हमारे घरों में कपास का उपयोग इतना सामान्य है कि हम उसके बारे में सोचते भी नहीं। दीपक की बाती में, आरती की थाली में, कमीज के कपड़े में, बिस्तर की चादर में, तौलिये में, बच्चे के पहनने के कपड़े में और कभी घाव पर रखी जाने वाली पट्टी में भी वही सूत हमारे साथ रहता है। खेत में कपास का पौधा खड़ा होता है तो वह एक फसल दिखाई देता है, लेकिन उसके फूल से निकला रेशा जब सूती धागा बनकर करघे तक पहुंचता है, तब उसका रूप ही बदल जाता है। यही धागा कभी व्यापारी के माल के साथ समुद्र पार गया, कभी यूरोप के बाजार में भारतीय कपड़ों की पहचान बना और एक समय ऐसा भी आया जब इसी कपास ने भारत के किसानों, कारीगरों और अंग्रेजी मिलों के बीच संबंधों को बदल दिया।
कपास को समझने के लिए इसलिए केवल आज के खेती को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए हमें हजारों वर्ष पीछे जाना पड़ेगा, उस समय तक जब न आधुनिक मिलें थीं, न मशीन से चलने वाले करघे और न वैश्विक बाजार की आज जैसी कोई स्थिति। मेहरगढ़ की एक प्राचीन कब्र में तांबे के मनके के भीतर सुरक्षित मिले कपास के रेशे हमें उस बहुत पुराने समय तक ले जाते हैं। आगे चलकर सिंधु सभ्यता के नगरों में यही रेशा धागे और वस्त्र का रूप ले चुका था।
फिर कपास खेत की सीमा से बाहर निकली। बुनकरों के हाथों से बने भारतीय सूती कपड़े समुद्री रास्तों से दूर देशों तक पहुंचे। भरूच जैसे बंदरगाहों से उनका व्यापार हुआ। यूरोप में भारतीय कपड़ों की ऐसी मांग बनी कि वहां के अपने वस्त्र उद्योग को उनसे प्रतिस्पर्धा महसूस होने लगी। लेकिन इतिहास एक जगह ठहरता नहीं। मशीनें आईं और कपड़े के उत्पादन का ढंग बदल गया। भारत, जो कभी तैयार सूती कपड़ों का बड़ा निर्यातक था, धीरे-धीरे ब्रिटिश मिलों के लिए कच्ची कपास देने वाले देश में बदलता गया।
और फिर इसी कपास का एक दूसरा रूप सामने आया। गांधी के हाथ में चरखा आया। कपास का धागा केवल कपड़ा बनाने का साधन नहीं रहा, वह स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की आवाज बन गया। आज 7 अक्टूबर को विश्व कपास दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर कपास को केवल एक फसल की तरह देखना उसके इतिहास को बहुत छोटा कर देना होगा। इसके साथ किसान की मेहनत है, बुनकर का हुनर है, समुद्री प्राचीन व्यापार की यादे हैं, औद्योगिक परिवर्तन है और स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी है।
कपास के प्राचीन इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी तत्कालीन भारत एवं वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित मेहरगढ़ से मिलती है। वहां छठी सहस्राब्दी ईसा पूर्व की एक नवपाषाणकालीन कब्र से मिले तांबे के मनके के भीतर कुछ रेशे सुरक्षित मिले थे।
धातु के क्षरण से बचे इन रेशों की सूक्ष्मदर्शी जांच में उन्हें Gossypium, यानी कपास के रेशों के रूप में पहचाना गया। 2002 में प्रकाशित शोध ने इसे पुरानी दुनिया में कपास के सबसे प्राचीन ज्ञात प्रमाण के रूप में दर्ज किया। इससे पता चलता है कि भारतीय उपमहाद्वीप के इस हिस्से में रहने वाले लोग बहुत पुराने समय में कपास से परिचित थे और उसके रेशे का उपयोग करना जानते थे।
इसके बाद मोहनजोदड़ो से कपास के वस्त्र का महत्वपूर्ण प्रमाण मिलता है। एक छोटे चांदी के पात्र के ढक्कन से चिपके कपड़े के टुकड़े को चांदी के लवणों ने क्षरण से बचा लिया था। 1920 के दशक में उसकी जांच की गई और उसके रेशों को कपास के अनुरूप पाया गया। बाद के शोधों में इस कपड़े का काल लगभग 3000 से 2750 ईसा पूर्व माना गया है। इसका अर्थ यह है कि सिंधु सभ्यता के लोगों के लिए कपास केवल कोई अपरिचित पौधा नहीं था। वे उसके रेशे को धागे और फिर वस्त्र में बदलने की कला जानते थे।ु
प्राचीन भारतीय साहित्य में इस संसार की झलक मिलती है। पाणिनि की अष्टाध्यायी में बुनाई और करघे से जुड़े शब्द मिलते हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वस्त्र उत्पादन, सूत और बुनाई से जुड़े कामों के नियमन का उल्लेख मिलता है। बौद्ध साहित्य में भी कपास और विभिन्न प्रकार के वस्त्रों का वर्णन मिलता है।
भारत में कपास और उससे बने वस्त्रों की ख्याति देश की सीमाओं से बाहर भी पहुंची। पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के हेरोडोटस ने भारत के बारे में लिखते हुए ऐसे पेड़ों का उल्लेख किया जिनसे ऊन जैसा पदार्थ मिलता था और भारतीय उससे वस्त्र बनाते थे। आधुनिक संदर्भ में इसे कपास से जोड़ा जाता है।
पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास लिखे गए Periplus of the Erythraean Sea में पश्चिमी भारत के बंदरगाहों और व्यापारिक मार्गों का उल्लेख मिलता है। भरूच, जिसे उस समय Barygaza कहा जाता था, कपास और सूती वस्त्रों के व्यापार से जुड़ा था। समुद्र के रास्ते कपड़ा केवल एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाता था। उसके साथ भारतीय रंगाई, छपाई और बुनाई की पहचान भी जाती थी। गुजरात, कोरोमंडल तट और बंगाल आगे चलकर सूती वस्त्रों के बड़े केंद्र बने।
सत्रहवीं शताब्दी तक यूरोपीय व्यापारिक कंपनियां भारतीय सूती कपड़ों की बड़ी खरीदार बन चुकी थीं। भारतीय कपड़े यूरोप में लोकप्रिय थे, उनकी रंगाई, छपाई और डिजाइन वहां के ग्राहकों को पसंद आते थे। भारतीय कपड़ों की बढ़ती लोकप्रियता ने यूरोप के अपने वस्त्र उद्योग को परेशान किया। ब्रिटेन ने 1700 और 1721 में ऐसे कानून बनाए जिनका उद्देश्य भारतीय छपे कपड़ों के घरेलू उपयोग को सीमित करना था। लेकिन इसके बाद जिस परिवर्तन ने पूरी दुनिया के कपड़ा व्यापार को प्रभावित किया, वह मशीनों के आने से हुआ।
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन में कताई और बुनाई की मशीनों का विकास हुआ। लंकाशायर जैसे क्षेत्र तेजी से कपड़ा उत्पादन के बड़े केंद्र बन गए। हाथ से होने वाला काम मशीनों के सहारे बहुत बड़े पैमाने पर होने लगा। भारत पर इसका असर पड़ा। तैयार सूती कपड़ों का बड़ा निर्यातक रहा भारत धीरे-धीरे ब्रिटिश मिलों के लिए कच्ची कपास उपलब्ध कराने वाले देश में बदलने लगा। दूसरी ओर ब्रिटेन में बने मशीन से तैयार कपड़े भारत के बाजार में आने लगे।
इस बदलाव को केवल व्यापार की भाषा में समझना अधूरा होगा। इससे उन कारीगर परिवारों की आजीविका भी प्रभावित हुई जिनके घरों में पीढ़ियों से कताई और बुनाई होती चली आ रही थी। भारत के पारंपरिक वस्त्र उद्योग और ब्रिटेन के मशीन आधारित उद्योग के बीच मुकाबला बराबरी का नहीं था। 1861 से 1865 के अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारतीय कपास व्यापार को एक बार फिर प्रभावित किया। अमेरिका से ब्रिटेन को कपास की आपूर्ति रुकने पर भारतीय कपास की मांग बढ़ी और बंबई के कपास व्यापार में तेजी आई।
बीसवीं शताब्दी में कपास का धागा फिर भारत के सार्वजनिक जीवन में दिखाई दिया। 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में चले स्वदेशी आंदोलन ने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार को बल दिया। बाद में महात्मा गांधी ने चरखे और खादी को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया। चरखे का महत्व केवल इतना नहीं था कि उससे सूत काता जाता था। गांधी के लिए वह गांव, श्रम और स्वावलंबन से जुड़ा हुआ था। विदेशी कपड़े का बहिष्कार और घर में सूत कातना एक साथ चलने लगे। इस तरह कपास का वही रेशा, जो कभी समुद्र पार व्यापार की वस्तु बनकर गया था, अब अंग्रेजी शासन के विरुद्ध स्वदेशी का प्रतीक बन चुका था।
स्वतंत्रता के बाद कपास खेती और उद्योग के साथ सरकारी नीतियों का भी हिस्सा बनी। Cotton Corporation of India यानी CCI की स्थापना 31 जुलाई 1970 को हुई। बाद में कपास किसानों को कीमतों में गिरावट से बचाने के लिए मूल्य समर्थन अभियानों में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हुई।21 फरवरी 2000 को Technology Mission on Cotton शुरू किया गया। इसका उद्देश्य कपास की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाना, उत्पादन लागत कम करना और किसानों को बेहतर प्रतिफल दिलाना था।
आज भारत कपास के वैश्विक मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत के पास दुनिया में कपास का सबसे बड़ा खेती क्षेत्र है और उत्पादन तथा खपत में वह दूसरे स्थान पर है। दुनिया की चारों मान्य कपास प्रजातियों की खेती करने वाला भारत एकमात्र देश है।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
