
विश्वकर्मा समाज से आशय उन परंपरागत शिल्पकार परिवारों से है, जो स्वयं को विश्वकर्मा के पाँच पुत्रों, मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ की संतान मानते हैं। परंपरा में मनु को लोहार, मय को बढ़ई अथवा सुतार, त्वष्टा को कांस्यकार या ठठेरा, शिल्पी को राजमिस्त्री या पत्थर के शिल्पकार, और देवज्ञ को सुनार के काम से जोड़ा जाता है। इन्हीं पाँच धाराओं से मिलकर बना यह समूह सम्मिलित रूप से विश्वकर्मा समाज कहलाता है।
मध्यकालीन भारत में यह समुदाय मुख्यतः मंदिर निर्माण, मूर्तिकला और धातुकर्म से जुड़ा रहा, इस समुदाय की सामाजिक आर्थिक स्थिति उनने उत्तम थी जो स्थायी रूप से कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़े थे। हर वर्ष भाद्रपद माह के अंत में, प्रति वर्ष 17 सितंबर को, विश्वकर्मा पूजा के दिन यही समाज अपने औजारों और मशीनों की पूजा कर अपने पुरखों के कौशल को नमन करता है। देश के औद्यौगिक क्षेत्र में धूमधाम से विश्वकर्मा पूजा का उत्सव श्रद्धा के साथ कारीगरों द्वारा मनाया जाता है।
मनुर्मयस्तथा त्वष्टा शिल्पी देवज्ञ एव च ।
विश्वकर्मासुता ह्येते पंच सृष्टिप्रवर्तकाः ॥
अर्थात मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ, ये पाँचों विश्वकर्मा के पुत्र और सृष्टि के निर्माण कार्य के प्रवर्तक हैं।
विडंबना यह है कि जिस समाज के पुरखों ने मंदिर के गर्भगृह और राजप्रासाद गढ़े, वही समाज सामाजिक पदानुक्रम में अक्सर पीछे धकेल दिया गया। अधिकांश राज्यों में लोहार, सुनार, बढ़ई और कांस्यकार जैसी उपजातियाँ आज अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की सूची में सम्मिलित हैं, जबकि इनकी पौराणिक पहचान ॠषि अंगिरा की संतान के रूप में होती है। ओबीसी के भीतर उप वर्गीकरण के प्रश्न पर गठित रोहिणी आयोग ने अगस्त 2023 में अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी, जिसमें यह पाया गया कि आरक्षण का बड़ा हिस्सा कुछ ही प्रभावशाली उपजातियों तक सिमटा रहता है, जबकि शिल्पकार जैसी बिखरी हुई छोटी उपजातियाँ इसका पूरा लाभ नहीं उठा पातीं। वर्तमान जातिगत जनगणना की बहस में भी विश्वकर्मा समाज के संगठन अपनी सही गणना और अलग पहचान की माँग उठाते रहे हैं, ताकि नीति निर्माण में उनकी वास्तविक संख्या और आर्थिक स्थिति सामने आ सके।
भाषा और साहित्य में भी यह द्वंद्व झलकता है, एक ओर विश्वकर्मा को शास्त्रों में देवताओं का आचार्य और स्थापत्य विद्या का जनक कहा गया, दूसरी ओर व्यवहारिक जीवन में उनकी संतान मानी जाने वाली जातियाँ प्रायः सेवा जातियों की श्रेणी में गिनी गईं। यही विरोधाभास आज भी सामाजिक संगठनों की माँगों में झलकता है, जहाँ एक ओर शिल्प की गरिमा को पुनर्स्थापित करने की बात होती है, दूसरी ओर शिक्षा, नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उचित हिस्सेदारी की माँग उठती है।
बीसवीं सदी के औद्योगीकरण ने जिस गति से मशीन निर्मित माल का उत्पादन बढ़ाया, उसी गति से हाथ के हुनर पर निर्भर परिवारों की जमीन खिसकती गई। जो लोहार कभी गाँव का हल, हँसिया, औजार, हथियार गढ़ता था, वह आज ढलाई कारखाने में बने सस्ते औजारों के सामने टिक नहीं पाता। जो बढ़ई हाथ से चौखट और फर्नीचर तराशता था, उसे अब कारखाने में बनी रेडीमेड लकड़ी और प्लाईवुड की वस्तुओं से होड़ करनी पड़ती है। सुनार का पुश्तैनी काम मशीन से ढली और लेज़र से नक्काशी की हुई गहनों की श्रृंखला के आगे सिमट गया है।
हस्तशिल्प क्षेत्र में भारत का वैश्विक बाजार हिस्सा आज दो प्रतिशत से भी कम है, जबकि चीन लगभग तीस प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ इस क्षेत्र पर हावी है, यह अंतर इस बात का प्रमाण है कि पूँजी, मशीन और बड़े पैमाने के उत्पादन ने परंपरागत कारीगरी को किस हद तक पीछे धकेला है। बहुत से परिवारों की युवा पीढ़ी अब पुश्तैनी औज़ार छोड़कर शहरों में दिहाड़ी मजदूरी या असंगठित सेवा क्षेत्र में जाने को विवश है, क्योंकि पीढ़ियों से चला आ रहा कौशल अब पेट भरने लायक आय नहीं दे पाता।
निर्यात के आँकड़े भले चमकीले दिखें, पर उस चमक के पीछे असली कारीगर की मजदूरी अक्सर न्यूनतम मजदूरी से भी कम रह जाती है, क्योंकि उत्पाद और बाजार के बीच कई परतों के बिचौलिये खड़े हैं। कोविड महामारी के बाद इस क्षेत्र पर दोहरी मार पड़ी, कच्चे माल की कीमतें बढ़ीं और साथ ही ऑनलाइन बाजार में सस्ते आयातित सजावटी सामान की बाढ़ ने स्थानीय कारीगर के उत्पाद की माँग और घटा दी।
इसी संकट को पहचानते हुए केंद्र सरकार ने सितंबर 2023 में प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना आरंभ की, जिसमें अठारह पारंपरिक व्यवसायों, लुहार, सुनार, कुम्हार, मूर्तिकार, बढ़ई, मोची, राजमिस्त्री, नाव बनाने वाले और अन्य कारीगरों को मान्यता दी गई। इस योजना के अंतर्गत पात्र कारीगरों को पंद्रह हजार रुपये तक की टूलकिट प्रोत्साहन राशि, कौशल प्रशिक्षण और बिना जमानत के तीन लाख रुपये तक ऋण देने का प्रावधान है।
कई राज्य सरकारों ने भी अपनी अलग योजनाएँ बनाई हैं, जैसे उत्तर प्रदेश की विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना, जिसके अंतर्गत हर वर्ष लगभग पंद्रह हजार कारीगरों को टूलकिट और ऋण सहायता से जोड़ा जाता है। परंतु धरातल की तस्वीर उतनी उजली नहीं है, पश्चिमी ओडिशा के दस जिलों से आई रिपोर्ट बताती है कि वहाँ पात्र कारीगरों में से मुश्किल से सत्रह प्रतिशत का ही पंजीकरण हो पाया है, जिसका कारण प्रशासनिक सुस्ती और तकनीकी अड़चनें बताई जाती हैं। यह अंतर दिखाता है कि योजना का उद्देश्य जितना सराहनीय है, उसका क्रियान्वयन गाँव और कस्बे के अंतिम कारीगर तक पहुँचाना उतना ही बड़ी चुनौती बना हुआ है।
योजना की एक और सीमा यह भी सामने आई है कि टूलकिट और ऋण भले मिल जाएँ, पर उत्पाद बेचने के लिए बाजार जोड़ना अलग समस्या है। बहुत से कारीगर आज भी बिचौलियों पर निर्भर हैं, जो उनके उत्पाद को औने पौने दाम पर खरीदकर शहरी बाजार में कई गुना अधिक कीमत पर बेचते हैं। इस बिचौलिया व्यवस्था के कारण मेहनत करने वाले हाथों तक उचित लाभ बहुत कम पहुँच पाता है, और यही कारण है कि अकेले टूलकिट या ऋण से समस्या पूरी तरह हल नहीं होती, जब तक कि उत्पाद को सीधे उपभोक्ता तक पहुँचाने वाला ढाँचा भी साथ में खड़ा न किया जाए।
परंपरागत शिल्प को बचाने का रास्ता मशीन का विरोध नहीं, बल्कि मशीन और हाथ के हुनर का सह अस्तित्व है। भौगोलिक संकेतक अर्थात जीआई टैग जैसी व्यवस्थाएँ मुरादाबाद के पीतल उद्योग, बिदर के बिदरी काम और मिथिला की धातुकारी जैसे उत्पादों को पहचान दिला रही हैं, जिससे कारीगर अपने उत्पाद का सही मूल्य पा सकें। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा हाट जैसी प्रदर्शनियाँ कारीगरों को सीधे ग्राहक से जोड़ने का मंच दे रही हैं, वहीं डिजिटल बाजार मंचों पर पंजीकरण से गाँव के शिल्पकार का उत्पाद अब शहर और विदेश तक पहुँच सकता है।
जरूरत इस बात की है कि युवा कारीगरों को केवल पुराना हुनर दोहराने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि डिज़ाइन प्रशिक्षण, गुणवत्ता मानक और डिजिटल मार्केटिंग का कौशल भी दिया जाए, ताकि पुश्तैनी कारीगरी नए बाजार की भाषा में बात कर सके। वित्त वर्ष 2023 24 में भारत ने लगभग बत्तीस हजार सात सौ अट्ठावन करोड़ रुपये का हस्तशिल्प निर्यात किया, जो दिखाता है कि माँग है, बस उस माँग तक पहुँचने का मार्ग कारीगर के लिए आसान बनाना बाकी है।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 18.48) अर्थात हे कौन्तेय, सहज प्राप्त कर्म को दोषयुक्त जानकर भी नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि जिस प्रकार अग्नि धुएँ से ढकी रहती है, उसी प्रकार हर कार्य में कोई न कोई कमी बनी रहती है।
यह श्लोक विश्वकर्मा समाज के उस कारीगर की मनोदशा को भी दर्शाता है जो कठिन समय में भी अपना पुश्तैनी कर्म पूरी तरह छोड़ नहीं पाता, भले ही आज उसमें पहले जैसी आय और सम्मान न बचा हो। यही निष्ठा वह पूँजी है जिस पर नीति और बाजार दोनों को मिलकर काम करना है।
विश्वकर्मा पूजा के दिन औजारों, मशीनों पर होम धूप, पत्र पुष्प चढ़ाना सरल है, परंतु उस औजार को चलाने वाले हाथ को वर्षभर सम्मान और आय दोनों मिलें, यह असली परीक्षा है। परंपरागत शिल्पकार परिवार आज दोहरी चुनौती से जूझ रहे हैं, एक ओर मशीनीकरण उनके परंपरागत बाजार को सिकोड़ रहा है, दूसरी ओर सामाजिक पहचान और आर्थिक सहायता की योजनाएँ अभी भी अंतिम कारीगर तक पूरी तरह नहीं पहुँच पा रही हैं।
जिस समाज ने सदियों तक मंदिर के शिखर और राजा के महल गढ़े, मनुष्य की आवश्यकता के अन्य उपस्कर बनाएं, उसे आज अपने ही घर में औज़ार थामे रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यदि नीति, बाजार और नई पीढ़ी का कौशल एक साथ मिल जाएँ, तो यह वही समाज है जो कल फिर सृजन के केंद्र में लौट सकता है, ठीक वैसे ही जैसे वैदिक सूक्त में विश्वकर्मा को सृष्टि का रचयिता कहा गया था।
- आचार्य ललित मुनि
