छत्तीसगढ़ में सावन केवल बादल बरसात का महीना नहीं है, सावन आते ही लगता है जैसे गाँव के सारे देवता जाग उठते हैं, त्योहारों की झड़ी लग जाती है। खेतों में धान के नन्हे पौधे हवा के साथ झूमने लगते हैं। तालाब लबालब होने लगते हैं। महुआ, आम, जामुन, करंज और बांस की हरियाली में गांव की पगडंडियां कहीं खो सी जाती हैं। मिट्टी में पानी की सोंधी गंध घुलती है और खेतों में काम करती युवतियों के कंठ से अचानक ददरिया फूट पड़ता है। इसी हरियाली भरे मौसम में आता है भोजली तिहार।
भोजली छत्तीसगढ़ के उन लोकपर्वों में है, जिन्हें समझने के लिए केवल पूजा की विधि जान लेना पर्याप्त नहीं है। भोजली में खेत है, बीज है, पानी है, अन्न है, स्त्री की सृजनशीलता है, लोकगीत है, सामूहिकता है और सबसे बढ़कर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली मितान परंपरा है। यह एक ऐसा पर्व है, जिसमें एक छोटी सी टुकनी में उगाई गई हरियाली धीरे धीरे पूरे गांव की आत्मीयता का प्रतीक बन जाती है।
सावन में भोजली बोई जाती है। अलग अलग अंचलों में इसे बोने की तिथि में कुछ अंतर मिलता है। कहीं पंचमी के बाद, कहीं नागपंचमी के आसपास और कहीं सावन शुक्ल पक्ष की दूसरी तिथियों में भोजली बोने की परंपरा मिलती है। छोटी सी बांस की टुकनी में मिट्टी और खाद भरकर उसमें धान, गेहूं, जौ, उड़द आदि के दाने डाले जाते हैं। फिर शुरू होती है उसकी सेवा। हर दिन पानी। हर दिन देखभाल। और हर दिन गीत।कुछ ही दिनों में मिट्टी के भीतर छिपे बीज बाहर आकर हरे अंकुरों में बदल जाते हैं। घर की बेटियों के लिए वह केवल पौधा नहीं रह जाता। वह भोजली दाई हो जाती है। उसे सजाया जाता है। उसकी सेवा की जाती है। उसके सामने गीत गाए जाते हैं। भोजली के पारंपरिक गीतों में प्रकृति और जल के प्रति लोकमन की गहरी आकांक्षा दिखाई देती है।
“देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा हो लहर तुरंगा।हमर सुघ्घर भोजली दाई के भीजे आठों अंगा।”
इन पंक्तियों में गंगा से केवल भोजली को भिगोने की प्रार्थना नहीं है। इसके भीतर वर्षा की कामना छिपी है। खेतों को पानी मिले, धान की फसल अच्छी हो, गांव में अकाल न पड़े, यही लोकमन की सहज इच्छा है। भोजली के गीतों में उसकी बढ़ती हरियाली को लेकर एक बालिका की उत्सुकता भी दिखाई देती है।
“मांड़ी भर जोंधरी, पोरिस कुसियारे।जल्दी जल्दी बाढ़ौ भोजली, हो वौ हुसियारे।”
जोंधरी यानी मक्का और कुसियारी अर्थात गन्ने की बढ़त का बिंब लेकर भोजली से जल्दी बढ़ने की मनुहार की जा रही है। यह केवल पौधे के बढ़ने की इच्छा नहीं है। इसके पीछे खेतों में फसल के लहलहाने की कामना है। यही तो लोकजीवन का सौंदर्य है। किसान की आर्थिक चिंता भी गीत बन जाती है। भोजली गीतों में सजावट का भी अपना संसार है।
“आई गईस पूरा, बोहाई गईस मालगी।हमरो भोजली दाई के सोन सोन के कलगी।”
भोजली को सोने की कलगी पहनाई जा रही है। साधारण सी हरियाली को लोकमन ने स्वर्णाभूषणों से सजा दिया। इसमें कल्पना की वह उड़ान है, जो गरीब से गरीब घर के आंगन में भी उत्सव की समृद्धि पैदा कर देती है। एक दूसरे गीत में कहा जाता है,
“लिपी डारेन पोती डारेन, छोड़ि डारेन कोनहा।सबों पहिरैं लाली चुनरी, भोजली पहिरै सोना।”
यहां भोजली घर की बेटी जैसी है। सबके लिए लाल चुनरी है और भोजली के लिए सोना। लोकगीत में पौधा मनुष्य बन जाता है और मनुष्य प्रकृति का हिस्सा। इसके साथ ही “कहां के खातू, कहां के टुकनी, कहां के जवा भोजली” जैसे गीत में खाद की मिट्टी, बांस की टोकनी और स्वस्थ अंकुर के लिए अलग अलग सामाजिक घरों और समुदायों के उल्लेख को भी लोकजीवन की साझी संरचना से जोड़ते है।
भोजली की यह साझेदारी केवल गीतों तक सीमित नहीं थी। इस पर्व में सामाजिक समरसता का एक अत्यंत सुंदर रूप दिखाई देता था। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक समाज में जातियों और समुदायों की अपनी सामाजिक सीमाएं होती हैं। लेकिन भोजली के अवसर पर मनुष्य दूसरे मनुष्य से एक नया आत्मीय रिश्ता बना सकता था। इसे भोजली बदना या भोजली मितान बनाना कहा जाता था। जिससे मन मिल जाए। जिससे अपनापन हो जाए। जिसके साथ सुख दुख बांटने की इच्छा हो। उसके कान में भोजली का हरा बीरवा खोंचकर मितान बनाया जाता है। यही भोजली की सबसे बड़ी सामाजिक विशेषताओं में से एक है।
मितान बनने के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं है। अलग सामाजिक पृष्ठभूमि और जातियों के लोगों के बीच भी मितान संबंध बनाए जाते है। भोजली इस तरह केवल समान लोगों को जोड़ने का माध्यम नहीं थी, बल्कि सामाजिक दूरी को आत्मीयता से कम करने वाली लोक परंपरा थी। भोजली बदना याने जीवन भर की मित्रता के सूत्र जोड़ना होता है।
यही बात भोजली को दूसरे कई लोकपर्वों से अलग करती है। समाज में जातियां है, पर मितान का रिश्ता जाति से बड़ा हो सकता है। परिवार अलग हैं, लेकिन मितानी के बाद परिवारों में अपनापन पैदा हो जाता था। दो व्यक्ति मितान बने तो उनके बीच एक नया संबोधन जन्म लेता था। कई स्थानों पर मितान बनने के बाद एक दूसरे को नाम से न पुकारकर “भोजली” कहकर संबोधित करने की परंपरा है। “सीताराम भोजली” कहकर अभिवादन करना इसी आत्मीय संबंध की पहचान रहा है।
सोचिए, समाज को जोड़ने का कितना सरल तरीका था। न कोई लिखित समझौता। न कोई औपचारिक घोषणा। बस कान में खोंचा गया एक छोटा सा हरा बीरवा और उसके साथ जीवन भर का आत्मीय संबंध। भोजली में स्त्रियों और बालिकाओं की भूमिका भी विशेष रही है। वे इसे बोती हैं, सींचती हैं, गीत गाती हैं और विसर्जन के लिए सिर पर रखकर ले जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में लोकज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है।
बच्चियां अपनी दाई और बड़ी बहनों से सीखती हैं कि मिट्टी कैसे तैयार करनी है, बीज कैसे डालना है, पानी कितना देना है, गीत कैसे गाना है और भोजली को किस तरह विदा करना है। इस तरह भोजली केवल उत्सव नहीं, लोक शिक्षा की भी एक परंपरा है। और इस लोक शिक्षा में प्रकृति सबसे बड़ी किताब है।भोजली का बीज हमें अन्न की कहानी सुनाता है। मिट्टी हमें धरती का महत्व बताती है। पानी जीवन का अर्थ समझाता है। हरियाली फसल की उम्मीद जगाती है। और भोजली मितान मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। भोजली के गीतों में लोकजीवन का पारिवारिक पक्ष भी दिखाई देता है। विदाई के समय गाए जाने वाले गीतों में अपने लिए कम और परिवार के लिए अधिक प्रार्थना मिलती है।
“दूध मांगें पूत मांगें, अउ मांगें असीस।ठाढ़े हे कौसिल्या रानी, देवत हे असीस।”
इसमें समृद्धि की लोककामना है। संतान, परिवार और सुखी जीवन की इच्छा है। लोकगीत का मन यहां व्यक्तिगत नहीं रहता। वह परिवार और समाज के लिए मंगल मांगता है। एक अन्य भावपूर्ण लोकपंक्ति में भाई और भतीजे के लिए मंगलकामना की जाती है।
“गंगा गोसाई, गरब झनि करिहा।
भइया अउ भतिजवा ला, अमर देके जइहा।”

