भारतीय चिंतन में पूर्वजों का स्थान एवं पितृऋण की अवधारणा

पितृपक्ष की प्रतीक्षा साल भर रहती है, इस पक्ष में अपने पितरों का श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। नियत तिथि पर तर्पण होता है, श्राद्ध किया जाता है। जल, तिल और अन्न के अर्पण के साथ पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। लेकिन इस पूरी परंपरा के पीछे एक बड़ा प्रश्न छिपा है। आखिर भारतीय परंपरा ने मनुष्य को अपने पूर्वजों के प्रति ऋणी क्यों माना?

इस प्रश्न का उत्तर वैदिक और धर्मशास्त्रीय परंपरा में मिलता है। ‘पितृऋण’ केवल किसी मृत पूर्वज को कुछ अर्पित करने की अवधारणा नहीं है। यह मनुष्य के अस्तित्व को उससे पहले की पीढ़ियों से जोड़ने वाली एक दार्शनिक धारणा है। मनुष्य को जो जीवन मिला, उसमें माता पिता और पूर्वजों का योगदान है। जो ज्ञान मिला, उसके पीछे ऋषि और आचार्य हैं और जो सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था मिली, उसके पीछे पीढ़ियों का लंबा अनुभव है। इसलिए भारतीय मनीषा ने जीवन को केवल अधिकारों के रूप में नहीं देखा, बल्कि दायित्वों के रूप में भी समझा।

कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता 6.3.10.5 में तीन ऋणों का उल्लेख मिलता है।

जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिर् ऋणवा जायते
ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः
प्रजया पितृभ्यः।

अर्थात जन्म लेने वाला मनुष्य तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है। ब्रह्मचर्य के माध्यम से ऋषियों का, यज्ञ के माध्यम से देवताओं का और प्रजा अर्थात संतति के माध्यम से पितरों का ऋण चुकाने की बात कही गई है।

इस मंत्र का महत्व इस बात में है कि जीवन को आत्मनिर्भर उपलब्धि नहीं माना गया। मनुष्य जिस ज्ञान, संस्कृति और जीवन परंपरा में जन्म लेता है, उसमें उससे पहले की पीढ़ियों का योगदान है। इसलिए उसके जीवन में प्रत्युपकार और उत्तरदायित्व की भावना होनी चाहिए।

तैत्तिरीय संहिता में पितृऋण की पूर्ति ‘प्रजा’ से जोड़ी गई है। बौधायन धर्मसूत्र में भी ऋषि, देव और पितृ इन तीन ऋणों का उल्लेख मिलता है। वैदिक संदर्भ में ‘प्रजा’ को पितृऋण की पूर्ति का प्रमुख माध्यम माना गया था। बाद की परंपरा में पितरों के प्रति दायित्व केवल संतति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तर्पण, श्राद्ध, कुलाचार और अन्य धार्मिक कर्तव्यों का भी विस्तार हुआ।

प्राचीन समाज की दृष्टि से इसका संबंध वंश की निरंतरता से था। परिवार और वंश केवल जैविक इकाइयाँ नहीं थे। उनके साथ संपत्ति, संस्कार, सामाजिक दायित्व, धार्मिक परंपराएँ और जीवन का अनुभव भी अगली पीढ़ी तक जाता था। इसलिए पितृऋण का मूल भाव केवल पूर्वजों को कुछ देना नहीं, बल्कि उनसे मिली जीवन परंपरा को आगे बढ़ाना भी है।

यहाँ एक अंतर समझना आवश्यक है। पितृऋण एक दायित्व की अवधारणा है, जबकि पितृयज्ञ एक धार्मिक कर्मपरंपरा है। बाद की भारतीय परंपरा में श्राद्ध और तर्पण पितरों के प्रति इस धार्मिक दायित्व की प्रमुख अभिव्यक्तियों के रूप में विकसित हुए। वैदिक साहित्य में ऋण और पितरों की चर्चा जिस रूप में मिलती है, वह बाद के धर्मसूत्रों और स्मृति ग्रंथों में विकसित श्राद्ध की विस्तृत कर्म पद्धति से पूरी तरह समान नहीं है। इसलिए दोनों को एक ही समय और एक ही रूप की परंपरा मानना उचित नहीं होगा।

भारतीय गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र साहित्य में पंचमहायज्ञों की व्यवस्था मिलती है। बौधायन धर्मसूत्र में देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और ब्रह्मयज्ञ इन पाँचों को महायज्ञ कहा गया है। मनुस्मृति 3.70 में भी कहा गया है।

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥

अर्थात अध्ययन और अध्यापन ब्रह्मयज्ञ है, पितरों के लिए तर्पण पितृयज्ञ है, हवन देवयज्ञ, प्राणियों के लिए अन्न आदि का अर्पण भूतयज्ञ और अतिथि सत्कार मनुष्ययज्ञ है।

इन पाँच दायित्वों को साथ रखकर देखें तो गृहस्थ का जीवन केवल अपने परिवार के लिए नहीं रह जाता। उसका संबंध ज्ञान, देवतत्त्व, पूर्वजों, अन्य मनुष्यों और जीव जगत तक फैल जाता है। वह केवल अतीत से प्राप्त करने वाला व्यक्ति नहीं है, बल्कि ज्ञान, संस्कार और जीवन व्यवस्था को आगे पहुँचाने वाली कड़ी भी है।

याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध के लिए अमावस्या, अष्टका, संक्रांति, ग्रहण आदि विभिन्न अवसरों का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि श्राद्ध भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में एक व्यवस्थित धार्मिक कर्म के रूप में विकसित हुआ था।

‘श्राद्ध’ शब्द में ‘श्रद्धा’ का भाव केंद्रीय है। पितरों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किया गया अर्पण इस कर्म का भावात्मक आधार है। इसलिए श्राद्ध को केवल भोजन कराने की परंपरा के रूप में देखना उसके सांस्कृतिक अर्थ को सीमित कर देता है। यहाँ भोजन, जल, तिल और अन्य अर्पण माध्यम हैं। मूल भावना कृतज्ञता और दायित्व की है।

महाभारत के शान्तिपर्व में पिता के महत्व को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है।

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः॥

अर्थात पिता धर्म के समान, स्वर्ग के समान और परम तप के समान हैं। पिता प्रसन्न हों तो सभी देवता प्रसन्न होते हैं।

यहाँ पिता केवल परिवार के मुखिया के अर्थ में नहीं, बल्कि जीवन देने और उसका पालन पोषण करने वाले व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं। महाभारत के आगे के प्रसंगों में भी पिता द्वारा दिए गए शरीर और पालन पोषण के महत्व की चर्चा मिलती है। इस दृष्टि से पितृऋण कृतज्ञता की सामाजिक अभिव्यक्ति भी है।

मनुस्मृति के छठे अध्याय में कहा गया है।

ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।
अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः॥
मनुस्मृति 6.35

अर्थात तीन ऋणों का निर्वाह करने के बाद मनुष्य अपना मन मोक्ष की ओर लगाए। दायित्वों की उपेक्षा करके मोक्ष की साधना करना उचित नहीं माना गया।

यहाँ भारतीय चिंतन की एक महत्वपूर्ण विशेषता दिखाई देती है। आध्यात्मिक जीवन को सामाजिक दायित्वों से काटकर नहीं देखा गया। गृहस्थ जीवन के कर्तव्य और मोक्ष की आकांक्षा को एक दूसरे के विरोध में नहीं रखा गया। अपने हिस्से के दायित्वों को समझना और निभाना भी धर्म का अंग माना गया।

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान का हस्तांतरण, परिवार और समाज के प्रति दायित्व, संसाधनों के उपयोग में संयम तथा आने वाली पीढ़ी के लिए जीवन व्यवस्था बचाकर रखने का विचार आज भी विचारणीय है। आधुनिक सामाजिक और पर्यावरणीय चिंतन के संदर्भ में इन तत्वों की नई व्याख्या की जा सकती है।

पंचमहायज्ञ की अवधारणा में यह व्यापकता विशेष रूप से दिखाई देती है। पितृयज्ञ के साथ भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और ब्रह्मयज्ञ को भी रखा गया है। यानी मनुष्य का दायित्व केवल अपने पूर्वजों तक सीमित नहीं, बल्कि ज्ञान, समाज और जीव जगत तक फैला हुआ है।

पूर्वजों का सम्मान केवल उनके नाम पर श्राद्ध और तर्पण करने तक सीमित नहीं रह जाता। उनके द्वारा छोड़ी गई उपयोगी विरासत को सुरक्षित रखना, परिवार और समाज के अच्छे संस्कारों को आगे बढ़ाना, ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना और प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट होने से बचाना भी दायित्व माना जाता है।

आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

About विश्व संवाद केंद्र छत्तीसगढ़

View all posts by विश्व संवाद केंद्र छत्तीसगढ़ →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *