छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में पितर पाख
गणेश पक्ष आते ही पितर पाख की आहट सुनाई देने लगती है, क्योंकि इस पाख में पितरों का आगमन होता है और उनका श्रद्धापूर्वक उन्हें याद करते हुए श्राद्ध किया …
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गणेश पक्ष आते ही पितर पाख की आहट सुनाई देने लगती है, क्योंकि इस पाख में पितरों का आगमन होता है और उनका श्रद्धापूर्वक उन्हें याद करते हुए श्राद्ध किया …
छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में पितर पाख Read Moreकुछ व्यक्तित्व अपने जीवनकाल में केवल काम नहीं करते, वे अपने पीछे एक कार्यपद्धति, एक संस्कार और एक पीढ़ी छोड़ जाते हैं। श्री एम. ए. कृष्णन जी ऐसे ही व्यक्तित्व …
एम. ए. सर : एक जीवन, अनेक प्रेरणाएँ —व्यक्ति चला जाता है, लेकिन उसका जीवन दिशा देता रहता है – कैलाश चन्द्र Read More
पितृपक्ष की प्रतीक्षा साल भर रहती है, इस पक्ष में अपने पितरों का श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। नियत तिथि पर तर्पण होता है, श्राद्ध किया जाता है। …
भारतीय चिंतन में पूर्वजों का स्थान एवं पितृऋण की अवधारणा Read More
गणेश पक्ष आते ही पितर पाख की आहट सुनाई देने लगती है, क्योंकि इस पाख में पितरों का आगमन होता है और उनका श्रद्धापूर्वक उन्हें याद करते हुए श्राद्ध किया …
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(26 सितम्बर जयंती पर सादर समर्पित) “बेचे थाको विद्यासागर चिरंजीबी होए”-जीते रहो विद्यासागर, चिरंजीवी हो!यह बंगाल के साड़ी बुनकर – साड़ियों में बुनते थे,इसे आधुनिक भारत में नारी सशक्तिकरण के …
“नारी सशक्तिकरण के पुरोगामी : बेचे थाको विद्यासागर चिरंजीबी होए” Read More
भारतीय राजनीति के वृहदाकाश में दैदीप्यमान पं. दीनदयाल उपाध्याय अपने राष्ट्रीय विचारों और प्रखर चिंतक, विचारक के तौर पर लब्धप्रतिष्ठित हैं। सनातन हिन्दू संस्कृति के मुखर पक्षधर और तदानुरुप रीति-नीति …
राजनीति राष्ट्र के लिए : पं. दीनदयाल उपाध्याय का राजनीतिक दर्शन Read More
दीनदयाल उपाध्याय का नाम स्मरण में आते ही एकात्म मानवदर्शन सामने आ जाता है, लेकिन इस विचार तक पहुंचने से पहले उनकी कलम कई अलग-अलग विषयों से होकर गुजर चुकी …
सम्राट चन्द्रगुप्त से एकात्म मानवदर्शन तक पं दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की यात्रा Read More
भारतीय संस्कृति पर आक्रमण तलवारों से नहीं, कथाओं से हुआ है। जो सभ्यता पाँच हज़ार वर्ष तक किसी विदेशी साम्राज्य के सामने नहीं झुकी, वह बीते पचास वर्षों में एक …
द्रोण–एकलव्य का मिथ्यांकन : भारतीय स्मृति पर वामपंथी वैचारिक आक्रमण – कैलाशचंद्र Read More
रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहा है कि समाज को देना ‘चैरिटी’ है और समाज को वापस लौटाना ‘धर्म’ है। भारत सदियों से यही परंपरा निभाता आया है। तीर्थयात्रियों के रहने के …
व्यक्ति ‘धर्मप्रवण’ बने और समाज धर्माधिष्ठित रहे (धर्म निरपेक्ष नहीं) Read More
“एक बीज जड़ों, तनों, शाखाओं, पत्तियों, फूलों और फलों के रूप में व्यक्त होता है, फिर भी हम बीज के माध्यम से उसकी एकता को पहचानते हैं।”— पंडित दीनदयाल उपाध्याय …
अंत्योदय से विकसित भारत तक : दीनदयाल जी के विचारों की यात्रा Read More