लोक संस्कृति में राधा नाम की व्याप्ति : राधाष्टमी विशेष

गाँव की बैठकों से लेकर ब्रज की गलियों तक चले जाइए, राधा नाम सुनाई पड़ ही जाएगा। कभी किसी भजन की टेक में, कभी किसी विरह गीत में, कभी किसी स्त्री के मंगलगान में और कभी कृष्ण के नाम से पहले सहज ही जुड़ते हुए। “राधे-राधे” वहाँ केवल अभिवादन नहीं है, वह एक आत्मीय संबोधन भी है। जैसे सामने वाले से बात करने के पहले ही मन ने भक्ति का एक छोटा-सा दीप जला दिया हो।

राधा का यही लोक रूप उन्हें केवल धार्मिक आख्यान का पात्र नहीं रहने देता। वे धीरे-धीरे लोक में उतरती हैं और फिर लोकभाषा, लोकगीत, लोकविश्वास और लोकाचार का हिस्सा बन जाती हैं। यही कारण है कि राधा को समझने के लिए केवल ग्रंथों के पन्ने पलटना पर्याप्त नहीं। उनके लिए उन स्वरों को भी सुनना पड़ता है जो पीढ़ियों से बिना किसी लिखित दस्तावेज के गाँवों, घरों और मंदिरों में गूँजते हैं।

राधा नाम की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि वह कृष्ण से अलग होकर भी कृष्ण से अलग नहीं होता। “राधा-कृष्ण” कहना हो या “राधे-श्याम”, दोनों नामों के बीच लोक ने एक ऐसा संबंध बना दिया है जिसमें प्रेम और भक्ति एक-दूसरे से अलग दिखाई नहीं देते। कृष्ण जहाँ लीला, संगीत और आकर्षण के प्रतीक बनते हैं, वहीं राधा उस प्रेम की अनुभूति बनकर सामने आती हैं जिसमें मिलन से अधिक प्रतीक्षा, अधिकार से अधिक समर्पण और प्राप्ति से अधिक स्मरण का महत्व है।

ब्रज के लोकजीवन में “राधे-राधे” का उच्चारण इसी भावभूमि से निकला हुआ लगता है। वहाँ यह केवल देवी का नाम नहीं, जीवन के व्यवहार का हिस्सा है। किसी से मिलने पर “राधे-राधे”, किसी राहगीर को संबोधन में “राधे-राधे”, मंदिर की ओर जाते हुए “राधे-राधे”। एक नाम धीरे-धीरे सामाजिक व्यवहार की भाषा बन जाता है। यह लोक संस्कृति की अपनी विशेषता है कि वह बड़े दार्शनिक विचारों को भी रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहारों में उतार देती है।

राधा का लोक में प्रवेश केवल ब्रज तक सीमित नहीं है। भारत के अनेक क्षेत्रों में राधा-कृष्ण के गीतों की अपनी परंपरा है। विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में कृष्ण और राधा का उल्लेख मिलता है। झूला पड़ता है तो सावन के गीतों में राधा और श्याम आ जाते हैं। जन्माष्टमी का उत्सव हो तो कृष्ण के साथ राधा भी जुड़ती है। मंदिरों के भजन हों या गाँव की स्त्रियों के सामूहिक गीत, राधा का नाम किसी न किसी रूप में अपनी जगह बना लेता है।

लोकगीतों में राधा का रूप विशेष रूप से रोचक है। यहाँ वे हमेशा मंदिर में विराजमान देवी के रूप में नहीं आतीं। वे कभी सखी हैं, कभी प्रेमिका, कभी प्रतीक्षारत स्त्री, कभी रूठी हुई नायिका और कभी ऐसी स्त्री, जिसकी आँखों से कृष्ण की अनुपस्थिति का दुःख झलकता है। लोक ने राधा को अपने जीवन की स्त्री-अनुभूति से जोड़ लिया है। इसलिए उनके गीतों में प्रेम का सुख जितना है, विरह की कसक भी उतनी ही गहरी है।

शायद इसी कारण राधा का नाम लोकगीतों में इतना सहज लगता है। लोक ने प्रेम को कभी केवल दार्शनिक विषय नहीं माना। उसके लिए प्रेम खेत में बबूल के वृक्ष के नीचे प्रतीक्षा करती स्त्री की आँखों में भी है, सावन की पहली बारिश में भी, झूले की गति में भी और दूर गए प्रिय की याद में भी। राधा इन सब अनुभूतियों के लिए एक सांस्कृतिक प्रतीक बन जाती हैं।

“श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम” जैसी लोकप्रिय भजन-पंक्ति में भी यही लोकभाव दिखाई देता है। बंसी कृष्ण की है, लेकिन उसकी पुकार राधा के नाम से जुड़ती है। यह संबंध किसी तर्क से नहीं बनता। लोकगीत तर्क नहीं माँगते, वे भाव की संगति तलाशते हैं। इसलिए कृष्ण की बंसी और राधा का नाम एक साथ सुनाई देते हैं तो लोक उसे सहज ही स्वीकार कर लेता है।

इसी तरह “राधे-राधे जपो, चले आएँगे बिहारी” जैसी भजन परंपरा में राधा का नाम कृष्ण तक पहुँचने का माध्यम बन जाता है। यहाँ राधा और कृष्ण के बीच कोई दूरी नहीं रह जाती। राधा का स्मरण कृष्ण की स्मृति में बदल जाता है। यह भारतीय भक्ति परंपरा की उस विशेष दृष्टि को सामने लाता है जिसमें ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता प्रेम और समर्पण से होकर जाता है।

राधा का यह लोक विस्तार संगीत के साथ-साथ नृत्य में भी दिखाई देता है। ब्रज की रास परंपरा में राधा-कृष्ण का संबंध केवल कथा नहीं, प्रदर्शन और सामूहिक स्मृति का हिस्सा है। रास, झूला, होली और फाग के अवसरों पर गाए-बजाए जाने वाले गीतों में राधा का नाम वातावरण को एक अलग भाव देता है। विशेषकर होली के ब्रज गीतों में राधा और कृष्ण का संबंध गंभीर भक्ति से निकलकर हँसी, ठिठोली और लोक उल्लास तक पहुँच जाता है।

यही लोक संस्कृति की खूबसूरती है। वह देवताओं को अपने बीच बैठा लेती है। कृष्ण उसके लिए केवल मंदिर के गर्भगृह में विराजमान भगवान नहीं रहते, वे गली में रंग खेलने वाले श्याम भी बन जाते हैं। राधा भी केवल आराध्या नहीं रहतीं, वे उस लोक की अपनी राधा बन जाती हैं जो कभी रूठती हैं, कभी मान करती हैं और कभी कृष्ण की बंसी सुनकर सब कुछ भूल जाती हैं।

राधा नाम की व्याप्ति लोककला में भी देखी जा सकती है। मंदिरों की चित्रकारी, लोकचित्र, पटचित्र, वस्त्रों की सज्जा और धार्मिक कैलेंडरों से लेकर घरों की छोटी-छोटी सजावटी आकृतियों तक राधा-कृष्ण की जोड़ी भारतीय दृश्य संस्कृति का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। एक ओर राधा की सौम्यता है, दूसरी ओर कृष्ण का श्याम रंग और बंसी। दोनों को साथ चित्रित करने की परंपरा ने भारतीय कला को प्रेम और भक्ति का एक ऐसा दृश्य रूप दिया है जिसे देखकर कथा कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

लेकिन राधा की लोकप्रियता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि लोक ने उन्हें केवल प्रेम की नायिका बनाकर नहीं छोड़ा। समय के साथ राधा भक्ति की अधिष्ठात्री और कृष्ण-प्रेम की सर्वोच्च अनुभूति के रूप में प्रतिष्ठित होती गईं। मध्यकालीन भक्ति साहित्य में जयदेव से लेकर विद्यापति, चंडीदास, सूरदास और आगे की अनेक भक्त-काव्य परंपराओं तक राधा का रूप अलग-अलग भावों में विकसित हुआ। कहीं उनका प्रेम मानवीय है, कहीं आध्यात्मिक और कहीं दोनों के बीच की सीमाएँ ही मिट जाती हैं।

लोक ने इसी बहुरंगी राधा को अपने ढंग से स्वीकार किया। उसने शास्त्रों से जितना लिया, उतना ही अपने अनुभव से उसमें जोड़ भी दिया। इसीलिए अलग-अलग क्षेत्रों में राधा की छवि और उनके गीतों का स्वर अलग मिलता है। कहीं वे विरह की प्रतीक हैं, कहीं प्रेम की, कहीं भक्ति की और कहीं स्त्री के मन की स्वतंत्र अभिव्यक्ति की।

राधा नाम की यह यात्रा हमें भारतीय लोक संस्कृति के बारे में भी बहुत कुछ बताती है। लोक किसी पात्र को इसलिए जीवित नहीं रखता कि वह किसी ग्रंथ में लिखा हुआ है। वह उसे तब तक अपने साथ रखता है जब तक वह उसके जीवन और भावनाओं से जुड़ा रहता है। राधा इसी कसौटी पर खरी उतरती हैं। उनका प्रेम लोक को अपना प्रेम लगता है, उनका विरह अपना विरह और उनका स्मरण अपनी भक्ति।

राधाष्टमी के अवसर पर इसलिए राधा को केवल बरसाने में जन्मी एक धार्मिक चरित्र के रूप में देखना शायद उनके लोक रूप को छोटा कर देना होगा। राधा उस सांस्कृतिक स्मृति का नाम हैं जिसे गीतों ने सँभाला, भजनों ने आगे बढ़ाया, नृत्य ने शरीर दिया, चित्रों ने रंग दिया और लोकभाषा ने रोजमर्रा के संबोधन में जगह दी।

एक नाम जब पूजा से निकलकर लोक व्यवहार में आ जाता है तो उसकी यात्रा बहुत लंबी हो जाती है। राधा नाम के साथ भी यही हुआ है। मंदिर में उच्चरित “राधे” से लेकर किसी लोकगीत की पंक्ति में गूँजती “राधा” तक और किसी वृद्ध के सहज अभिवादन “राधे-राधे” तक, यह नाम भारतीय लोकजीवन में अनेक रूपों में साँस लेता दिखाई देता है।

शायद राधा की सबसे बड़ी लोकस्वीकृति यही है कि उन्हें पुकारने के लिए किसी विशेष अवसर की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रेम में उन्हें पुकारा जा सकता है, विरह में भी। भक्ति में उनका नाम लिया जा सकता है और लोक के उल्लास में भी। कृष्ण को याद करते हुए राधा का स्मरण हो जाता है और राधा का नाम लेते ही कृष्ण की बंसी कहीं दूर सुनाई देने लगती है।

इसलिए राधा केवल एक नाम नहीं रह गईं। वे भारतीय लोक की उस स्मृति का हिस्सा बन गई हैं जिसमें प्रेम पूजा से अलग नहीं है और पूजा जीवन से अलग नहीं। लोक संस्कृति में राधा नाम की व्याप्ति दरअसल उस प्रेम की व्याप्ति है, जिसे पीढ़ियाँ गीतों में गाती हुई आगे बढ़ाती रही हैं।

आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

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