हर किसी व्यक्ति का सपना, अपना घर होता है। जिसमें वह सुख शांति से निवास कर सके। जीवन की पूरी कमाई घर बनाने में निकल जाती है। अधिकांश के पास पक्के घर नहीं होते, ऐसे में प्रधानमंत्री आवास योजना उनके सपनों को साकार कर रही है। किसी सरकारी योजना की सफलता को समझने के लिए आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन कई बार कोई आंकड़ा इतना बड़ा हो जाता है कि उसकी विशालता अपने देश के संदर्भ में तुरंत समझ में नहीं आती। ऐसे में उसे किसी दूसरे देश के पैमाने पर रखकर देखना उपयोगी होता है।
भारत में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत पूर्ण हुए आवासों का आंकड़ा आज इसी स्तर पर पहुंच गया है। प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के अंतर्गत 3 अगस्त 2026 तक 3.12 करोड़ आवास पूरे हो चुके थे। इसके कुछ ही दिनों बाद, 9 अगस्त 2026 तक प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी और शहरी 2.0 के अंतर्गत एक करोड़ से अधिक आवास पूरे होकर लाभार्थियों को सौंपे जा चुके थे। दोनों आंकड़ों को जोड़ने पर 4.12 करोड़ से अधिक का आंकड़ा सामने आता है।
भारत की 140 करोड़ से अधिक आबादी को देखते हुए चार करोड़ का आंकड़ा पहली नजर में शायद उतना बड़ा न लगे। लेकिन यही संख्या जब दुनिया के दूसरे देशों की आबादी के साथ रखी जाती है तो इसका पैमाना समझ में आता है।
विश्व बैंक के 2025 के आंकड़ों के अनुसार पोलैंड की आबादी लगभग 3.64 करोड़ और ऑस्ट्रेलिया की लगभग 2.76 करोड़ है। अर्थात पूर्ण हुए आवासों की संख्या इन दोनों देशों की पूरी आबादी से अधिक है। कनाडा की आबादी लगभग 4.17 करोड़ है, जो 4.12 करोड़ से अधिक आवासों के आंकड़े के बेहद करीब है। अर्जेंटीना की आबादी लगभग 4.59 करोड़ है, इसलिए उससे आवासों की संख्या अधिक बताना सही नहीं होगा।
यहां एक बात समझना जरूरी है। आवासों की संख्या और किसी देश की आबादी एक जैसी इकाइयां नहीं हैं। एक आवास में एक से अधिक सदस्य रहते हैं। इसलिए 4.12 करोड़ आवासों का अर्थ 4.12 करोड़ लोगों को आवास मिलना नहीं है; लाभान्वित लोगों की संख्या इससे कहीं अधिक है। फिर भी यह तुलना कार्यक्रम के प्रशासनिक और निर्माण संबंधी पैमाने को समझने का एक सरल तरीका है, जिसमें केंद्र, राज्य, स्थानीय संस्थाओं, लाभार्थियों और निर्माण क्षेत्र की बड़ी भूमिका रहती है।
प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण की शुरुआत 2016 में हुई थी। इसका उद्देश्य पात्र ग्रामीण परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से युक्त पक्का आवास उपलब्ध कराना है। 3 अगस्त 2026 तक कुल 4.18 करोड़ आवासों का लक्ष्य आवंटित था, जिनमें 3.91 करोड़ स्वीकृत और 3.12 करोड़ पूरे हो चुके थे; शेष निर्माणाधीन थे।
ग्रामीण आवास की चुनौतियां अलग हैं: दूरदराज के गांवों तक निर्माण सामग्री पहुंचाना, स्थानीय जलवायु के अनुरूप निर्माण करना और डिजाइन तैयार करना। इसमें लाभार्थी स्वयं या अपनी देखरेख में निर्माण करता है, और राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार डिजाइन व सामग्री के विकल्प देने की व्यवस्था है।
योजना केवल पक्की छत तक सीमित नहीं है। जुलाई 2026 तक 3.08 करोड़ आवासों में शौचालय, 2.43 करोड़ में पानी के कनेक्शन, 3.07 करोड़ में बिजली और 2.90 करोड़ में एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध होने की जानकारी सरकार ने दी। लगभग 1.35 करोड़ लाभार्थी परिवार स्वयं सहायता समूहों से भी जुड़े थे।
गरीब ग्रामीण परिवार के लिए पक्का आवास केवल भवन नहीं, वर्षा, गर्मी और सर्दी से सुरक्षा है। वह स्थायित्व देता है और बच्चों के लिए बेहतर वातावरण उपलब्ध करा सकता है। सरकार के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत स्वीकृत आवास महिलाओं के नाम या संयुक्त स्वामित्व में हैं, जिससे महिलाओं के संपत्ति स्वामित्व को भी बढ़ावा मिला है।
शहरी भारत की चुनौती अलग है। प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी की शुरुआत 25 जून 2015 को हुई थी। बाद में 1 सितंबर 2024 से शहरी 2.0 शुरू किया गया, जिसके तहत पांच वर्षों में एक करोड़ अतिरिक्त पात्र शहरी परिवारों को किफायती आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।
9 अगस्त 2026 को सरकार ने बताया कि 1.25 करोड़ से अधिक आवास स्वीकृत हो चुके हैं और एक करोड़ से अधिक पूरे होकर लाभार्थियों को दिए जा चुके हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि शहरी आवास की समस्या जमीन की उपलब्धता, निर्माण लागत, आय और रोजगार के स्थान से भी जुड़ी है। स्वीकृत आवासों में से एक करोड़ महिलाओं के नाम या महिला मुखिया के नाम अथवा संयुक्त स्वामित्व में आवंटित किए गए।
केवल मकानों की संख्या से कहानी अधूरी रहेगी। आवास का वास्तविक अर्थ तब सामने आता है जब उसके साथ पानी, बिजली, शौचालय, रसोई ईंधन, सड़क, परिवहन, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधा और रोजगार तक पहुंच भी जुड़ती है। इसलिए उपलब्धि का महत्व इस बात में भी है कि कितने परिवारों के पास अब अधिक सुरक्षित आवासीय आधार है।
पोलैंड, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा से यह तुलना उस संख्या का पैमाना समझाने के लिए है। यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। जुलाई 2026 में सरकार ने बताया था कि योजना के दूसरे चरण में मार्च 2029 तक अतिरिक्त दो करोड़ ग्रामीण आवासों के निर्माण का प्रावधान है। आगे की चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि पात्र परिवारों तक सहायता पहुंचे, निर्माण समय पर पूरा हो, आवास गुणवत्तापूर्ण हों और आवश्यक बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध हों।
अपना पक्का आवास चार दीवारों से कहीं अधिक है। उसमें सुरक्षा है, बच्चों का भविष्य है, परिवार की इज्जत है और संपत्ति का आधार भी है। गांव में यह मौसम से सुरक्षा का माध्यम बन सकता है, तो शहर में किराये और अस्थिर आवासीय जीवन से स्थायित्व की ओर बढ़ने का अवसर।
चार करोड़ से अधिक आवासों का निर्माण इसी बड़े परिवर्तन का संकेत है। लेकिन इस आंकड़े की वास्तविक कहानी उन परिवारों के जीवन में दिखती है जिनके लिए पक्की छत कभी एक सपना थी। अब अगली कसौटी केवल यह नहीं होगी कि कितने आवास बने, बल्कि यह होगी कि इन आवासों ने कितने परिवारों के जीवन को अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थिर बनाया।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
