हैदराबाद के भारत में विलय से बहुत पहले वहां ऐसे लोग और संगठन सक्रिय थे जो धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार और नागरिक अधिकारों की बात कर रहे थे। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण नाम था आर्य समाज।
आज आर्य समाज का नाम लेते ही हमारे सामने सामान्यतः वेद प्रचार, मूर्तिपूजा विरोध, शिक्षा, सामाजिक सुधार और स्वामी दयानंद सरस्वती का विचार आता है। लेकिन हैदराबाद में आर्य समाज की कहानी केवल धार्मिक सुधार की कहानी नहीं थी। वहां परिस्थितियां ऐसी बनीं कि वेद और समाज सुधार की बात करते-करते आर्य समाज को अंततः नागरिक अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष तक पहुंचना पड़ा। यही हैदराबाद के आर्य समाज की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी।
हैदराबाद में आर्य समाज की गतिविधियां उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में शुरू हुईं। 1892 में यहां आर्य समाज की स्थापना का उल्लेख मिलता है। आगे चलकर सुल्तान बाजार उसका प्रमुख केंद्र बना।
शुरुआत में उद्देश्य वही था जो देश के दूसरे हिस्सों में आर्य समाज का रहा था, वैदिक विचारों का प्रचार, सामाजिक कुरीतियों का विरोध, शिक्षा का प्रसार और समाज में आत्मसम्मान की भावना पैदा करना। लेकिन हैदराबाद की राजनीतिक परिस्थितियां अलग थीं।
यहां निजाम की सत्ता थी और शासन व्यवस्था में धार्मिक पहचान का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था। राज्य की बहुसंख्यक आबादी हिन्दू थी, जबकि शासन के महत्वपूर्ण पदों और सत्ता संरचना में मुस्लिम अभिजात वर्ग का प्रभाव था। ऐसे वातावरण में जब कोई संगठन व्यक्ति को अपनी धार्मिक पहचान और सामाजिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम करता है, तो उसका प्रभाव केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहता। आर्य समाज के साथ भी यही हुआ।
हैदराबाद के आर्य समाज के इतिहास में पंडित केशवराव कोरटकर का नाम विशेष महत्व रखता है। 1905 के आसपास उनके नेतृत्व में आर्य समाज की गतिविधियों को नई ऊर्जा मिली। वे स्वयं विधि के क्षेत्र से जुड़े थे और हैदराबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद तक पहुंचे।
उनके नेतृत्व में आर्य समाज ने शिक्षा और सामाजिक सुधार के कार्यों को आगे बढ़ाया। लेकिन शिक्षा का अपना एक स्वभाव होता है, वह केवल अक्षरज्ञान नहीं देती, वह मनुष्य को यह भी पूछना सिखाती है कि वह जिस व्यवस्था में रह रहा है, वह कैसी है और उसके अधिकार क्या हैं। इसीलिए हैदराबाद में आर्य समाज की शाखाओं का विस्तार केवल धार्मिक संगठन का विस्तार नहीं था। यह समाज के भीतर आत्मविश्वास और संगठन की भावना के विस्तार का भी माध्यम बना।
1938 तक हैदराबाद राज्य में आर्य समाज की लगभग 250 शाखाओं का उल्लेख मिलता है। हैदराबाद और सिकंदराबाद में ही इसकी लगभग 20 शाखाएं थीं। इतने बड़े संगठनात्मक विस्तार को केवल धार्मिक गतिविधि मानना शायद उचित नहीं होगा।
इसी दौर में निजाम सरकार की ओर से आर्य समाज की धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध और नियंत्रण बढ़ने लगे। धार्मिक सभाओं, जुलूसों और कुछ धार्मिक प्रतीकों तथा प्रथाओं को लेकर सरकारी हस्तक्षेप की शिकायतें सामने आने लगीं।
हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान और उनकी निजी मिलिशिया रजाकारों ने 1938-39 के हैदराबाद सत्याग्रह और उसके बाद आर्य समाजियों तथा हिंदुओं पर भारी दमन और अत्याचार किए।
धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतिबंध: आर्य समाज के धार्मिक उत्सवों, हवन और सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगा दी गई। महर्षि दयानंद सरस्वती की प्रसिद्ध पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश रखने और उसके प्रचार पर प्रतिबंध लगाकर लोगों को गिरफ्तार किया जाने लगा।
संपत्ति और पूजा-स्थलों पर हमले: बीदर और अन्य जिलों में आर्य समाज के मंदिरों और हवन कुंडों को तोड़ा गया तथा उनकी जमीनों पर जबरन कब्जा किया गया। खटगांव जैसे क्षेत्रों में हिंदुओं के जनेऊ तोड़ दिए गए और धार्मिक आयोजनों में भाग लेने वालों पर हिंसक हमले किए गए।
गिरफ्तारी और यातना: आर्य समाज के प्रचारकों और सत्याग्रहियों को गिरफ्तार करके भयानक शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं। जेलों में गंदा और अशुद्ध भोजन दिया गया, जिसके कारण कई लोग गंभीर रूप से बीमार हो गए।
जबरन धर्मांतरण और लूट: निजाम की सेना, रजाकारों और वेतनभोगियों द्वारा गरीब और पिछड़े हिंदुओं पर इस्लाम थोपा गया तथा उनका जबरन धर्मांतरण कराया गया। रजाकारों ने गांवों में घूम-घूमकर आतंक मचाया, हिंदुओं की संपत्तियां लूटीं और जजिया जैसा कर वसूलने का प्रयास किया। विरोध करने पर निर्मम हत्याएं और महिलाओं पर बलात्कार व अत्याचार किए गए।
अब आर्य समाज के सामने एक सीधा प्रश्न था, यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म के अनुसार प्रार्थना नहीं कर सकता, सभा नहीं कर सकता या अपने धार्मिक विचारों का प्रचार नहीं कर सकता, तो क्या यह केवल धार्मिक समस्या है, या यह नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न भी है? यहीं से आंदोलन का स्वर बदलता दिखाई देता है। वेद प्रचार का संगठन अब अपने अनुयायियों के अधिकारों की रक्षा के लिए सत्ता से टकराने लगा।
1938 में यह संघर्ष निर्णायक रूप लेता है। आर्य समाज ने निजाम सरकार की नीतियों के विरोध में सत्याग्रह का निर्णय लिया। 24 अक्टूबर 1938 को सत्याग्रह आरंभ हुआ। देश के विभिन्न हिस्सों से आर्य समाज के कार्यकर्ता हैदराबाद राज्य की ओर आने लगे। यह कोई आसान काम नहीं था, हैदराबाद सरकार बाहरी लोगों के प्रवेश को नियंत्रित करना चाहती थी। फिर भी शोलापुर, विजयवाड़ा, बारसी, अहमदनगर, मनमाड, पुणे और अन्य स्थानों से सत्याग्रही राज्य में प्रवेश करते रहे। उनका उद्देश्य सत्ता हथियाना नहीं था; वे गिरफ्तारी देने आए थे।
सत्याग्रह किया गया, गिरफ्तारियां दी गईं और जेल जाना आंदोलन का हिस्सा बना। कई कार्यकर्ताओं को जेलों में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, और कुछ के जेल में ही मृत्यु होने का उल्लेख मिलता है।
आर्य समाज का एक बड़ा योगदान शिक्षा के क्षेत्र में था। हैदराबाद में शिक्षा संस्थाओं की स्थापना, पाठशालाओं का संचालन और वैचारिक प्रशिक्षण केवल समाज सुधार के सामान्य कार्यक्रम नहीं थे, ये ऐसे समय में हो रहे थे जब शिक्षा स्वयं सामाजिक शक्ति का माध्यम बन रही थी।
केशव मेमोरियल स्कूल जैसी संस्थाओं का विकास इसी वातावरण में हुआ। हिंदी शिक्षा और वैदिक विचारों के प्रचार के साथ सामाजिक जागरण का काम भी चलता रहा। 1945 में नलगोंडा में उपदेशक विद्यालय की स्थापना का उल्लेख मिलता है।
इस समय तक आर्य समाज का संघर्ष कई दशकों की सामाजिक चेतना से गुजर चुका था। जिस संगठन ने कभी वेद प्रचार और सामाजिक सुधार से शुरुआत की थी, वही अब यह कह रहा था कि हैदराबाद की जनता का भविष्य भारतीय संघ से अलग नहीं हो सकता।
1947 के बाद परिस्थितियां और कठिन हो गईं। कासिम रिजवी के नेतृत्व में रजाकारों की गतिविधियां बढ़ीं और हिंसा व भय का वातावरण बनने लगा। ऐसे समय में आर्य समाज की भूमिका केवल आंदोलन तक सीमित नहीं रही।
आर्य समाज से जुड़े कार्यकर्ताओं ने प्रभावित लोगों की सहायता की। हैदराबाद राज्य से निकलकर भारतीय सीमा की ओर आने वाले लोगों के लिए विभिन्न स्थानों पर राहत शिविरों की व्यवस्था की गई। शोलापुर, बारसी, पंढरपुर, बीजापुर, उमरखेड़, बुलढाणा और अमरावती जैसे क्षेत्रों में राहत कार्यों का उल्लेख मिलता है।
यह आंदोलन के दूसरे पक्ष को सामने लाता है। राजनीतिक संघर्ष में भाषण देना आसान हो सकता है, लेकिन जब कोई भयभीत परिवार सामने आकर खड़ा हो जाए और उसे भोजन, आश्रय और सुरक्षा की आवश्यकता हो, तब विचार व्यवहार में बदलता है। आर्य समाज के कार्यकर्ताओं ने उस समय इस भूमिका को भी निभाया।
आर्य समाज के कुछ कार्यकर्ता हैदराबाद के भीतर की परिस्थितियों की जानकारी बाहर पहुंचाने का काम भी करते थे। रजाकारों की गतिविधियों और अत्याचारों की सूचनाएं एकत्र कर बाहर भेजने के प्रयास हुए। यह काम जोखिम से खाली नहीं था, किसी भी दमनकारी व्यवस्था में सूचना स्वयं शक्ति बन जाती है। जो कुछ भीतर हो रहा है, यदि वह बाहर की दुनिया तक पहुंच जाए तो सत्ता के लिए उसे छिपाना कठिन हो जाता है। हैदराबाद में भी यही हुआ। आर्य समाज के संगठन और उसके देशव्यापी संपर्कों ने इस कार्य को संभव बनाया।
13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो शुरू किया। 17 सितंबर को निजाम ने युद्धविराम स्वीकार कर लिया और हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। यह घटना सामान्यतः सैन्य अभियान की सफलता के रूप में याद की जाती है। लेकिन यदि हम केवल चार दिनों की इस कहानी को देखें तो उससे पहले के कई दशकों का संघर्ष दिखाई ही नहीं देगा।
आर्य समाज का आंदोलन ऑपरेशन पोलो नहीं था। आर्य समाज ने हैदराबाद का विलय सैन्य शक्ति से नहीं कराया। लेकिन उसने एक ऐसी सामाजिक और राजनीतिक चेतना के निर्माण में भूमिका निभाई, जिसने निजाम की निरंकुश व्यवस्था के विरुद्ध लंबे समय तक संघर्ष किया और शायद इसी कारण आर्य समाज की भूमिका को केवल धार्मिक संगठन की भूमिका मानना इतिहास को छोटा कर देना होगा।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल कांग्रेस के अधिवेशनों, क्रांतिकारियों और जेल यात्राओं में नहीं लिखा गया। वह देश के छोटे-बड़े सामाजिक संगठनों की गतिविधियों में भी लिखा गया है। आर्य समाज उनमें से एक है।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
