केवल सुरक्षित नहीं रखता, उसे अपने जीवन में फिर से रचता है।
आठें कन्हैया की एक खास बात उसके चित्रों में इस्तेमाल होने वाले रंग भी हैं। परंपरागत रूप से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री से रंग तैयार करने की बात मिलती है। चूड़ी रंग एवं वनस्पतियों के पत्तों के निकले रंग से चित्र बना दिये जाते हैं। बाजार से रंग खरीदने की सुविधा नहीं थी, इसलिए आसपास की प्रकृति ही रंगों का स्रोत बनती थी।
यह केवल रंग बनाने की तरकीब नहीं थी। इसके पीछे अपने परिवेश को पहचानने का अनुभव था। कौन-सी चीज से रंग निकलेगा, किसे पीसना है, किसे घोलना है, कौन-सा रंग दीवार पर टिकेगा, यह सब किताब से नहीं सीखा जाता था। घर की बड़ी महिलाएं जानती थीं और अगली पीढ़ी उनके हाथ देखकर सीखती थी। इसलिए आठें कन्हैया को लोकभित्तिचित्र की परंपरा के साथ-साथ लोक ज्ञान के रूप में भी देखा जा सकता है।
इन चित्रों में कहीं-कहीं नाव और पतवार भी दिखाई देती हैं। इसकी संगति कृष्ण जन्म की उस कथा से बैठती है जिसमें वसुदेव नवजात कृष्ण को लेकर यमुना पार करते हैं। लोक ने कथा के इस प्रसंग को भी अपनी चित्रभाषा में जगह दी। लिखित शब्दों के बिना कहानी कह देने की यह क्षमता लोकचित्रों की अपनी विशेषता है।
कृष्ण का छत्तीसगढ़ी लोकजीवन से रिश्ता यहीं खत्म नहीं होता। कृष्ण यहां केवल देवकी-वसुदेव के पुत्र या मथुरा के राजकुमार नहीं हैं। वे ग्वालबालों के साथी हैं। गाय-बछड़ों के बीच रहने वाले कन्हैया हैं। दूध-दही और माखन की बाललीला वाले कृष्ण हैं। ग्रामीण जीवन में यह रूप अधिक सहजता से समाहित हो जाता है। शायद इसलिए जन्माष्टमी की रात की आस्था अगले दिन उत्सव का रूप ले लेती है।
कई गांवों में दही-लूट की परंपरा देखने को मिलती है। मटका टांगा जाता है। बच्चे और युवक उसे पाने के लिए जुटते हैं। ढोल बजते हैं, गड़वा बाजा गूंजता है और कहीं राऊत नाचा भी होता है। उस समय कृष्ण की बाललीला केवल सुनाई नहीं जाती, गांव उसे अपने ढंग से जीता है।
यहां उत्सव की एक और खूबसूरत बात दिखाई देती है। इसमें दर्शक और कलाकार अलग-अलग नहीं होते। जिस गांव में दही-लूट हो रही है, वही गांव उसका सहभागी भी है। कोई गीत गा रहा है, कोई बाजा बजा रहा है, कोई मटका सजा रहा है और बच्चे पूरी उत्सुकता से उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यही सामूहिकता लोकपर्वों को जीवित रखती है।
आठें कन्हैया की परंपरा में महिलाओं की भूमिका भी उल्लेखनीय है। घर की दीवार तैयार करना, चित्र बनाना, पूजा की सामग्री जुटाना और कृष्ण जन्म के गीत गाना, इन सबमें उनकी सक्रिय भागीदारी रहती है। कई लोकपरंपराएं इसलिए बची रहीं क्योंकि उन्हें किसी संस्था ने नहीं, घर की महिलाओं ने अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाकर आगे बढ़ाया। लोकसंस्कृति की सबसे बड़ी किताब कोई पुस्तकालय नहीं, बल्कि लोगों की स्मृति होती है।
छत्तीसगढ़ में जन्माष्टमी का यह लोक रूप इसी स्मृति का हिस्सा है। आठें कन्हैया में कृष्ण मंदिर से निकलकर घर तक आते हैं। उनके साथ आती है देवकी की ममता, वसुदेव की चिंता, यमुना की कथा, गोकुल की हंसी और गांव की सामूहिकता। यहां छत्तीसगढ़ अपने ढंग से भगवान कृष्ण पूजता है आठें कन्हैया के रूप में।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
