भारत में मार्क्सवादी विचारधारा के लगभग 100 वर्ष: घोषित आदर्श, वास्तविक योगदान और परिणाम— कैलाश चन्द्र जी

पिछले लगभग 100 वर्षों में मार्क्सवादी विचारधारा और उससे जुड़े संगठनों ने भारत को क्या दिया?
हिंसक संघर्षों, राजनीतिक आंदोलनों और चुनावी प्रभाव से आगे बढ़कर उन्होंने चिकित्सा, शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, स्वावलम्बन, सामाजिक सेवा और राष्ट्रीय एकता के क्षेत्र में क्या स्थायी योगदान किया?

घोषित उद्देश्य और वास्तविक योगदान :

मार्क्सवादी विचारधारा का घोषित उद्देश्य वर्गीय शोषण समाप्त करना, आर्थिक असमानता कम करना, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना और उत्पादन के साधनों पर समाज का नियंत्रण स्थापित करना रहा है।लेकिन किसी विचारधारा का मूल्यांकन केवल उसके आदर्शों और नारों से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक कार्यों और परिणामों से होना चाहिए। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि उसके राजनीतिक संगठनों, आंदोलनों और शासन ने समाज को क्या दिया और किन क्षेत्रों में नुकसान पहुँचाया।

हिंसा और लोकतंत्र का प्रश्न :

भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की सबसे गंभीर आलोचना उसके उन धड़ों पर लागू होती है, जो सशस्त्र हिंसा, राज्य के विरुद्ध युद्ध और लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसक ढंग से उखाड़ फेंकने का रास्ता अपनाते हैं।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अनुसार, CPI (Maoist) सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने की विचारधारा अपनाता है और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम के अंतर्गत आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल है। मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2004 से 30 नवंबर 2025 तक वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी हिंसा में 8,956 लोगों की मृत्यु हुई।

इससे एक गंभीर प्रश्न उठता है—जो विचारधारा शोषितों, वंचितों और जनजातीय समुदायों की मुक्ति का दावा करती है, उसके नाम पर उन्हीं समुदायों के लोगों की हत्या किस प्रकार उचित ठहराई जा सकती है?यहाँ लोकतांत्रिक तरीके से श्रमिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने और सशस्त्र हिंसा का सहारा लेने के बीच स्पष्ट अंतर करना भी आवश्यक है।

  • आंदोलन बनाम रोजगार और विकास

श्रमिकों के अधिकारों के लिए आंदोलन करना अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जब औद्योगिक संबंधों में टकराव, अनिश्चितता या बाधाएँ निवेश और रोजगार को प्रभावित करती हैं, तो उनके वास्तविक परिणामों की जाँच होनी चाहिए।इसी तरह, किसी उद्योग का बंद होना मात्र मार्क्सवादी विचारधारा का परिणाम नहीं माना जा सकता। इसके लिए श्रम नीतियों, बाजार की परिस्थितियों, सरकारी निर्णयों, प्रबंधन और संबंधित उद्योग के प्रमाणों का अध्ययन आवश्यक है।

केवल नारे लगाने, धरने देने और प्रदर्शन करने से देश का निर्माण नहीं होता। आंदोलनों की सार्थकता इस बात से भी तय होती है कि उनसे श्रमिकों और समाज के जीवन में कितना सकारात्मक एवं स्थायी परिवर्तन आया।

  • समाज के लिए स्थायी योगदान की कसौटी :

वास्तविक प्रश्न यह है कि किसी विचारधारा ने कितने लोगों को अधिक सक्षम, स्वावलम्बी और समृद्ध बनाया।भारत में कम्युनिस्ट और मार्क्सवादी संगठनों के लगभग सौ वर्षों के मूल्यांकन में केवल उनके आंदोलनों, चुनावी प्रभाव और वैचारिक संघर्षों को देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, उद्यमिता, सहकारिता और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में कितने स्थायी परिणाम दिए।

यदि कोई संगठन पीड़ितों, शोषितों, मजदूरों और वंचितों के विकास का दावा करता है, तो उससे कुछ सीधे प्रश्न पूछे जाने चाहिए—

  • उसने कितने अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र और जनसेवा संस्थान स्थापित किए?
  • कितने विद्यालय, प्रशिक्षण केंद्र और कौशल विकास संस्थान बनाए?
  • कितने युवाओं को स्थायी रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिले?
  • कितने सफल सहकारी उद्यम और स्वावलम्बन के मॉडल विकसित किए?
  • कितने ऐसे संस्थान खड़े किए, जो राजनीतिक प्रभाव घटने के बाद भी समाज की सेवा करते रहे?

इन प्रश्नों का उत्तर नारों से नहीं, बल्कि प्रमाणित आँकड़ों, संस्थानों के कार्य और उनके दीर्घकालीन परिणामों से मिलना चाहिए।

  • सभी वैचारिक संगठनों के लिए समान कसौटी

यह मूल्यांकन केवल मार्क्सवादी संगठनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती, किसान संगठनों, श्रमिक संगठनों, धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं और अन्य वैचारिक संगठनों को भी इन्हीं कसौटियों पर परखा जाना चाहिए।

किसने कितने लोगों तक स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएँ पहुँचाईं? किसने रोजगार और कौशल विकास में योगदान दिया? किसने समाज को आत्मनिर्भर बनाया? किन संस्थाओं ने बिना राजनीतिक लाभ के भी निरंतर सेवा की? और उनके कार्यों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया जा सकता है या नहीं?समाजहित का मूल्यांकन संगठन की विचारधारा या दावों से नहीं, बल्कि उसके प्रमाणित कार्यों और परिणामों से होना चाहिए।

आदर्श, कार्य और परिणाम:

मार्क्सवादी विचारधारा और उससे जुड़े संगठनों का निष्पक्ष मूल्यांकन करते समय तीन बातों के बीच अंतर करना आवश्यक है—उनके घोषित आदर्श, उनके विभिन्न राजनीतिक एवं हिंसक धड़ों की गतिविधियाँ, और उनके वास्तविक सामाजिक-आर्थिक परिणाम।आलोचना के लिए ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक हैं, लेकिन किसी विचारधारा के सभी संगठनों को एक जैसा मान लेना भी उचित नहीं है। जहाँ हिंसा हुई है, वहाँ उसकी जिम्मेदारी और परिणामों की जाँच होनी चाहिए। जहाँ श्रमिकों के अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक सुधार में योगदान हुआ है, वहाँ उसका भी प्रमाणों के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए।

अंततः, किसी भी विचारधारा की वास्तविक सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि उसने समाज में कितना न्याय, कितना विकास, कितनी स्वतंत्रता और कितनी आत्मनिर्भरता बढ़ाई।देश का निर्माण केवल भाषणों, नारों और आंदोलनों से नहीं होता। उसका निर्माण ऐसे कार्यों से होता है, जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाएँ, उन्हें सक्षम करें और समाज को दीर्घकाल तक लाभ पहुँचाएँ।


— कैलाशचंद्र
( क्षेत्र प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्य क्षेत्र)

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