असहज सच से मुंह मोड़ने की ‘सेकुलर’ कीमत – बलबीर पुंज

सच से आंखें चुराकर समाज कभी मजबूत नहीं बनता। जब किसी संकट को जानबूझकर नकार दिया जाता है, तो वह और गहरी जड़ पकड़ लेता है। स्वतंत्र भारत में दशकों …

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बस्तर: अब जब सांस ले रहा है, तो रास्ता कैसा हो?

बस्तर को हमने बहुत लंबे समय तक एक ही नजर से देखा—संघर्ष, नक्सल, बंदूक और असुरक्षा की नजर से। इतनी लंबी अवधि तक यही तस्वीर हमारे सामने रखी गई कि …

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नारी के सामने संतुलन की चुनौती

भारतीय समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां परिवर्तन की गति अभूतपूर्व है। इस बदलाव का सबसे स्पष्ट प्रभाव महिलाओं के जीवन पर दिखाई देता है। आज की …

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भारत की ‘स्व’देशी जीवन-शैली में ‘स्व’ के आयाम – डॉ. मनमोहन वैद्य जी

भारत की स्वदेशी जीवन-शैली में निहित ‘स्व’ के भारत में निर्मित वस्तुओं का प्रधानतः उपयोग करने के साथ भी अनेक महत्वपूर्ण पहलू हैं। भारत की शिक्षा-पद्धति के मूल्यांकन के लिए 1964–1966 के …

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एक सशक्त सामाजिक रूपांतरण की दास्तान–कैलाश चन्द्र

देश का परिवेश—और उसके साथ दरवेश—इन दिनों अद्भुत रूपांतरण से गुजर रहा है। चारों ओर जो अनुभूति और अनुभाव दिखाई दे रहा है, वह किसी राजनीतिक घटना का परिणाम भर …

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माओवादी आतंक का खात्मा : अर्बन नक्सलियों पर अमित शाह का प्रहार  !

देश नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्त हो गया। माओवादी आतंक से मुक्ति एक बड़ी विजय के रूप में देखी जानी चाहिए। ये विजय दृढ़ संकल्प, दृढ़ इच्छाशक्ति और ध्येय निष्ठा …

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विवाहेतर संबंध: रोमांच के नाम पर अव्यवस्था का ‘प्रैक्टिकल कोर्स’— कैलाश चन्द्र जी

आधुनिक महानगरीय जीवन की एक विचित्र विडम्बना है—लोग भावनात्मक रूप से थके हुए भी हैं और उत्साह की तलाश में भी। इसी विरोधाभासी भूख के बीच एक पुरानी परंपरा है, …

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श्रीराम आज भी प्रासंगिक क्यों हैं? – बलबीर पुंज

सभी पाठकों को पावन रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं। हिंदू परंपरा में श्रीराम भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं, जिनका अवतरण त्रेतायुग में हुआ। महर्षि वाल्मीकि प्रणीत रामायण और गोस्वामी तुलसीदास …

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सृष्टि, ऋतु और काल के सनातन चक्र का उत्सव : भारतीय नववर्ष

भारतीय संस्कृति में नववर्ष का अर्थ केवल कैलेंडर की एक नई तारीख से नहीं है। यह मनुष्य, प्रकृति और ब्रह्मांड के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। भारतीय परंपरा में …

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