हमारी लोकपरंपरा में हलषष्ठी अर्थात कमरछठ या खमरछठ का व्रत माताओं द्वारा संतान के सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना से रखा जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व हर वर्ग और हर जाति में समान श्रद्धा तथा सद्भाव के साथ निभाया जाता है। ऊपर से देखने पर यह केवल व्रत, कथा और प्रसाद का उत्सव प्रतीत होता है, किंतु भीतर उतरने पर खेत, अन्न, जल, पशु, वनस्पति और सामाजिक समरसता से जुड़ा एक संपूर्ण संसार उजागर होता है।
इस व्रत की पौराणिक कथा देवकी और वसुदेव से जुड़ी है। कंस ने देवकी के छह पुत्रों को एक एक कर कारागार में मार डाला था। जब सातवें संतान के जन्म का समय निकट आया, तब देवर्षि नारद ने देवकी को हलषष्ठी देवी का व्रत रखने की सलाह दी। देवकी ने यह व्रत सबसे पहले किया, जिसके प्रभाव से आने वाली संतान की रक्षा हुई। भगवान कृष्ण के आदेश पर योगमाया ने देवकी के गर्भस्थ शिशु को खींचकर वसुदेव की बड़ी रानी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया, जो उस समय गोकुल में नंद यशोदा के यहां निवास कर रही थीं।
इसी संकर्षण से जन्मी संतान आगे चलकर बलराम कहलाई, और देवकी की आठवीं संतान के रूप में स्वयं भगवान कृष्ण प्रकट हुए। इस प्रकार हलषष्ठी देवी के व्रत पूजन से देवकी की दोनों संतानों की रक्षा हुई मानी जाती है। बलराम कृषि कर्म को महत्व देते थे और हल उनका प्रमुख अस्त्र था, जबकि कृष्ण गोपालन से जुड़े रहे, इसी कारण इस व्रत में हल से जोती भूमि का अन्न और गाय के दूध दही घी का उपयोग वर्जित माना गया है। हलषष्ठी और जन्माष्टमी परंपरागत रूप से एक दिन के अंतराल में मनाए जाते हैं।
व्रत के दिन माताएं सुबह महुआ पेड़ की डाली से दातून करती हैं, स्नान करती हैं, भैंस के दूध की चाय पीती हैं और व्रत धारण करती हैं। दोपहर बाद घर के आंगन, मंदिर देवालय अथवा गांव के चौपाल में छोटे-छोटे तालाबों का जोड़ा बनाया जाता है, जिसे सगरी कहा जाता है, और उसमें जल भरा जाता है। सगरी का जल जीवन का प्रतीक माना जाता है। इसके किनारे बेर, पलाश और गूलर की टहनियां तथा कांसी के फूल सजाए जाते हैं।
सामने रखी चौकी पर गौरी गणेश और कलश स्थापित कर भैंस के घी में सिंदूर मिलाकर बनाई गई हलषष्ठी देवी की मूर्ति की पूजा की जाती है, साड़ी सहित सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है और देवी की छह कहानियां कथा के रूप में सुनी जाती हैं। पूजन सामग्री में पसहर चावल, महुआ के पत्ते, धान की लाई तथा भैंस का दूध दही घी रखा जाता है, साथ ही भौंरा और बाटी जैसे बच्चों के खिलौने भी सजाए जाते हैं। ग्रामीण अंचलों में गेड़ी को भी सगरी में रखकर पूजा जाता है, क्योंकि इसका स्वरूप हल से मिलता जुलता है और यह बच्चों के उपयोग की वस्तु भी है। इस दिन उपवास रखने वाली माताएं हल चले हुए खेतों की ओर भी नहीं जातीं।
पूजन के पश्चात माताएं अपने संतान की पीठ पर कमर के समीप पोता, अर्थात हल्दी पानी में भिगोए नए कपड़े का टुकड़ा, स्पर्श कराकर उसे अपने आंचल से पोंछती हैं। यह क्रिया माता द्वारा दिया गया रक्षा कवच माना जाता है और इसी से इस व्रत का नाम कमरछठ पड़ा है। पूजन के बाद व्रती माताएं जब प्रसाद ग्रहण करती हैं, तो उनके भोजन में पसहर चावल का भात, मुनगा, कद्दू, सेमी, तोरई, करेला और मिर्च से बनी छह प्रकार की भाजी, भैंस का दूध दही और घी, सेंधा नमक तथा महुआ के पत्तों से बने दोना पत्तल और लकड़ी के चम्मच का उपयोग होता है।
बच्चों को प्रसाद स्वरूप धान की लाई, भुना हुआ महुआ तथा चना, गेहूं और अरहर सहित छह प्रकार के अन्न मिलाकर बांटे जाते हैं। इस व्रत पूजन में छह की संख्या का विशेष महत्व है, भाद्रपद कृष्ण पक्ष का छठवां दिन, छह प्रकार की भाजी, छह प्रकार के खिलौने, छह प्रकार के अन्न वाला प्रसाद और छह कहानियों की कथा, इन सबमें यह अंक बार बार दोहराया गया है। उल्लेखनीय है कि इस पर्व में काम आने वाली लगभग सभी वस्तुएं गांव में ही सहज उपलब्ध होती हैं।
पसहर चावल को लोकपरंपरा में बिना हल चली भूमि में स्वतः उगने वाला धान माना जाता है, जो तालाब और पोखर जैसे जलयुक्त स्थानों के आसपास पाया जाता है। इसका उपयोग उस दौर की स्मृति है, जब मनुष्य जंगली वनस्पतियों को पहचानकर धीरे धीरे खेती की ओर बढ़ा था, और आज भी जंगली धान के आनुवंशिक गुण नई किस्मों के विकास में सहायक माने जाते हैं। छह भाजियां भी क्षेत्र विशेष में उपलब्ध वनस्पति विविधता की जीवंत स्मृति हैं, जिनके नाम अलग अलग अंचलों में बदलते रहते हैं।
सगरी का जल मनुष्य की उस प्राचीन बसाहट का स्मरण कराता है, जो सदैव जलस्रोतों के आसपास ही विकसित हुई। मिट्टी के बैल, गेड़ी और भैंस के दूध दही घी का उपयोग खेत, पशु और मनुष्य के बीच रहे पुराने सहजीवन की ओर संकेत करता है। सगरी के पास एकत्रित होकर कथा सुनना, पूजा करना और सुख दुख बांटना समाज की उस समरसता को भी जीवंत रखता है, जिसमें जाति और वर्ग का भेद पीछे छूट जाता है।
कमरछठ व्रत धारण करने वाली मां अपनी संतान के मंगल की कामना करती है। किंतु उसी सहज प्रार्थना के पास देवकी, बलराम, कृष्ण की पौराणिक कथा, सगरी का जल, पसहर चावल, छह भाजियां, मिट्टी के बैल और गेड़ी जैसे खिलौने, तथा महुआ और कांसी जैसे प्रकृति चिह्न एक साथ विद्यमान रहते हैं। यह पर्व मनुष्य के प्राचीन अतीत, कृषि परंपरा और पारिस्थितिक ज्ञान को धार्मिक आस्था के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखने का एक जीवंत माध्यम है। यही कारण है कि कमरछठ केवल संतान की दीर्घायु का व्रत नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में मनुष्य और प्रकृति के अक्षुण्ण संबंध की सच्ची धरोहर है।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
