दीनदयाल उपाध्याय का नाम स्मरण में आते ही एकात्म मानवदर्शन सामने आ जाता है, लेकिन इस विचार तक पहुंचने से पहले उनकी कलम कई अलग-अलग विषयों से होकर गुजर चुकी थी। इतिहास के पात्रों से लेकर भारतीय संस्कृति, राष्ट्र, अर्थव्यवस्था और स्वतंत्र भारत की दिशा तक उनके लेखन का दायरा धीरे-धीरे फैलता गया।
1946 में उनकी पुस्तक सम्राट चन्द्रगुप्त प्रकाशित हुई और अगले वर्ष जगद्गुरु शंकराचार्य सामने आई। उपलब्ध जीवनी-सामग्री इन्हें उनकी दो प्रमुख आरंभिक साहित्यिक कृतियां बताती है। बाद का लेखन मुख्यतः आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक प्रश्नों की ओर मुड़ता है।
दोनों आरंभिक पुस्तकों के विषय अलग हैं। एक में चन्द्रगुप्त और चाणक्य के समय का भारत है, दूसरी में शंकराचार्य का जीवन और भारतीय दार्शनिक परंपरा। इसलिए इनके बीच कोई सीधी वैचारिक कड़ी खींचना उचित नहीं होगा। फिर भी इतना जरूर कहा जा सकता है कि दीनदयाल जी के आरंभिक लेखन में भारत को उसके अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों में देखने की रुचि दिखाई देती है। इसके बाद उनके लेखन का विषय वर्तमान भारत बनता है।
1952 में अखंड भारत क्यों? प्रकाशित हुई। 1958 में भारतीय अर्थनीति : विकास की एक दिशा और The Two Plans: Promises, Performance, Prospects सामने आईं। 1960 में राष्ट्र जीवन की समस्याएं प्रकाशित हुई। कृतियों का यह क्रम बताता है कि अब उनके सामने केवल अतीत का भारत नहीं था। स्वतंत्रता के बाद बनने वाले भारत के सामने खड़े प्रश्न भी उनके लेखन का हिस्सा बन चुके थे।
The Two Plans को देखें तो चर्चा सीधे पंचवर्षीय योजनाओं और आर्थिक नियोजन तक पहुंच जाती है। पुस्तक में पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना की दिशा, प्राथमिकताओं और उनके पीछे की आर्थिक सोच की समीक्षा की गई थी। पुस्तक का प्रकाशन 1958 में हुआ था। यहीं से दीनदयाल जी के लेखन में एक प्रश्न अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। भारत विकास तो करे, लेकिन विकास की दिशा तय करने की कसौटी क्या हो?
1965 में यही सवाल एक व्यापक दार्शनिक ढांचे में सामने आया। एकात्म मानववाद जनवरी 1965 में विजयवाड़ा में भारतीय जनसंघ द्वारा स्वीकार किए गए ‘सिद्धांत एवं नीति’ के दस्तावेज का हिस्सा बना। इसके बाद दीनदयाल जी ने मुंबई में 22 से 25 अप्रैल 1965 तक चार व्याख्यान देकर इस विचार को विस्तार से समझाया।
पहले व्याख्यान का सवाल सीधा था। अंग्रेज चले गए, लेकिन स्वतंत्र भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा? दीनदयाल के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं था। स्वतंत्र भारत को अपने जीवन की दिशा भी तय करनी थी। उनके अनुसार दूसरे देशों से तैयार विचारधाराएं लेकर उन्हें ज्यों का त्यों भारत पर लागू करना उचित नहीं था।
दूसरे व्याख्यान में चर्चा व्यक्ति तक आती है। मनुष्य को केवल शरीर मानकर उसकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया जा सकता। शरीर के साथ मन, बुद्धि और आत्मा की आवश्यकताओं को भी देखना होगा। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की भारतीय अवधारणा को वे इसी समग्र जीवन-दृष्टि से जोड़ते हैं।
तीसरे व्याख्यान में व्यक्ति के बाद समाज सामने आता है। व्यक्ति और समाज को एक-दूसरे से अलग करके देखने के बजाय उनके संबंध पर विचार किया जाता है। दीनदयाल के लिए समाज व्यक्तियों का केवल जोड़ नहीं था। वह एक ऐसी जीवंत व्यवस्था थी जिसका अपना स्वरूप और अपना जीवन था।
चौथे व्याख्यान में यही दृष्टि अर्थव्यवस्था तक पहुंचती है। यहां उत्पादन, मशीन, पूंजी, श्रम, बाजार और संसाधनों पर चर्चा है। दीनदयाल आर्थिक व्यवस्था को केवल अधिक उत्पादन की मशीन मानकर नहीं देखते। भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल तकनीक, रोजगार और उपलब्ध संसाधनों का प्रश्न उनके आर्थिक चिंतन में साथ-साथ आता है।
सम्राट चन्द्रगुप्त में दीनदयाल जी इतिहास के एक दौर की ओर देखते हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य में भारतीय दार्शनिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व सामने आता है। अखंड भारत क्यों? में राष्ट्र और विभाजन का प्रश्न आता है। भारतीय अर्थनीति और The Two Plans में स्वतंत्र भारत की आर्थिक दिशा पर विचार होता है। फिर 1965 में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और अर्थव्यवस्था को एक साथ देखने का प्रयास एकात्म मानववाद के रूप में सामने आता है।
इन कृतियों के बीच कोई ऐसी रेखा नहीं है जिसे खींचकर कहा जा सके कि यहां से विचार का पहला चरण शुरू हुआ और वहां पहुंचकर अंतिम रूप मिल गया। विचारों का संसार इतना सीधा नहीं होता। लेकिन प्रश्नों का विस्तार जरूर दिखाई देता है।
दीनदयाल जी के लिए भारत को समझने का सवाल इतिहास से शुरू होकर वर्तमान तक आता है। संस्कृति से अर्थव्यवस्था तक जाता है और अंततः मनुष्य तक पहुंचता है। यही कारण है कि एकात्म मानववाद को उनके पूरे लेखन से अलग करके पढ़ना मुश्किल है।
आज दीनदयाल जी की चर्चा प्रायः उनके राजनीतिक दर्शन के संदर्भ में होती है। उनके आरंभिक साहित्यिक लेखन और बाद की आर्थिक रचनाओं को साथ रखकर देखने पर तस्वीर थोड़ी बड़ी हो जाती है। वहां एक ऐसा लेखक दिखाई देता है जो पहले भारत के अतीत के पात्रों को लिखता है, फिर स्वतंत्र भारत की समस्याओं पर कलम चलाता है और अंततः इन प्रश्नों को मनुष्य और समाज की व्यापक दृष्टि से जोड़ने की कोशिश करता है। सादर नमन।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
