भारत भूमि देवताओं की लीला भूमि है, यहां कृष्ण आम जनजीवन में आदर्श रुप में समाहित हैं। गाँव के चौपाल से लेकर मंदिरों तक, खेत खलिहान से लेकर नदी घाट तक, कृष्ण का नाम हर जगह गूँजता है। यह गूँज केवल धार्मिक अनुष्ठान की नहीं है, यह एक सांस्कृतिक चेतना की है, जो सदियों से लोकमानस में रची बसी है। हमारे यहां आज भी कोई ग्वाला गाय चराने जाता है तो साथ में बांसूरी लेकर जाता है, जो गौचारण के दौरान उसके एकांत की साथी होती है और उसकी स्वर लहरी दूर तक कृष्ण तत्व की उपस्थिति का अहसास कराती है। कृष्ण तत्व का अर्थ है वह मूल भाव जो प्रेम, लीला, धर्म और आनंद को एक साथ जोड़ता है। यह तत्व शास्त्रों में जितना गहरा है, उतना ही सहज लोकगीतों और लोककथाओं में भी प्रवाहित होता है।
लोक संस्कृति में कृष्ण कभी राजा नहीं दिखते, वे सदा ग्वाला हैं, ग्वाल बाल सखा हैं। यह छवि जनसामान्य को अपने बहुत निकट लगती है। एक बालक जो लीलाएं करता है, गायों को चराता है, बांसुरी बजाता है, यही रूप गांव गांव में पूजा जाता है। उनके इस रूप में केवल सहजता और अपनापन है। महाभारत के कूटनीतिज्ञ कृष्ण और गीता के उपदेशक कृष्ण शास्त्रीय परंपरा में प्रधान रहे, परंतु लोक परंपरा ने बालकृष्ण और किशोर कृष्ण को अपने हृदय में सबसे ऊँचा स्थान दिया।
भागवत पुराण में कृष्ण के बारे में एक प्रसिद्ध श्लोक आता है:-
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
अर्थात मैं सबका उद्गम हूँ, मुझसे ही सब कुछ प्रवर्तित होता है, यह जानकर बुद्धिमान लोग भाव सहित मेरा भजन करते हैं। यही भाव, यही श्रद्धा, लोक परंपरा में कृष्ण भक्ति का मूल आधार बनी।
ब्रज क्षेत्र, जिसमें मथुरा, वृंदावन, गोकुल और बरसाना सम्मिलित हैं, कृष्ण तत्व का सबसे जीवंत केंद्र माना जाता है। यहाँ की धरती पर हर पेड़, हर कुंज, हर यमुना तट कृष्ण की स्मृति से जुड़ा है। ब्रज की लोकभाषा ब्रजभाषा में रचित पद आज भी गांव गांव में गाए जाते हैं। सूरदास जैसे कवियों ने कृष्ण के बाल रूप का ऐसा वर्णन किया कि वह मौखिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा बन गया। यशोदा का वात्सल्य, ग्वालबालों की क्रीड़ा, गोपियों का प्रेम, यह सब लोक कथाओं में सहज रूप से गुँथा हुआ मिलता है।
बरसाना की लठमार होली इसका सजीव उदाहरण है। यहाँ राधा और कृष्ण के प्रेम को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जहाँ स्त्रियाँ पुरुषों को रंग और लाठियों से खेलते हुए यह परंपरा निभाती हैं। यह उत्सव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक स्मृति है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है।
रासलीला भारतीय लोकनाट्य की एक अनूठी विधा है। यह मुख्यतः वृंदावन और मणिपुर में विशेष रूप से विकसित हुई। साधारण किसान और कलाकार मिलकर कृष्ण जन्म से लेकर रुक्मिणी विवाह तक की कथाओं को नाट्य रूप में प्रस्तुत करते हैं। मणिपुर की रासलीला को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में भी स्थान मिला है। यह परंपरा दिखाती है कि कृष्ण तत्व केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूर्वोत्तर भारत तक फैला।
इसी तरह छत्तीसगढ़ की पंडवानी, रहस और राजस्थान की ख्याल शैली में भी कृष्ण कथाएँ प्रमुखता से प्रस्तुत होती हैं। लोकनाट्य में अभिनय, संगीत और नृत्य का ऐसा संगम होता है कि दर्शक कथा से सीधा जुड़ाव अनुभव करता है। शास्त्रीय मंच की भव्यता के बिना भी यह परंपरा अपने आप में पूर्ण और प्रभावशाली है।
भारत के लगभग हर प्रांत में कृष्ण संबंधी लोकगीत मिलते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में सोहर तथा कजरी गीतों में कृष्ण जन्म का उल्लास गाया जाता है। राजस्थान के मीरा पद आज भी हर घर में गूँजते हैं। मीरा बाई ने कृष्ण को अपना सर्वस्व मान लिया था, और उनके पद लोक कंठ में इस तरह बसे कि वे शास्त्रीय साहित्य से अधिक लोक साहित्य बन गए। एक प्रसिद्ध पंक्ति है, पग घुँघरू बांध मीरा नाची रे। यह पंक्ति भक्ति और नृत्य के मेल का प्रतीक है।
महाराष्ट्र में अभंग परंपरा में संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर ने विठोबा के रूप में कृष्ण की उपासना की। विठोबा को कृष्ण का ही एक रूप माना जाता है। वारकरी संप्रदाय के भक्त प्रतिवर्ष पंढरपुर की यात्रा करते हैं, जिसमें लाखों लोग पैदल चलकर भजन गाते हुए विठोबा के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। यह यात्रा लोक भक्ति और सामूहिक श्रद्धा का जीवंत उदाहरण है।
गुजरात में गरबा और डांडिया रास की परंपरा भी कृष्ण लीला से प्रेरित मानी जाती है। रास शब्द स्वयं कृष्ण की गोपियों के साथ की गई लीला से जुड़ा है। नवरात्रि के अवसर पर यह नृत्य सामूहिक उल्लास का प्रतीक बन जाता है।
भगवद्गीता में कृष्ण स्वयं अपने अवतरण का कारण बताते हुए कहते हैं:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थात हे भारत, जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। इस श्लोक का भाव लोक परंपरा में भी गहराई से बसा है। लोक मान्यता है कि जब भी समाज पर अन्याय का बोझ बढ़ता है, कृष्ण किसी न किसी रूप में सहायता के लिए प्रकट होते हैं।
एक अन्य प्रसिद्ध श्लोक है:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थात सब धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो। यह श्लोक भक्ति मार्ग का सार माना जाता है, और लोक कीर्तन में इसका भाव बार बार व्यक्त होता है, भले ही मूल संस्कृत शब्द उतने प्रचलित न हों जितना उनका सरल अर्थ जन साधारण की भाषा में गाया जाता है।
जन्माष्टमी भारत के हर कोने में उल्लास के साथ मनाई जाती है। दही हांडी का उत्सव विशेष रूप से महाराष्ट्र में प्रसिद्ध है, जहाँ युवक मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर बंधी दही की हांडी फोड़ते हैं। यह उत्सव कृष्ण की माखन चोरी की लीला का प्रतीकात्मक पुनरावर्तन है। इसी तरह ओडिशा और बंगाल में भी जन्माष्टमी अलग अलग लोक रीतियों के साथ मनाई जाती है।
बंगाल में चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण भक्ति को संकीर्तन के माध्यम से जन जन तक पहुँचाया। हरे कृष्ण महामंत्र का सामूहिक गायन आज भी बंगाल की गलियों और मंदिरों में सुना जा सकता है। दक्षिण भारत में भी अंडाल और आलवार संतों ने तमिल भाषा में कृष्ण भक्ति के पद रचे, जिन्हें आज भी मंदिरों में गाया जाता है। यह दिखाता है कि कृष्ण तत्व ने भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को पार कर संपूर्ण भारत को एक भावनात्मक सूत्र में बाँध दिया।
कृष्ण तत्व केवल भक्ति तक सीमित नहीं है, इसमें गहरा दर्शन भी छिपा है। कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय गीता का मूल संदेश है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थात तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। फल की इच्छा से कर्म मत करो, परंतु कर्म न करने में भी आसक्त मत हो। यह सिद्धांत केवल दार्शनिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोक जीवन में भी एक व्यावहारिक मार्गदर्शक बन गया। किसान, कारीगर, और सामान्य गृहस्थ भी इस सिद्धांत को अपने जीवन में उतारते हुए बिना फल की चिंता किए अपना कर्तव्य निभाते आए हैं।
भारत के विभिन्न प्रांतों में कृष्ण की छवि अलग अलग रूपों में प्रकट होती है। कहीं वे जगन्नाथ के रूप में पूजे जाते हैं, जैसा कि ओडिशा के पुरी में होता है। कहीं वे विठोबा बनकर महाराष्ट्र में विराजते हैं। कहीं वे श्रीनाथजी के रूप में राजस्थान के नाथद्वारा में पूजित हैं। यह विविधता आश्चर्यजनक रूप से एक ही तत्व की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। हर क्षेत्र ने अपनी भाषा, अपनी परंपरा, अपने संगीत में कृष्ण को ढाला, फिर भी मूल भाव सर्वत्र एक समान रहा, प्रेम, करुणा और लीला का भाव।
कृष्ण तत्व भारतीय लोक संस्कृति की आत्मा में इस प्रकार रचा बसा है कि उसे अलग करके देखना असंभव है। यह तत्व शास्त्रों की गंभीरता से निकलकर लोकगीतों की सरलता में समाया, नाट्य परंपराओं में जीवंत हुआ, और पर्वों के उल्लास में साकार हुआ। सूरदास और मीरा के पदों से लेकर मणिपुर की रासलीला तक, पंढरपुर की यात्रा से लेकर बंगाल के संकीर्तन तक, कृष्ण तत्व ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को एक अदृश्य किंतु सुदृढ़ धागे से जोड़ा है। यही कारण है कि सदियाँ बीत जाने पर भी कृष्ण की बांसुरी की धुन आज भी हर भारतीय हृदय में गूँजती रहती है।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोकसंस्कृति के अध्येता हैं।
