आत्मबोध से विश्वबोध तक : विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद का कालजयी भाषण आज भी भारत के लोगों की स्मृति में है। यह 11 सितंबर 1893 को शिकागो में हुआ था। विश्व धर्म संसद के विशाल मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा एक युवा संन्यासी जब खड़ा हुआ और उसने सामने बैठे लोगों को “अमेरिका की बहनों और भाइयों” कहकर संबोधित किया तो सब भौंचक रह गये। उनके भाषण में आत्मीयता थी, अपनापन था।
यह उस भारत की आवाज थी, जो सदियों पुरानी अपनी सांस्कृतिक चेतना के साथ पहली बार आधुनिक विश्व के एक बड़े मंच पर स्वयं को पहचान के साथ प्रस्तुत कर रहा था। शब्द साधारण थे, लेकिन उनके पीछे खड़ी दृष्टि साधारण नहीं थी। एक अपरिचित सभागार में खड़ा वह संन्यासी सामने बैठे लोगों को पहले मनुष्य के रूप में देख रहा था। इसीलिए उन शब्दों ने इतनी दूर तक असर किया। वो संन्यासी स्वामी विवेकानंद थे।
जो व्यक्ति स्वयं को नहीं पहचानता, वह दूसरे को कैसे समझ पाएगा? अपनी पहचान को लेकर असुरक्षित मन या तो दूसरों की नकल करता है या हर दूसरी चीज से डरने लगता है। दोनों स्थितियों में संवाद की संभावना कम हो जाती है।
विवेकानंद का भारत अपनी जड़ों से शक्ति लेने वाला भारत था। लेकिन जड़ों से जुड़े रहने का अर्थ अतीत में खड़े रहना नहीं था। वे आधुनिक दुनिया से संवाद करना चाहते थे। उनके लिए परंपरा और आधुनिकता विरोधी नहीं थे। परंपरा से शक्ति लेकर आधुनिकता की ओर बढ़ा जा सकता है।
आज इस बात को फिर समझने की जरूरत है। दुनिया पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई है। एक संदेश कुछ क्षणों में महाद्वीप पार कर जाता है। हमारी हथेली पर पूरी दुनिया दिखाई देती है। लेकिन क्या मनुष्य भी उतना ही करीब आया है? कई बार लगता है कि साधन बढ़े हैं, संवाद घटा है।
हम दूसरे की बात सुनने से पहले तय कर लेते हैं कि वह सही है या गलत। अपने जैसे विचारों के बीच रहना सहज लगता है और अलग विचार से मिलना असुविधाजनक। धर्म, संस्कृति, भाषा और पहचान, जो मनुष्य को अपने होने का आधार दे सकते हैं, कभी-कभी वही उसके चारों ओर दीवार खड़ी करने लगते हैं।
विवेकानंद की दृष्टि इस दीवार को तोड़ने का रास्ता दिखाती है। उन्होंने सहिष्णुता की बात की, लेकिन केवल सहने भर की नहीं। उनकी दृष्टि में विविध आस्थाओं के प्रति सम्मान था और यह विश्वास भी कि सत्य को किसी एक रास्ते में पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता।
विवेकानंद के चिंतन में आत्मबोध का अर्थ केवल आध्यात्मिक साधना नहीं है। अपने भीतर की शक्ति को पहचानना, अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना और जीवन के उद्देश्य को समझना भी आत्मबोध है।
आज मनुष्य बाहर की दुनिया को जीतने में बहुत आगे निकल गया है। तकनीक उसके हाथ में है, सूचना उसके साथ है, सुविधाएं उसके आसपास हैं। लेकिन अपने मन को साधना अब भी कठिन है। हमने इच्छाओं को पूरा करने के साधन बढ़ा लिए, इच्छाओं की सीमा तय करना नहीं सीखा।
सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन संतोष जरूरी नहीं बढ़ा। साधन बढ़े, लेकिन शांति अपने आप नहीं आई। ऐसे समय में विवेकानंद का वेदांत हमें भीतर की ओर देखने के लिए कहता है। मनुष्य को केवल शरीर, धन, पद और उपलब्धियों से मापना अधूरा है। उसके भीतर भी कुछ ऐसा है, जिसे बाजार की भाषा में नहीं समझा जा सकता।
यही विचार, सेवा तक पहुंचता है। यदि मनुष्य में दिव्यता है, तो दूसरे मनुष्य के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए? किसी भूखे, कमजोर या वंचित व्यक्ति की सहायता केवल दया का विषय क्यों हो? उसके भीतर भी उसी चेतना को देखने की दृष्टि विकसित हो तो सेवा उपकार नहीं रह जाती, वह अपने ही व्यापक अस्तित्व के प्रति जिम्मेदारी बन जाती है।
आज शिक्षा के सामने यही प्रश्न है। हम बच्चों को बहुत कुछ सिखा रहे हैं, लेकिन क्या उन्हें यह भी सिखा रहे हैं कि उस ज्ञान का उपयोग किसके लिए करना है? ज्ञान यदि केवल प्रतियोगिता में आगे निकलने का साधन बन जाए तो वह समाज को कुशल बना सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि संवेदनशील भी बनाए।
विवेकानंद का राष्ट्रबोध भी इसी मनुष्य से शुरू होता है। उनके लिए राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा नहीं था। राष्ट्र का निर्माण मनुष्यों से होता है और मनुष्य का निर्माण चरित्र से। इसलिए राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या तकनीक में नहीं, उसके नागरिकों के आत्मविश्वास और सेवा-भाव में भी होती है।
शिकागो की वह आवाज आज भी इसलिए सुनाई देती है क्योंकि उसमें केवल भारत की प्रतिष्ठा की चिंता नहीं थी। उसमें मनुष्य की प्रतिष्ठा की चिंता थी और हमने दुनिया को कितना बदल लिया, यह महत्वपूर्ण है। लेकिन इस बदलाव के बीच हमने अपने भीतर के मनुष्य को कितना बचाया, यह उससे भी बड़ा प्रश्न है। विवेकानंद का शिकागो हमें इसी प्रश्न के सामने खड़ा करता है।


आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता

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