
कुछ व्यक्तित्व अपने जीवनकाल में केवल काम नहीं करते, वे अपने पीछे एक कार्यपद्धति, एक संस्कार और एक पीढ़ी छोड़ जाते हैं। श्री एम. ए. कृष्णन जी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। केरल में स्नेहपूर्वक ‘एम. ए. सर’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस वरिष्ठ प्रचारक का जीवन बताता है कि किसी विचार को समाज में स्थापित करने के लिए केवल भाषण पर्याप्त नहीं होते। उसके लिए जीवन की साधना, निरंतर परिश्रम, संगठन-निर्माण और समाज के मन को समझने की क्षमता आवश्यक होती है।
एम. ए. सर का जीवन इसलिए विशेष है कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में काम करते हुए केवल संगठन का विस्तार नहीं किया, बल्कि समाज के सांस्कृतिक जीवन में अपनी उपस्थिति बनाई।
कठिन परिस्थितियों में कार्य का संकल्प
1954 में प्रचारक जीवन स्वीकार करने के बाद एम. ए. सर ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और संगठन के कार्य को समर्पित किया। केरल में उस समय सामाजिक और वैचारिक परिस्थितियाँ अत्यंत चुनौतीपूर्ण थीं। ऐसे वातावरण में संघ कार्य करना केवल शाखा लगाने का काम नहीं था; समाज के बीच विश्वास पैदा करना, कार्यकर्ताओं का निर्माण करना और भारतीय विचार को समाज के सामने सहज रूप में रखना भी उतना ही आवश्यक था।
यही उनके जीवन की पहली बड़ी सीख है—
परिस्थितियाँ अनुकूल हों, तभी कार्य करना कार्यकर्ता का स्वभाव नहीं हो सकता। कार्यकर्ता परिस्थितियों को समझकर उनमें कार्य की संभावना खोजता है।
एम. ए. सर ने कठिनाइयों को शिकायत का विषय नहीं बनाया; उन्हें कार्य की चुनौती के रूप में स्वीकार किया।
केवल संगठन नहीं, समाज का सांस्कृतिक पुनर्जागरण
उनके जीवन की दूसरी बड़ी विशेषता थी—समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचने की दृष्टि।
बालगोकुलम् इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। बच्चों को भारतीय संस्कृति, कथा, उत्सव और संस्कारों से जोड़ने का प्रयास केवल बच्चों के लिए कार्यक्रम खड़ा करना नहीं था। इसके पीछे यह समझ थी कि आने वाली पीढ़ी के मन में अपनी संस्कृति के प्रति सहज आत्मीयता बचपन से ही विकसित होनी चाहिए।
इसी प्रकार तपस्या कलासाहित्य वेदी के माध्यम से साहित्य और कला के क्षेत्र में कार्य का विस्तार हुआ।
यहाँ से एक महत्वपूर्ण दिशा मिलती है—
समाज परिवर्तन केवल राजनीतिक या संगठनात्मक गतिविधियों से नहीं होता। समाज का मन साहित्य, कला, संस्कृति, परिवार और शिक्षा से भी बनता है।
एम. ए. सर ने इस बात को अपने कार्य से प्रमाणित किया।
बाल मन को समझने वाला कार्य
आज जब बच्चों का बचपन अनेक प्रकार के दबावों से प्रभावित हो रहा है, तब बालगोकुलम् जैसे प्रयोगों की प्रासंगिकता और अधिक दिखाई देती है।
बच्चे को केवल परीक्षा, प्रतियोगिता और भविष्य की नौकरी के लिए तैयार करने के बजाय उसके भीतर कल्पना, संस्कार, जिज्ञासा, आनंद और अपनी संस्कृति से आत्मीय संबंध विकसित करना आवश्यक है।
एम. ए. सर के कार्य से यह प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा होता है—
हम बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं या अच्छा मनुष्य भी बनाना चाहते हैं?
उनकी दृष्टि का यही पक्ष आज के माता-पिता, शिक्षक, साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए विशेष प्रेरणा बन सकता है।
विचार को समाज की भाषा में पहुँचाना
एम. ए. सर केवल संगठनकर्ता नहीं थे। वे लेखक, संपादक, शिक्षक और संस्कृत के गंभीर अध्येता भी थे।
1964 से 1990 तक मलयालम साप्ताहिक ‘केसरी’ के संपादन से जुड़ा उनका कार्य यह बताता है कि विचार को समाज तक पहुँचाने के लिए प्रभावी संवाद कितना आवश्यक है।
यहाँ उनकी कार्यशैली से एक और सूत्र मिलता है—
विचार कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, यदि वह समाज की भाषा में नहीं पहुँचता तो उसका प्रभाव सीमित रह जाता है।
इसलिए लेखन, पत्रकारिता, साहित्य और संवाद केवल प्रचार के साधन नहीं हैं; वे समाज-निर्माण के उपकरण हैं।
व्यक्ति नहीं, पीढ़ी निर्माण
किसी प्रचारक या सामाजिक कार्यकर्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसने स्वयं कितना काम किया। बड़ी उपलब्धि यह है कि उसके जाने के बाद भी उसके द्वारा तैयार किए गए लोग और संस्थाएँ काम करती रहें।
एम. ए. सर ने अपने आसपास कार्यकर्ताओं, लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और विचारशील लोगों की एक पीढ़ी तैयार करने में भूमिका निभाई। यही किसी जीवन की वास्तविक सामाजिक पूँजी है।
एक दीपक की सार्थकता केवल उसके स्वयं जलने में नहीं, बल्कि दूसरे दीपकों को प्रकाशित करने में है।
एम. ए. सर का जीवन इसी अर्थ में दीप से दीप जलाने की साधना था।
आज उनके जीवन से हमें क्या सीखना है?
एम. ए. सर को स्मरण करने का सबसे सार्थक तरीका केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके जीवन से कुछ कार्य-सूत्र ग्रहण करना है।
पहला— कठिन परिस्थिति में कार्य से पीछे नहीं हटना। परिस्थिति चाहे जैसी हो, कार्य की संभावना खोजनी चाहिए।
दूसरा— बच्चों और युवाओं को केवल सूचना नहीं, संस्कार देना। समाज का भविष्य उसके विद्यालयों के साथ-साथ उसके परिवार और सांस्कृतिक वातावरण में भी तैयार होता है।
तीसरा— साहित्य और कला को समाज-निर्माण से जोड़ना। कलम और संस्कृति भी समाज परिवर्तन की शक्तिशाली साधनाएँ हैं।
चौथा— विचार को समाज की भाषा में रखना। जटिल विचार को सरल और आत्मीय बनाकर समाज तक पहुँचाना चाहिए।
पाँचवाँ— स्वयं से अधिक कार्यकर्ताओं का निर्माण करना। सच्चा संगठन वही है जो व्यक्ति के जाने के बाद भी चलता रहे।
छठा— अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिक समाज से संवाद करना। परंपरा का अर्थ अतीत में ठहर जाना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक चेतना के आधार पर वर्तमान से संवाद करना है।
एक जीवन का अंतिम संदेश
एम. ए. सर का जीवन हमें यह विश्वास देता है कि परिवर्तन हमेशा बड़े मंचों से शुरू नहीं होता। कभी वह एक शाखा से शुरू होता है, कभी एक बच्चे से, कभी एक पुस्तक से, कभी एक लेख से और कभी किसी एक समर्पित कार्यकर्ता के जीवन से।
एक व्यक्ति चुपचाप अपना जीवन किसी विचार और समाज के लिए लगा देता है। वर्षों बाद पीछे मुड़कर देखने पर पता चलता है कि उसके श्रम से अनेक धाराएँ निकलीं और उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित किया।
यही किसी तपस्वी कार्यकर्ता की पहचान है।
आज एम. ए. सर हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनके द्वारा खड़े किए गए कार्य, उनके संस्कार से निकली पीढ़ियाँ और उनके जीवन से मिलने वाली प्रेरणा आगे भी चलती रहेगी।
उनकी स्मृति हमें केवल अतीत की ओर देखने के लिए नहीं, अपने वर्तमान के दायित्व को पहचानने के लिए प्रेरित करे।
उनकी श्रद्धांजलि का सबसे अच्छा अर्थ यही होगा कि हम स्वयं से पूछें—
मैं अपने समय की कठिन परिस्थिति में क्या कर रहा हूँ?
मैं कितने लोगों को जोड़ रहा हूँ?
मैं अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहा हूँ?
क्योंकि अंततः जीवन की पहचान इस बात से नहीं होती कि हमने अपने लिए कितना अर्जित किया, बल्कि इससे होती है कि हमारे जाने के बाद हमारे जीवन से समाज को क्या प्राप्त होता है।
एम. ए. कृष्णन जी की पुण्य स्मृति को विनम्र नमन।
ॐ शांति।
— कैलाश चन्द्र
