संघर्ष की अग्नि में तपा हुआ कलाकार यशवंत लोहार याने नाना पाटेकर

मैंने जीवन में अधिक फ़िल्में नहीं देखी हैं, लेकिन फिल्म यशवंत मैंने देखी थी। उसमें नाना पाटेकर ने पुलिस अधिकारी यशवंत लोहार की भूमिका निभाई थी। फिल्म देखते हुए नाना पाटेकर से पहले मेरा ध्यान उसके नाम पर गया था यशवंत लोहार। लोहार कोई सजाया-संवारा हुआ फिल्मी उपनाम नहीं था। उसमें एक पूरा पेशा था, पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर था और अपने काम पर गर्व करने वाले आदमी की पहचान थी। छाती पर लगी नेमप्लेट पर जब “लोहार” लिखा दिखाई देता है तो लगता है जैसे उस आदमी को अपने पुलिस अधिकारी होने के साथ परम्परागत पेशे पर भी गर्व था। लोहार यानी आग में तपकर लोहा गढ़ने वाला आदमी, जिसकी हथौड़े की चोट से लोहे का आकार बदल जाता है। नाना पाटेकर के अभिनय को याद करता हूं तो कई बार लगता है कि उन्होंने भी अपने पात्रों को इसी तरह भीतर से तपाकर गढ़ा था।

प्रहार से शुरू करके नाना पाटेकर की मैंने कई फिल्में देखीं, लेकिन मेरे मन में यशवंत का यशवंत लोहार ही सबसे अधिक समय तक बना रहा। शायद इसलिए कि उसमें मुझे अभिनय कम और आम आदमी अधिक दिखाई दिया था। वह पुलिस अधिकारी होने का प्रदर्शन नहीं करता था, वह पुलिस अधिकारी था। उसके बोलने, चलने, घर में रहने और अपनी नौकरी के प्रति रवैये में किसी फिल्मी नायक का बनावटीपन नहीं था। वह अपने पेशे के साथ खड़ा हुआ एक वास्तविक आदमी लगता था।

आज 8 अक्टूबर 2026 को नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं। 75 वर्ष की उम्र में गोवा स्थित उनके घर पर हृदयाघात के बाद उनका निधन हुआ। नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ एप्लाइड आर्ट्स में उन्होंने पढ़ाई की। फिल्मों की चमक-दमक में आने से पहले का उनका जीवन किसी खानदानी अभिनेता का जीवन नहीं था। उन्होंने सिनेमा के पोस्टर बनाए, कमर्शियल आर्टिस्ट और विजुअलाइजर के रूप में काम किया और इसी दौरान रंगमंच से जुड़ गए। विजय तेंदुलकर के नाटक पाहिजे जातीचे और दूसरे मराठी नाटकों में काम करते हुए उनके भीतर का अभिनेता धीरे-धीरे सामने आया।

यानी जिस चेहरे को बाद में करोड़ों दर्शकों ने बड़े पर्दे पर देखा, वह चेहरा पहले रंगमंच की रोशनी में तप चुका था। सिनेमा में उनकी शुरुआत गमन से 1978 में हुई। शुरुआती वर्षों में उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों में छोटी-बड़ी भूमिकाएं कीं। अंकुश, प्रतिघात, सलाम बॉम्बे! जैसी फिल्मों ने उन्हें धीरे-धीरे पहचान दी और परिंदा ने उन्हें उस मुकाम तक पहुंचाया जहां नाना पाटेकर नाम अपने आप में अभिनय की एक पहचान बनने लगा। परिंदा के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

इसके बाद नाना के लिए भूमिकाओं की दुनिया खुलती चली गई। प्रहार, अंगार, तिरंगा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, खामोशी, अब तक छप्पन, अपहरण, वेलकम, राजनीति और नटसम्राट जैसी फिल्मों में उन्होंने एक-दूसरे से बिल्कुल अलग पात्र निभाए। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले और 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। क्रांतिवीर के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, जबकि परिंदा और अग्निसाक्षी के लिए सहायक अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले।

लेकिन नाना पाटेकर को पुरस्कारों से समझना ठीक नहीं, उन्हें समझने के लिए उन पात्रों को याद करना पड़ेगा,उनके अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे अभिनय नहीं करते थे, पात्र को जीते थे। उनके पात्रों में अभिनेता दिखाई नहीं देता था और शायद इसी कारण दर्शक नाना पाटेकर को देखते हुए कई बार नाना पाटेकर को भूल जाता था।

प्रहार का मेजर चौहान सामने आता है तो लगता है कि सामने कोई प्रशिक्षित सैनिक है। परिंदा का अन्ना अपराध की दुनिया का अपना आदमी लगता है। क्रांतिवीर का प्रताप नारायण तिलक केवल गुस्सैल आदमी नहीं, बल्कि अपने आसपास की राजनीति और व्यवस्था से सवाल करने वाला आदमी दिखाई देता है। अब तक छप्पन का साधु आगाशे पुलिस की वर्दी पहने कोई फिल्मी पात्र नहीं लगता। नटसम्राट का गणपत बेलवलकर आते-आते वही अभिनेता इतना बदल जाता है कि उसकी आवाज के साथ उसकी चुप्पी भी अभिनय करने लगती है।

नाना की आवाज उनकी पहचान जरूर थी, लेकिन उनका अभिनय केवल आवाज पर टिका हुआ नहीं था। खामोशी: द म्यूजिकल में उन्होंने ऐसे पिता की भूमिका निभाई जो न सुन सकता था, न बोल सकता था। जिस अभिनेता की आवाज को दर्शक उसकी सबसे बड़ी ताकत मानते थे, उसी अभिनेता ने वहां बिना संवाद के दर्शकों को अपने साथ जोड़े रखा। चेहरे, हाथों और आंखों से उन्होंने वह सब कहा जिसे दूसरे कलाकार संवादों से कहते हैं। यह उनके अभिनय की सीमा नहीं, उसकी व्यापकता थी।

नाना पाटेकर के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था, जिसे उनके अभिनय से अलग करके नहीं देखा जा सकता। वे स्पष्ट वक्ता थे। मन में एक बात और मुंह पर दूसरी बात रखने वाले लोगों में उन्हें नहीं रखा जा सकता। जो सही लगा, कह दिया और जो गलत लगा, उस पर सवाल उठा दिया। इस स्वभाव ने उन्हें कई बार विवादों में भी डाला, लेकिन दर्शकों के बीच उनकी एक अलग छवि बनी कि यह आदमी अपनी बात किसी और की सुविधा के अनुसार नहीं बदलता।

उनका राष्ट्रबोध भी इसी स्वभाव का हिस्सा था। देश, सैनिक और किसान उनके लिए केवल फिल्मों के विषय नहीं थे। 1999 के कारगिल युद्ध के समय वे सेना के साथ रहे और सैनिकों के जीवन को करीब से देखा। बाद में भी वे जवानों के बीच जाते रहे और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते रहे। किसानों के लिए उनका काम भी किसी मंच पर भाषण देने तक सीमित नहीं था। मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने नाम फाउंडेशन के माध्यम से किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम किया। सूखा, पानी, खेती और किसान आत्महत्या जैसे प्रश्नों को उन्होंने सार्वजनिक रूप से उठाया। किसान उनके लिए किसी फिल्म की कहानी का पात्र नहीं था, वह वास्तविक आदमी था जिसकी समस्या पर बात की जानी चाहिए।

नाना के राष्ट्रवाद की अपनी भाषा थी। उसमें देश के प्रति लगाव था, सैनिक के प्रति सम्मान था और सामान्य आदमी के प्रति चिंता थी। वे इस विषय पर सीधे बोलते थे। सांप्रदायिकता के प्रश्न पर भी उन्होंने यह बात कही थी कि पहले देश होना चाहिए और हिंदू-मुसलमान का भेद उसके बाद। उनकी अपनी पारिवारिक परिस्थिति का उदाहरण भी इस संदर्भ में सामने आया था। विचारों से कोई सहमत हो या असहमत, लेकिन नाना पाटेकर ने सार्वजनिक जीवन में अपनी बात को सुविधानुसार बदलने की कोशिश नहीं की।

यही वह नाना पाटेकर थे जिन्हें दर्शक फिल्मों में देखते थे और फिल्मों के बाहर भी सुनते थे। अभिनेता और व्यक्ति के बीच उन्होंने कोई बहुत ऊंची दीवार नहीं खड़ी की। दर्शकों को उनमें चाकलेटी नायक नहीं, अपने आसपास का आदमी दिखाई देता था। चेहरा कभी-कभी खुरदुरा था, आवाज में मिठास के बजाय धार थी और संवाद बोलने का ढंग भी परंपरागत फिल्मी नायक जैसा नहीं था। फिर भी दर्शक उनसे जुड़ता था, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह आदमी बनावटी नहीं है। वह गुस्सा करता है, हंसता है, गलती करता है, सवाल करता है और जरूरत पड़ने पर सामने खड़े आदमी से दो टूक बात भी करता है।

इसीलिए मुझे आज भी यशवंत का यशवंत लोहार याद आता है। वह नाना पाटेकर जैसा दिखाई नहीं देता था, नाना पाटेकर की तरह बोलता हुआ भी नहीं लगता था। वह बस यशवंत लोहार था, अपने पेशे, अपनी नौकरी और अपने जीवन के साथ खड़ा एक ऐसा आदमी जिसे देखकर लगता था कि यह आदमी हमारे आसपास कहीं सचमुच मौजूद है। नाना पाटेकर को याद करने की इससे बड़ी वजह शायद दूसरी नहीं हो सकती कि उन्होंने पात्र को इतना अपना बना दिया कि अभिनेता पीछे छूट गया और आदमी सामने रह गया। मेरे लिए वह आदमी आज भी यशवंत लोहार है। विनम्र श्रद्धांजलि।

आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

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