आज जिस तरह रायपुर शहर बाहर की तरफ़ चारों ओर फ़ैलकर आस पास के गांवों को अपने भीतर समाहित कर महानगर बनने की राह पर है, 1931 का रायपुर इससे कुछ अलग ही था। कुछ पुराने मोहल्ले थे और शहर अपनी मंथर गति से चलता था। आसपास गांव थे, खेत थे और चलती हुई पगडंडिया थी, जो आस पास के गांवों तक जाती थी, वे आज नगर निगम की सीमा में है।
इसी रायपुर में 18 जून 1931 को एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसका नाम आगे चलकर देश के एक बड़े संगठन के शीर्ष से जुड़ना था। नाम था कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन। बाद में लोग उन्हें के. एस. सुदर्शन के नाम से जानने लगे।
लेकिन किसी व्यक्ति की जीवन यात्रा उसके उस पद से शुरू नहीं होती, जहां पहुंचकर दुनिया उसे पहचानती है। उसके पहले घर होता है, शहर होता है, स्कूल होता है, रास्ते होते हैं और वे लोग होते हैं जिनके बीच वह बड़ा होता है। सुदर्शन जी के मामले में इन शुरुआती जगहों को देखें तो रायपुर और फिर रायगढ़ बार-बार स्मरण होते हैं।
सुदर्शन जी के पिता सीतारामय्या मध्य प्रदेश शासन के वन विभाग में कार्यरत थे। नौकरी के कारण परिवार को अलग-अलग स्थानों पर रहना पड़ा। सुदर्शन जी की प्राथमिक शिक्षा रायपुर, दमोह और मंडला में हुई, जबकि चंद्रपुर से उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में जबलपुर से दूरसंचार में अभियांत्रिकी की पढ़ाई की।
घर की सांस्कृतिक जड़ें कर्नाटक के कुप्पहली गांव से जुड़ी थीं। परिवार की भाषा और परंपरा का अपना संसार था, लेकिन सुदर्शन जी का बचपन मध्यभारत में बीता। घर के भीतर कर्नाटक कुल परंपरा और बाहर एक बिल्कुल अलग सामाजिक परिवेश था। शायद किसी बच्चे के लिए इससे बड़ा परिचय भारत को समझने का और क्या हो सकता था कि उसकी अपनी पहचान एक जगह से जुड़ी हो और उसका बचपन कई जगहों के बीच बीते।
रायपुर उस समय मध्यप्रदेश का हिस्सा था। छत्तीसगढ़ नाम से अलग राज्य तब अस्तित्व में नहीं था। इसलिए सुदर्शन जी को आज के छत्तीसगढ़ की भौगोलिक सीमा में रखकर देखना पर्याप्त नहीं है। जिस सामाजिक दायरे में उनका बचपन बीता, वह मध्यभारत का बड़ा क्षेत्र था। रायपुर से मंडला, दमोह और चंद्रपुर तक की आवाजाही ने जीवन के अनेक अनुभव सिखाए और फिर एक दिन वही बच्चा रायपुर की शाखा में पहुंचा।
सुदर्शन जी लगभग नौ वर्ष की उम्र में संघ की शाखा में जाने लगे थे। इस उम्र में कोई बच्चा किसी विचारधारा का पूरा अर्थ समझकर किसी संगठन से नहीं जुड़ता। उसके लिए शाखा खेल, अनुशासन, साथियों और रोज के मिलने-जुलने का स्थान भी होती है। लेकिन कुछ अनुभव उम्र के साथ भीतर कहीं स्थान पा जाते हैं। सुदर्शन जी के जीवन में संघ से यह शुरुआती संपर्क आगे चलकर जीवन का रास्ता बन गया।
1954 में जबलपुर से दूरसंचार अभियांत्रिकी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने एक सीधा रास्ता था, इंजीनियर की नौकरी का। उस समय इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करना कोई मामूली बात नहीं थी। नौकरी मिल सकती थी, जीवन व्यवस्थित हो सकता था और एक सुरक्षित पेशेवर भविष्य सामने था। लेकिन सुदर्शन जी ने वह रास्ता नहीं चुना।
उन्होंने पूर्णकालिक प्रचारक का जीवन स्वीकार किया और उनकी पहली नियुक्ति रायगढ़ जिले में हुई। 23 जून 1954 को उन्हें रायगढ़ जिले में तहसील प्रचारक की जिम्मेदारी दी गई थी। उनके कार्यक्षेत्र में चांपा, जांजगीर और बिलासपुर की तहसीलें भी थीं। यहां उनकी जीवन यात्रा में रायपुर से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है रायगढ़।
एक इंजीनियरिंग स्नातक युवक अब किताबों और प्रयोगशालाओं से निकलकर उन इलाकों में था जहां उसे लोगों के बीच काम करना था। यात्रा करनी थी, गांव-कस्बों में जाना था, लोगों से मिलना था और संगठन का काम करना था। इंजीनियरिंग ने उन्हें मशीनों और तकनीक की दुनिया से परिचित कराया था। रायगढ़ ने उन्हें समाज की दुनिया के करीब ला दिया। यह फर्क समझना जरूरी है।
किसी व्यक्ति ने कितनी किताबें पढ़ीं, यह उसके बौद्धिक जीवन एवं परिवेश का एक हिस्सा बताता है। लेकिन उसने किन लोगों के बीच समय बिताया, किन रास्तों से गुजरा और किस तरह के समाज को नजदीक से देखा, यह उसके सोचने के ढंग के बारे में कुछ और बताता है।
सुदर्शन जी का प्रचारक जीवन यहीं से आगे बढ़ा। लगभग दो वर्ष रायगढ़ क्षेत्र में काम करने के बाद वे सागर गए। फिर संगठनात्मक जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। 1957 से 1964 तक वे विंध्य क्षेत्र के विभाग प्रचारक रहे और 1964 में मध्यभारत के प्रांत प्रचारक बनाए गए। तेतीस वर्ष की उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलना अपने आप में उल्लेखनीय था। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि उस जिम्मेदारी तक पहुंचने से पहले उन्होंने समाज के बीच कई वर्ष बिताए थे।
आगे चलकर सुदर्शन जी के विचारों में स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, ग्राम अर्थव्यवस्था, तकनीक और विकास जैसे विषय बार-बार दिखाई देते हैं। उनके व्यक्तित्व को केवल बाद के राष्ट्रीय पदों से देखकर इन विचारों को समझना अधूरा होगा। उनके जीवन की शुरुआती जमीन में आधुनिक शिक्षा और स्थानीय समाज, दोनों साथ मौजूद थे
सुदर्शन जी की आगे की यात्रा तेजी से विस्तृत होती गई। 1964 में वे मध्यभारत के प्रांत प्रचारक बने। 1969 से उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर शारीरिक प्रशिक्षण की जिम्मेदारी मिली। 1979 में वे अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख बने और 1990 में सह-सरकार्यवाह का दायित्व संभाला। इस तरह उनका व्यक्तित्व संगठन के दो अलग-अलग पक्षों, शारीरिक प्रशिक्षण और बौद्धिक कार्य, दोनों से जुड़ा रहा। 10 मार्च 2000 को उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पांचवां सरसंघचालक बनाया गया, देश ने उन्हें सरसंघचालक के पद पर कार्य करते देखा। 2009 में उन्होंने यह जिम्मेदारी मोहन भागवत जी को सौंप दी।
कहते हैं कि दुनिया गोल है, कहावत हैं जहां से चलना शुरु करते हैं कभी वहां लौटकर भी आते हैं। सुदर्शन जी का जन्म रायपुर में हुआ था। बचपन का एक हिस्सा इसी शहर में बीता। फिर पढ़ाई के लिए वे बाहर गए। इंजीनियर बने। प्रचारक बने। रायगढ़ से उनकी कर्मयात्रा शुरू हुई। देश के अलग-अलग हिस्सों में काम किया। संगठन के शीर्ष तक पहुंचे और फिर जीवन के अंतिम दिनों में रायपुर लौट आए।
15 सितंबर 2012 को रायपुर में उनका निधन हुआ। जिस शहर में उनका जन्म हुआ था, जीवन का अंतिम पड़ाव भी वही बना। ऐसा संयोग बिरला ही होता है। जीवन के अध्याय का पहला पन्ना जहां लिखा गया, उसी का अंतिम पन्ना भी वहीं लिखा गया। मेरा मानना है कि पुण्यात्मा के साथ ही इस तरह का संयोग होता है कि जिस स्थान पर जन्म लेकर आंखें खोली वहीं आंखें भी बंद हुई। ऐसे महापुरुष को मेरा शत शत नमन।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

