श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब में गुरुओं की वाणी के आध्यात्मिक प्रवाह में कबीर, रविदास, नामदेव, धन्ना, पीपा, सैन, सदना, त्रिलोचन और शेख फरीद आदि संतों के स्वर सुनाई देते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, सामाजिक पृष्ठभूमियों और आध्यात्मिक परंपराओं से आए इन संतों की वाणी एक ही ग्रंथ की रागात्मक संरचना में स्थान पाती है। श्रीगुरु ग्रन्थसाहिब में पंद्रह भगतों की वाणी संकलित है। इनमें जयदेव, नामदेव, त्रिलोचन, परमानंद, सदना, रामानंद, बेनी, धन्ना, पीपा, सैन, कबीर, रविदास, फरीद, सूरदास और भीखन शामिल हैं। इसके साथ पहले पाँच गुरुओं और नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर की वाणी तथा भट्टों की रचनाएं भी सम्मिलित हैं।
श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब प्रकाश दिवस का संदर्भ इसी ऐतिहासिक यात्रा से जुड़ता है। गुरु अर्जन देव ने विभिन्न गुरुओं और संतों की प्रमाणित वाणी को संकलित कर आदि ग्रंथ का स्वरूप दिया। 1604 में आदि ग्रंथ का पहला प्रकाश श्री हरिमंदिर साहिब में हुआ। बाद में गुरु तेग बहादुर की वाणी इसमें सम्मिलित हुई और गुरु गोबिन्द सिंह ने 1708 में श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब को गुरु पद प्रदान किया। इस प्रकार प्रकाश दिवस केवल ग्रंथ के प्रथम प्रकाश की स्मृति नहीं, बल्कि उस गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा का अवसर है जिसने वाणी को जीवन और आचरण का मार्गदर्शक बनाया।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि संतों की वाणी को किसी अलग परिशिष्ट के रूप में नहीं रखा गया। वह उसी रागात्मक संरचना का हिस्सा है जिसमें गुरुओं की वाणी है। राग दर राग आगे बढ़ते हुए रागी को अलग अलग संतों के स्वर मिलते हैं। कबीर की वाणी इस चेतना को अत्यंत स्पष्टता से सामने रखती है।
“अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे।एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे।”
कबीर का प्रश्न सीधा है। जब समस्त संसार एक ही नूर से उत्पन्न हुआ है, तब मनुष्य को ऊंचा और नीचा मानने का आधार क्या है? यहां समानता किसी बाहरी घोषणा से नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल एकता से निकलती है। कबीर की दृष्टि में मनुष्य की पहचान उसके भीतर के अनुभव और आचरण से होती है, केवल उसके सामाजिक परिचय से नहीं।
संत रविदास की वाणी इस चेतना को एक सामाजिक संसार की कल्पना तक ले जाती है। उनकी प्रसिद्ध रचना बेगमपुरा में लिखा है-
“बेगम पुरा सहर को नाउ।दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ।”
बेगमपुरा ऐसा नगर है जहां दुख और चिंता का स्थान नहीं। आगे की पंक्तियों में रविदास भय और सामाजिक असुरक्षा से मुक्त जीवन की कल्पना करते हैं। इसे आधुनिक राजनीतिक अवधारणाओं में सीधे रख देने के बजाय इसे मनुष्य के सम्मान, निर्भयता और स्वतंत्र जीवन की आध्यात्मिक आकांक्षा के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
आगे रविदास कहते हैं –
“नागर जनां मेरी जाति बिखिआत चंमारं।रिदै राम गोबिंद गुन सारं।”
यहां सामाजिक परिचय मौजूद है, लेकिन उसके साथ आत्मिक गरिमा की स्थापना भी है। व्यक्ति की जातिगत पहचान उसके आध्यात्मिक अनुभव की सीमा तय नहीं करती। यही बात रविदास की वाणी को सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।
“नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।”
नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सदना और सैन जैसे अलग सामाजिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि वाले संतों का एक साथ उल्लेख बताता है कि भक्ति की यात्रा किसी एक समुदाय की सीमा में नहीं बंधती।
नामदेव की वाणी इस सांस्कृतिक यात्रा को महाराष्ट्र से पंजाब तक ले आती है। श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब में उनके 60 पद संकलित हैं। उनकी भक्ति में ईश्वर की सर्वव्यापकता और सामान्य जीवन के अनुभवों में परम तत्व की खोज दिखाई देती है। महाराष्ट्र की संत परंपरा से निकली यह वाणी पंजाब में संकलित हुए ग्रंथ में स्थान पाती है। भारत की सांस्कृतिक यात्रा को समझने के लिए यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है।
धन्ना की वाणी में सहज विश्वास और लोकजीवन से जुड़ी भक्ति का स्वर मिलता है। श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब में उनके चार पद माने जाते हैं। संत पीपा और सैन की उपस्थिति भी उल्लेखनीय है। पीपा का एक पद राग धनासरी में मिलता है और सैन की भी एक रचना इसी राग में है।सदना को परंपरा में कसाई समुदाय से जुड़ा माना जाता है। पीपा राजपरंपरा से जुड़े माने जाते हैं और कबीर जुलाहा समुदाय की पृष्ठभूमि से आते हैं। शेख फरीद की उपस्थिति इस सांस्कृतिक विस्तार को सूफी परंपरा तक ले जाती है। श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब में उनकी वाणी का महत्वपूर्ण स्थान है।
सामाजिक समरसता की यह दृष्टि केवल संतों की वाणी तक सीमित नहीं रहती। गुरु परंपरा में इसका व्यवहारिक रूप संगत और पंगत की परंपरा में दिखाई देता है। साथ बैठना, साथ भोजन करना और सेवा में सहभागी होना समानता को व्यवहार में उतारने का माध्यम बनता है। श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब की वाणी में गुरु अर्जन की यह पंक्ति भी इसी व्यापक भावभूमि को सामने रखती है,
“एकु पिता एकस के हम बारिक।” एक ही परम पिता है और हम सब उसकी संतान हैं। यह विचार मनुष्य की समानता को किसी बाहरी पहचान के बजाय आध्यात्मिक संबंध से जोड़ता है।
श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब की रचना पद्धति भी अपने भीतर एक सांस्कृतिक संकेत रखती है। 31 रागों में व्यवस्थित वाणी में गुरु और भगत दोनों की रचनाएं आती हैं। संगीत यहां केवल गायन का माध्यम नहीं है, बल्कि विविध रचनाकारों की वाणी को एक साझा संरचना में जोड़ने वाला माध्यम भी है। पंजाब, उत्तर भारत, राजस्थान, महाराष्ट्र और सूफी परंपरा से जुड़े स्वर एक ही ग्रंथ में सुनाई देते हैं।
श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब प्रकाश दिवस पर इस पक्ष को याद करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि प्रकाश का अर्थ केवल ग्रंथ का प्रथम प्रकाश नहीं, बल्कि उस ज्ञान और दृष्टि का प्रकाश भी है जो मनुष्य को अपने भीतर झांकने और दूसरे मनुष्य में भी उसी चेतना को पहचानने की प्रेरणा देता है।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
