छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में पितर पाख

गणेश पक्ष आते ही पितर पाख की आहट सुनाई देने लगती है, क्योंकि इस पाख में पितरों का आगमन होता है और उनका श्रद्धापूर्वक उन्हें याद करते हुए श्राद्ध किया जाता है। यह हमारी लोक परम्परा का अनिवार्य हिस्सा है। कुँवार माह का यह पक्ष हमें अपने पूर्वजों से जोड़ता है। उनकी याद दिलाता है और उनके पद चिन्हों पर चलने के लिए मार्गदर्शन करता है। यह लौटती हुई बरसात का मौसम होता है, पितरों के आगमन पर उनके स्वागत के लिए घर की देहरी की साफ सफ़ाई होती है, आँगन लीपा जाता है।
छत के नीचे एक जगह चावल के पिसान से चौक पूरा जाता है। वहाँ एक पीढ़ा रखा जाता है। पास में पानी, दूब, फूल और घर में उपलब्ध दूसरी सामग्री रखी जाती है। रसोई में उरिद दाल का बरा और चाउर चीला बनने लगता है। घर के बुजुर्गों को पता रहता है कि आज किस पुरखा की तिथि है और किसके नाम से तर्पण किया जाना है। 
छत्तीसगढ़ में यही पितर पाख है। जिसे सामान्यतः पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहा जाता है, छत्तीसगढ़ी बोली में वह सहज होकर पितर पाख बन गया। पितृ से पितर और पक्ष से पाख। शब्द छोटा हुआ, लेकिन उसके भीतर पुरखों के प्रति अपनापन और गहरा हो जाता है।
पितर पाख को केवल श्राद्ध कर्म की पंद्रह दिनों की अवधि मान लेना छत्तीसगढ़ के लोकजीवन को अधूरा समझना होगा। यहाँ यह घर, परिवार, पुरखा, रसोई, खेत, तालाब, नदी और देहरी से जुड़ी हुई परंपरा है। पितरों के निमित्त तर्पण होता है, भोजन बनता है, भोग लगाया जाता है और अंत में उन्हें विदा किया जाता है। इन सबके बीच परिवार अपने बीते हुए लोगों को फिर से याद करता है।
लोक में ‘पुरखा’ शब्द का अर्थ केवल बीते हुए लोगों से नहीं है। पुरखा वह है जिसकी वजह से घर की पीढ़ी आगे बढ़ी। दादा, परदादा, दाई, ददा, महतारी, बबा और उनसे भी पहले के वे लोग, जिनके चेहरे अब किसी को याद नहीं, लेकिन जिनका नाम घर की चर्चाओं में आता रहता है।
पुराने समय में परिवार के बच्चों को अपने खानदान के लोगों की जानकारी किसी किताब से नहीं मिलती थी। घर के बड़े ही बताते थे कि कौन किसका बेटा था, किसकी मृत्यु कब हुई थी, कौन किस गाँव में ब्याहा गया था और किस पुरखे की क्या आदत थी। पितर पाख आते ही यह पारिवारिक कथा फिर से खुल जाती थी।
जिस पुरखे की मृत्यु जिस तिथि को हुई, उसी तिथि को उसका श्राद्ध करने की परंपरा है। किसी की तिथि पंचमी है तो पंचमी को, किसी की सप्तमी है तो सप्तमी को। जिनकी तिथि मालूम नहीं, उनके लिए पितर पाख की अंतिम अमावस्या का सहारा लिया जाता है। इसीलिए पितर पाख परिवार के पुरखों को याद करने का समय भी है।
पितर पाख की शुरुआत को छत्तीसगढ़ में पितर बैसकी कहा जाता है। ‘बैसकी’ में ही जैसे पितरों के बैठने का भाव छिपा हुआ है। घर को साफ किया जाता है। देहरी और आँगन को गोबर पानी से लीपा जाता है। चावल के आटे से चौक पूरा जाता है और उसके ऊपर पीढ़ा रखा जाता है।
पीढ़े के दोनों ओर पानी से भरे लोटे रखे जाते हैं। दूब, कुंकुम, फूल, तोरईन, काशी और भीगे चावल जैसी वस्तुओं का उपयोग होता है। यह सारी सामग्री सहजता से गाँव में घर की बखरी में मिलती है, उसी से पितरों के लिए स्थान तैयार हो जाता है।
चावल के पिसान से पूरे गए चौक में घर की स्त्रियों की उँगलियों का कौशल भी दिखाई देता है और शुभता का भाव भी। पितर पाख में चौक पूरने अपना महत्व है। चौक पूरा गया, पीढ़ा रखा गया और उसके आसपास फूल पत्तियाँ रख दी गईं तो जैसे घर में पुरखों के लिए जगह बन गई, उन्हें स्थान दे दिया गया।
पुरानी छानही वाले घरों में छत के नीचे चौक बनाने की परंपरा का एक लोकविश्वास कौवे से भी जुड़ा है। पितरों के कौवे के रूप में आने की कल्पना के कारण चौक ऐसी जगह बनाया जाता था जहाँ कौवा आसानी से बैठ सके और नीचे रखा अन्न ग्रहण कर सके।
किसी भी लोकपरंपरा को उसकी रसोई के बिना समझना मुश्किल है। पितर पाख की अपनी रसोई है। उरिद दाल का बरा, चाउर चीला, चावल और घर की बाड़ी में मिलने वाली सब्जियाँ पितरों के भोजन का हिस्सा बनती रही हैं। तोरई की सब्जी का भी विशेष उल्लेख मिलता है। कई घरों में नमक रहित उरिद बरा बनाया जाता है। पितर पाख के अंतिम दिन खीर पूरी का भोग लगाने की परंपरा भी रही है।
यहाँ भोजन का अर्थ केवल पकवान नहीं है। घर के किसी पुरखे को कौन सा भोजन पसंद था, यह भी याद किया जाता है। जिस पुरखे को बरा पसंद था, उसके नाम से बरा बन गया। किसी को चीला पसंद था तो चीला बन गया। इसमें शास्त्र से अधिक घर का अपनापन दिखाई देता है।
आज के समय में बाजार से कुछ भी खरीदकर श्राद्ध किया जा सकता है, लेकिन पुरानी परंपरा में पितरों के लिए बनाया जाने वाला भोजन खेत और बाड़ी से घर तक आता था। धान खेत से आया, उरिद कोठार से आई और तोरई बाड़ी से। इस तरह पितर पाख में घर का अन्न भी पुरखों को समर्पित होता था।
पितर पाख में रोज नदी या तालाब जाकर तर्पण करने की परंपरा छत्तीसगढ़ के अनेक गाँवों में रही है। पानी में खड़े होकर या घाट पर बैठकर तिल, जवा और जल के साथ पितरों का स्मरण किया जाता है। तर्पण करते समय तीन बार जल अर्पित किया है।
पितर पाख के दिनों में कौवे का इंतजार करना भी एक लोकरीति है। पितरों के लिए बनाए गए भोजन का एक अंश कौवे के लिए रखा जाता है। कौवा आकर भोजन कर ले तो मन को संतोष होता है। लोकविश्वास है कि पितर कौवे के रूप में भोग ग्रहण करने आते हैं। यह विश्वास कितना पुराना है, इसकी चर्चा अलग विषय है, लेकिन छत्तीसगढ़ के घरों में इसका व्यवहारिक रूप आज भी दिखाई देता है।
पितर पाख में नवमी का अपना विशेष स्थान है। इसे महतारी नवमी या मातृ नवमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन परिवार की दिवंगत माताओं और स्त्रियों को याद किया जाता है। पुरुषों की वंशावली के साथ परिवार की स्त्रियों की कथा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दाई, महतारी, दादी, नानी और वे स्त्रियाँ जिन्होंने घर और परिवार को सँभाला, उनके बिना कोई वंश आगे नहीं बढ़ सकता।
महतारी नवमी इस बात को सामने लाती है कि पितर कहने का अर्थ केवल पुरुष पूर्वजों तक सीमित नहीं है। पुरखों की स्मृति में घर की मातृशक्ति भी शामिल है। नवमी को दिवंगत महिलाओं के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा इसी भाव को व्यक्त करती है।
पितर पाख में श्राद्ध करने वाले के लिए भी कुछ संयम माने जाते रहे हैं। नशे से दूर रहना, मांसाहार न करना और दाढ़ी मूँछ न बनाना जैसी परंपराएँ कई परिवारों में रही हैं। परम्परा में किसी भी संस्कार के साथ कुछ दिनों का संयम जुड़ा रहता था। पितर पाख भी ऐसा ही अवसर था जिसमें व्यक्ति अपने खानपान और व्यवहार में मर्यादा रखता था।
पितर पाख में बनाया गया भोजन केवल पितरों को भोग लगाने से बाद पूर्ण नहीं हो जाता बल्कि गाय, कौवा, ब्राह्मण, अतिथि या जरूरतमंद को भोजन कराने की परंपरा भी इससे जुड़ी है। पितरों के नाम से निकाला गया अन्न दूसरे जीवों और मनुष्यों तक पहुँचता है। यहीं पितर पाख की एक बड़ी सामाजिक भावना दिखाई देती है। घर में जो अन्न आया है, उसमें पुरखों का भी हिस्सा माना गया और पुरखों के हिस्से को अंततः किसी जीव या मनुष्य के पेट तक पहुँचाया गया।
पितर पाख का अंतिम दिन छत्तीसगढ़ में पितर खेदा के नाम से जाना जाता है। पंद्रह दिनों तक पितरों के नाम से जो हुम धूप, फूल और दूसरी सामग्री रखी जाती है, उसे अंतिम दिन नदी, नाला या तालाब में विसर्जित किया जाता है। तर्पण होता है और पितरों को विदा किया जाता है। 
यह विदाई भी अपने आप में बड़ी अर्थपूर्ण है। पितरों को बुलाया गया। उनके लिए घर सजाया गया। भोजन बनाया गया। तर्पण किया गया। कौवे को अन्न दिया गया। अब विदा करने का समय आया। लोकजीवन में अतिथि के आने और जाने की जो सहज परंपरा है, पितर पाख में वही भाव एक अलग स्तर पर दिखाई देता है। पुरखे अपने हैं, इसलिए उनका स्वागत भी घर में होता है और विदाई भी घर की ही रीति से।
समय बदल गया है। संयुक्त परिवार कम हुए हैं। बहुत से लोग गाँव छोड़कर शहरों में बस गए हैं। जिन तालाबों के किनारे तर्पण होता था, उनका स्वरूप बदल रहा है। कच्ची छानही की जगह पक्के मकान आ गए हैं और देहरी पर गोबर से लीपने की परंपरा भी बहुत से घरों में समाप्त हो रही है।
लेकिन पितर पाख अभी भी आता है। अब किसी शहर के छोटे से मकान में भी पिता या दादा के नाम से श्राद्ध होता है। कहीं पंडित के माध्यम से कर्मकांड पूरा होता है, कहीं परिवार अपने ढंग से तर्पण करता है। किसी घर में उरिद बरा बनता है, किसी में पुरखे की पसंद का भोजन। रीति का रूप बदल सकता है, लेकिन पुरखों को याद करने की जरूरत नहीं बदलती।
छत्तीसगढ़ का पितर पाख शास्त्र की परंपरा को अपने लोकजीवन में ढाल लेने का उदाहरण है। यहाँ पितृ पक्ष केवल संस्कृत के मंत्रों और कर्मकांडों में नहीं रहता। वह छत्तीसगढ़ी बोली में पितर पाख बनता है, पितरबैसकी बनता है, पितरखेदा बनता है। इस तरह छत्तीसगढ़ में पितर पाख केवल श्राद्ध का पक्ष नहीं है बल्कि यह पुरखों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञ होने और अपनी पीढ़ी को उसके पीछे खड़ी पीढ़ियों से जोड़ने की लोकपरंपरा है।

आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

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