बचपन में देखा जब आसमान साफ रहता था, तब चाँद की छटा कुछ अलग ही दिखाई देती थी। रात में छत पर निकलते तो लगता, चाँदनी ने पूरे संसार पर सफेद चादर बिछा दी है। घरों की छतों और आँगनों में खीर रखी जाती थी। सुबह उस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की उत्सुकता रहती थी। दादी बताती थी कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणें खीर में उतरती हैं और उसे अमृत तुल्य बना देती हैं।
अब स्थिति बदल रही है। शहरों में आसमान का साफ दिखाई देना ही अपने आप में एक अनुभव बनता जा रहा है। धूल, धुआँ, वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ते कण और कृत्रिम रोशनी रात के प्राकृतिक दृश्य को प्रभावित करते हैं। कुछ देर के लिए छत पर खीर रखकर परम्पराओं का निर्वहन तो करना पड़ता है।
शरद पूर्णिमा आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। वर्षा ऋतु के बाद शरद का आगमन प्रकृति में कई परिवर्तन लेकर आता है। लगातार बरसते बादलों के हटने पर आकाश में विस्तार दिखाई देने लगता है। वातावरण में नमी, बादलों की उपस्थिति और स्थानीय मौसम के अनुसार रात की दृश्यता बदलती है। जब आकाश साफ होता है, तब चंद्रमा अधिक चमकीला और स्पष्ट दिखाई देता है।
शरद ऋतु की इसी प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में मिलता है। श्रीकृष्ण की रासलीला के प्रसंग की शुरुआत करते हुए शुकदेवजी कहते हैं—
भगवानपि ता रात्रीः शारदोत्फुल्लमल्लिकाः।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ (श्रीमद्भागवत महापुराण, 10.29.1)
अर्थात: शरद ऋतु की उन रात्रियों में मल्लिका अर्थात चमेली के फूल खिले हुए थे। उन सुगंधित रात्रियों को देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया का आश्रय लेकर रासलीला की इच्छा की। इस श्लोक में शरद की रात केवल समय का उल्लेख नहीं है। खिले हुए फूल, उनकी सुगंध और रात्रि का वातावरण मिलकर उस ऋतु की एक सजीव तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। शरद ऋतु का सौंदर्य भारतीय काव्य और धार्मिक आख्यानों में इसी तरह प्रकृति के रंगों, गंधों और प्रकाश के साथ प्रकट होता है।
इसी अध्याय के अगले श्लोक में चंद्रमा के उदय का काव्यमय चित्रण है—
तदोऽडुराजः ककुभः करैर्मुखं
प्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमैः।
स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन्
प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः॥ (श्रीमद्भागवत महापुराण, 10.29.2)
अर्थात: तारों के राजा चंद्रमा का उदय हुआ। उसकी कोमल किरणों ने पूर्व दिशा को लालिमा से रंग दिया और उसे देखने वालों के संताप को दूर करने वाला उसका रूप ऐसा लगा, जैसे लंबे समय बाद लौटा प्रिय अपनी प्रिया के मुख को स्नेह से सँवार रहा हो। यहाँ चंद्रमा का वर्णन केवल खगोलीय पिंड के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं से जुड़े सौंदर्य के रूप में किया गया है। चंद्रमा की शीतलता और उसके उदय की प्रतीक्षा ने भारतीय साहित्य में प्रेम, शांति और आनंद के अनेक बिंब रचे हैं।
इसी प्रसंग के तीसरे श्लोक में पूर्ण चंद्रमा, कुमुदिनी और वन का चित्र मिलता है—
दृष्ट्वा कुमुद्वन्तमखण्डमण्डलं
रमाननाभं नवकुङ्कुमारुणम्।
वनं च तत्कोमलगोभी रञ्जितं
जगौ कलं वामदृशां मनोहरम्॥ (श्रीमद्भागवत महापुराण, 10.29.3)
अर्थात पूर्ण और अखंड मंडल वाले चंद्रमा को देखकर, जिसकी आभा लक्ष्मी के मुख जैसी और रंग नई कुमकुम-लालिमा से युक्त बताया गया है, तथा चंद्रमा की कोमल किरणों से आलोकित वन को देखकर श्रीकृष्ण ने मधुर स्वर में बाँसुरी बजाई। इस वर्णन में चंद्रमा, कुमुदिनी और वन अलग-अलग वस्तुएँ नहीं हैं। वे एक ही प्राकृतिक दृश्य के अंग हैं। यह काव्यात्मक दृष्टि हमें याद दिलाती है कि रात का आकाश और धरती का जीवन एक-दूसरे से कटे हुए नहीं हैं। चंद्रमा का प्रकाश, वनस्पतियों का संसार और मनुष्य की अनुभूति मिलकर संस्कृति में अर्थ ग्रहण करते हैं।
हमारे पुरखों के जीवन में ऋतुओं का महत्व केवल तिथियों तक सीमित नहीं था। खेती, पशुपालन, भोजन, जल और दैनिक कामकाज मौसम के साथ बदलते थे। आकाश की स्थिति, हवा की दिशा, बादलों का आना-जाना, ओस पड़ना और फसलों का बढ़ना, ये सब जीवन के अनुभव से सीखे जाने वाले संकेत थे। आज हम मौसम की जानकारी मोबाइल पर देख लेते हैं, लेकिन पहले प्रकृति को देखना और उसके संकेतों को समझना दैनिक जीवन का हिस्सा था। शरद पूर्णिमा जैसे पर्वों में भी ऋतु परिवर्तन, चंद्रमा के दर्शन, सामूहिक पूजा और विशेष भोजन का मेल दिखाई देता है।
इस रात खीर बनाने और उसे चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा का धार्मिक महत्व है। लोकमान्यता में शरद पूर्णिमा के चंद्रमा को सोलह कलाओं से पूर्ण माना जाता है और उसकी किरणों को अमृतमयी कहा गया है। कई स्थानों पर खीर को रात भर चाँदनी में रखकर अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। कुछ परंपराओं में इस रात को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है और लक्ष्मी पूजा तथा रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। इन मान्यताओं और रीति-रिवाजों का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में बदल सकता है।
खीर को इस परंपरा में स्थान मिलना भी अपने आप में अर्थपूर्ण है। चावल और दूध भारतीय भोजन संस्कृति के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं। चावल धान की खेती से जुड़ा है और दूध पशुपालन से। इन दोनों से बनने वाली खीर सामान्य दिनों में भी पौष्टिक और प्रिय भोजन है, जबकि पर्वों पर इसे शुभ पकवान और प्रसाद का स्थान मिलता है।
अब उस दृश्य पर लौटें, जिसमें छत पर खीर रखकर पूरा परिवार सुबह उसका प्रसाद ग्रहण करता था। आज खुले वातावरण की गुणवत्ता पहले जैसी नहीं रही, विशेषकर घनी आबादी वाले नगरों में। हवा में मौजूद धूल और अन्य कण चाँदनी की दृश्यता को प्रभावित करते हैं। भोजन की स्वच्छता पर धूल-कणों का जमना, कीट-पतंगों का संपर्क, खुले में रखे जाने की अवधि और तापमान जैसे कारक असर डालते हैं।
हम चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं, उसकी रोशनी में कुछ समय बिताते हैं, खीर बनाते हैं और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं, तो इस परंपरा का आनंद लेने के लिए भोजन को पूरी रात खुले में छोड़ना अनिवार्य नहीं है। खीर को स्वच्छ पात्र में रखा जा सकता है, उसे धूल और कीटों से बचाया जा सकता है और भोजन की सुरक्षा के अनुरूप ठंडा रखा जा सकता है। पूजा के समय उसे चंद्रमा के सामने अर्पित करने की पारिवारिक परंपरा भी निभाई जा सकती है।
शरद पूर्णिमा का अवसर हमें अपने भोजन और पर्यावरण, दोनों पर विचार करने का मौका देता है। जिस धान से खीर बनती है, उसके लिए उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त जल और स्वस्थ कृषि पारिस्थितिकी जरूरी है। जिस दूध से खीर बनती है, उसका संबंध पशुपालन और चारे से है। जिस आकाश के नीचे हम खीर रखते हैं, वह भी प्रकृति का ही हिस्सा है। इस तरह एक कटोरी खीर के पीछे खेत, पानी, मिट्टी, पशु और मनुष्य के श्रम की पूरी शृंखला जुड़ी हुई है। इस संबंध को समझना भी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का एक रूप है।
मुझे बचपन की वह चाँदनी याद आती है, जिसमें छत पर रखी खीर सुबह तक चंद्रमा के प्रकाश में नहाई हुई मिलती थी। उन यादों को बचाए रखने का अर्थ यह नहीं कि हम आज की परिस्थितियों को अनदेखा कर दें। परंपरा तभी जीवंत रहती है, जब उसके साथ विवेक भी चलता है। शरद पूर्णिमा पर खीर अवश्य बनाइए, चंद्रमा को देखिए, परिवार के साथ पर्व मनाइए, लेकिन भोजन की स्वच्छता का ध्यान रखिए और उस आकाश को साफ रखने की चिंता भी कीजिए, जिसके नीचे यह परंपरा पीढ़ियों से निभाई जाती रही है।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
