नई दिल्ली में १२–१३ सितम्बर २०२६ को आयोजित अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मानना उसके वास्तविक महत्व को सीमित करना होगा। भारत की अध्यक्षता में हुआ यह सम्मेलन उस बदलती विश्व-व्यवस्था का संकेत है, जिसमें शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे एकध्रुवीय, दोध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है। भारत ने इस अवसर को केवल अपनी कूटनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को दिशा देने और अपने राष्ट्रीय हितों को व्यापक वैश्विक सहयोग से जोड़ने के लिए इस्तेमाल किया।
भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता के लिए लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थायित्व को लगातार आधार बनाया। आतंकवाद से लेकर व्यापार, स्थानीय मुद्राओं से लेकर डिजिटल
सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर स्वास्थ्य, उद्योग से लेकर वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के सुधार तक—नई दिल्ली घोषणा ने ब्रिक्स को केवल राजनीतिक समूह नहीं, बल्कि विकास और वैश्विक शासन के वैकल्पिक मंच के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
ब्रिक्स की असली परीक्षा : क्या भारत एजेंडा बदल सका?
किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की अध्यक्षता की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि कितनी बैठकें हुईं, बल्कि इससे मापी जाती है कि चर्चा की दिशा कितनी बदली। भारत की अध्यक्षता में ३० भारतीय नगरों में ४०० से अधिक बैठकें और सहभागिता कार्यक्रम हुए। इसका अर्थ यह था कि ब्रिक्स केवल राजधानी-केंद्रित कूटनीतिक आयोजन न रहकर भारत के आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक और प्रशासनिक अनुभवों से जुड़ा।
भारत ने ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनाने के बजाय समाधान-केंद्रित सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाया। यही उसकी सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि है। भारत जानता है कि आज की विश्व-व्यवस्था में किसी एक खेमे का स्थायी सदस्य बनकर राष्ट्रीय हित सुरक्षित नहीं किए जा सकते।
इसलिए भारत की नीति जैसी देश के भीतर स्पष्ट है वैसी ही दृष्टि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में —सहयोग सबके साथ, निर्णय राष्ट्रीय हित में।
आतंकवाद पर भारत की सबसे स्पष्ट आवाज
ब्रिक्स घोषणा में आतंकवाद, आतंकवादी वित्तपोषण, सुरक्षित पनाहगाहों और सीमा-पार आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट भाषा का आना भारत के लिए विशेष महत्व रखता है। पहलगाम जैसी घटनाओं के बाद भारत के लिए यह केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।
भारत लगातार कहता रहा है कि आतंकवाद को अच्छा और बुरा, स्वतंत्रता सेनानी और आतंकवादी, या क्षेत्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता। यदि किसी देश की भूमि, संस्थागत व्यवस्था या आर्थिक तंत्र आतंकवाद को आश्रय देता है, तो उसका प्रभाव केवल एक देश तक सीमित नहीं रहता।
इसलिए आतंकवाद के विरुद्ध भारत की प्राथमिकता केवल निंदा तक सीमित नहीं हो सकती। उसे आतंकवादी वित्तपोषण रोकने, डिजिटल नेटवर्क पर कार्रवाई, हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी पर नियंत्रण तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे को मजबूत करने तक ले जाना होगा। यही वह क्षेत्र है जहां भारत अपनी कूटनीतिक स्थिति को ठोस सुरक्षा सहयोग में बदल सकता है।
वैश्विक दक्षिण : भारत के लिए अवसर भी, उत्तरदायित्व भी
बल्कि उसके अनुभव के कारण भी बढ़ी है। भारत ने लोकतंत्र के साथ विकास, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के साथ वित्तीय समावेशन, सस्ती दवाओं के साथ स्वास्थ्य सेवा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के साथ विकास और बड़े पैमाने पर कल्याणकारी योजनाओं को जोड़ने का प्रयोग किया है।
इसलिए भारत यदि वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करना चाहता है तो उसे केवल भाषण देने वाला नेतृत्व नहीं, बल्कि समाधान उपलब्ध कराने वाला नेतृत्व बनना होगा। यह सम्मेलन उसकी भूमिका को वैसा ही समृद्ध करता है।
ब्रिक्स बनाम पश्चिम का भ्रम
ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी गठबंधन मानना एक बड़ी रणनीतिक भूल होगी। भारत ने न तो ऐसा संकेत दिया है और न ही उसकी विदेश नीति का मूल स्वभाव ऐसा है।भारत एक साथ ब्रिक्स में है, क्वाड में है, जी-२० में सक्रिय है, शंघाई सहयोग संगठन के साथ काम करता है, रूस से संबंध बनाए रखता है और अमेरिका तथा यूरोप के साथ भी रणनीतिक एवं आर्थिक साझेदारी बढ़ाता है। यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखीय कूटनीति है।
यही कारण है कि ब्रिक्स में भारत की सक्रियता को रूस या चीन के साथ निकटता के सरल चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह भारत की व्यापक कूटनीतिक रणनीति का एक हिस्सा है।
डॉलर का अंत नहीं, भुगतान व्यवस्था का विविधीकरण
ब्रिक्स में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान प्रणालियों के बीच सहयोग की चर्चा महत्वपूर्ण है, इस पर लगातार विचार और कार्य बढ़ता जा रहा है। लेकिन अभी बड़ी सफलता को लेकर इसके बारे में अतिशयोक्ति से बचना चाहिए।
ब्रिक्स ने कोई साझा मुद्रा घोषित नहीं की है। न ही डॉलर व्यवस्था को तत्काल समाप्त करने का कोई निर्णय हुआ है। वास्तविक दिशा इससे अधिक व्यावहारिक है—अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अन्य संभावना और विकल्पों को बढ़ाना।
यदि दो देशों के बीच व्यापार स्थानीय मुद्राओं में अधिक आसानी से हो सके, भुगतान प्रणालियां परस्पर जुड़ सकें और लेन-देन की लागत घटे, तो इससे डॉलर पर अनावश्यक निर्भरता कम हो सकती है।
भारत के लिए यह विशेष अवसर है। लेकिन इसका लाभ तभी होगा जब स्थानीय मुद्रा भुगतान के साथ भारतीय निर्यात भी बढ़े। केवल भुगतान प्रणाली बदलने से व्यापार घाटा समाप्त नहीं होगा। यहीं से ब्रिक्स की कूटनीति भारत की आर्थिक नीति से जुड़ती है।
भारत का डिजिटल मॉडल : आधार और यूपीआई से आगे
भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना आज उसकी सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक शक्तियों में से एक बन चुकी है। डिजिटल पहचान, त्वरित भुगतान, डिजिटल शासन और वित्तीय समावेशन के भारतीय अनुभव में विकासशील देशों के लिए बड़ी उपयोगिता है।
ब्रिक्स के भीतर डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर सहयोग की दिशा इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह भारत के अनुभव को वैश्विक दक्षिण के साथ साझा करने का अवसर देती है।
लेकिन यहां भी सावधानी आवश्यक है। भारत का डिजिटल मॉडल केवल तकनीकी मंच नहीं है। इसके पीछे विशाल पहचान तंत्र, बैंकिंग नेटवर्क, दूरसंचार ढांचा, नियामकीय व्यवस्था और करोड़ों नागरिकों का डिजिटल उपयोग है।
इसलिए भारत को केवल तकनीक बेचने के बजाय डिजिटल शासन का संपूर्ण अनुभव साझा करना चाहिए।
यही भारत को वैश्विक दक्षिण में तकनीकी शक्ति बना सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य और उद्योग : अगली शक्ति-प्रतिस्पर्धा
भविष्य की विश्व-व्यवस्था केवल सैनिक शक्ति से तय नहीं होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, ऊर्जा और उद्योग ४.० नई शक्ति के निर्णायक क्षेत्र होंगे।
भारत ने ब्रिक्स के मंच पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समावेशी, सुरक्षित, विश्वसनीय और मानव-केंद्रित बनाने पर जोर दिया। वैश्विक दक्षिण के लिए यह विशेष महत्व रखता है, क्योंकि तकनीकी क्रांति का लाभ यदि कुछ विकसित देशों और बड़ी कंपनियों तक सीमित रह गया तो डिजिटल असमानता नई आर्थिक असमानता में बदल सकती है।
इसी प्रकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत के पास सस्ती दवाओं, वैक्सीन, चिकित्सा प्रशिक्षण और बड़े स्वास्थ्य-तंत्र का अनुभव है।
उद्योग ४.० के लिए भारत का औद्योगिक दक्षता केंद्र, सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों की क्षमता वृद्धि तथा नवाचार और स्टार्टअप सहयोग भी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन यहां चुनौती स्पष्ट है—भारत को उपभोक्ता बाजार से प्रौद्योगिकी निर्माता बनना होगा।
चीन के साथ संवाद : प्रतिस्पर्धा भी, सहयोग भी
ब्रिक्स की सफलता का एक बड़ा प्रश्न भारत-चीन संबंधों से जुड़ा है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा वास्तविकताएं हैं। उन्हें नजरअंदाज करके
ब्रिक्स को समझा ही नहीं जा सकता।
लेकिन कूटनीति का अर्थ यही है कि जहां मतभेद हैं वहां मतभेदों का प्रबंधन हो और जहां सहयोग की संभावना है वहां संवाद हो। सीमा पर शांति, व्यापार, बाजार तक पहुंच, आपूर्ति शृंखलाओं और संपर्क के विषयों पर संवाद भारत के हित में है। लेकिन संवाद का अर्थ निर्भरता नहीं हो सकता।
भारत को चीन के साथ संबंधों में शांति और व्यावसायिक संतुलन दोनों ही साधने होंगे—जहां आवश्यक हो वहां प्रतिस्पर्धा, जहां संभव हो वहां सहयोग और जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न हो वहां स्पष्ट दृढ़ता भी चाहिये। यही परिपक्व बहु-संरेखीय कूटनीति है।
रूस और पश्चिम एशिया : भारत की संतुलनकारी भूमिका
रूस के साथ भारत के संबंध ऊर्जा, रक्षा, तकनीक और दीर्घकालीन रणनीतिक सहयोग से जुड़े हैं। दूसरी ओर अमेरिका और यूरोप भारत के लिए व्यापार, निवेश, तकनीक और वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। भारत की चुनौती किसी एक संबंध को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि इन सभी संबंधों को राष्ट्रीय हित के अनुरूप संचालित करना है।
पश्चिम एशिया में भी भारत को यही संतुलन बनाए रखना होगा। ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय प्रवासी, व्यापार, समुद्री मार्ग और क्षेत्रीय स्थिरता—सभी सीधे भारतीय हितों से जुड़े हैं। इसलिए भारत का संदेश स्पष्ट है। —भारत किसी संघर्ष का पक्षकार नहीं, शांति और स्थिरता का पक्षधर है; लेकिन स्वयं के राष्ट्रीय हितों की कीमत पर नहीं।
अब असली चुनौती : कूटनीतिक विजय को आर्थिक शक्ति में बदलना
नई दिल्ली में भारत ने कूटनीतिक प्रभाव अवश्य बढ़ाया है, लेकिन अंतिम सफलता सम्मेलन के मंच पर नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था में दिखाई देगी।
चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा, रूस से आयात की बड़ी मात्रा और अनेक रणनीतिक क्षेत्रों में बाहरी निर्भरता यह बताती है कि भारत को केवल व्यापार बढ़ाने की नहीं, बल्कि व्यापार की गुणवत्ता बदलने की आवश्यकता है।
ब्रिक्स भारत के लिए बाजार खोल सकता है, भुगतान की नई व्यवस्थाएं दे सकता है, तकनीकी सहयोग बढ़ा सकता है, निवेश आकर्षित कर सकता है और वैश्विक दक्षिण में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ा सकता है।
लेकिन अवसर को परिणाम में बदलने के लिए भारत को विनिर्माण, अनुसंधान, कौशल, लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता, निर्यात वित्त और घरेलू मूल्य-वर्धन पर समान गति से काम करना होगा।
ब्रिक्स की सबसे बड़ी उपलब्धि तब होगी जब भारत सम्मेलन की कूटनीतिक पूंजी को कारखानों, प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप, निर्यात और रोजगार में बदल सके।
निष्कर्ष : भारत को मंच नहीं, परिणाम चाहिए
नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन ने एक बात स्पष्ट कर दी है—भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था का दर्शक नहीं है। वह उसके पुनर्गठन में अपनी भूमिका चाहता है।
आतंकवाद पर स्पष्टता, वैश्विक दक्षिण की आवाज, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, डिजिटल
सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, उद्योग ४.० और रणनीतिक स्वायत्तता—इन सभी को यदि एक सूत्र में पिरोया जाए तो भारत की दिशा स्पष्ट दिखाई देती है।
लेकिन भारत को दावों से अधिक परिणामों की आवश्यकता है।
ब्रिक्स में भारत की वास्तविक सफलता तब होगी जब—
कूटनीतिक प्रभावों को आर्थिक अवसर में, उसे तकनीकी क्षमता बढ़ाने में, लगातार भारतीय निर्यात बढ़े और सब मिलकर ये रणनीतिक स्वायत्तता में बदला जाए, ये महत्वपूर्ण है।
ब्रिक्स न तो डॉलर के अंत की घोषणा है, न पश्चिमी व्यवस्था के अंत की और न ही किसी नए सैन्य गठबंधन का प्रारंभ। यह बदलती विश्व-व्यवस्था में विकल्पों, सहयोग और प्रभाव के नए रास्ते तलाशने का मंच है।
और भारत के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण अर्थ यही है—
सहयोग सबके साथ रहे, प्रतिस्पर्धा जहां आवश्यक हो वहीं तक, और निर्णय निसंदेह हमेशा भारत के राष्ट्रीय हित में ही चाहिये।

कैलाश चन्द्र
