चुनाव आयोग और जनविश्वास : संवैधानिक स्वायत्तता की कसौटी पर लोकतंत्र

पिछले दिनों एक अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र की एक रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति में विवाद खड़ा हो गया जिसमे यह दावा किया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कई निर्णयों से दो अन्य चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने असहमति जताई थी और दोनों चुनाव आयुक्तों ने इसकी शिकायत मुख्य सचिव से भी की थी l इसके बाद देश के कई राजनीतिक जानकारो और विशेषज्ञों ने चुनाव आयोग की इस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बताया l हालाकि इसके पश्चात चुनाव आयोग ने एक बैठक और प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से स्पष्ट कर दिया कि मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जो भी फैसले लिए गए थे वह आम सहमति से लिए गए थे इससे स्पष्ट हो गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कथित तौर पर आपत्ति जताए जाने वाली बात सरासर गलत थी l इस स्पष्टीकरण के पश्चात संवैधानिक तौर पर यह विवाद ख़त्म हो जाना चाहिए l

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(1) के तहत संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिये निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और निर्वाचन के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण भारत निर्वाचन आयोग में निहित है।यह केंद्रीकृत अधिकार पूरी निर्वाचन प्रक्रिया के प्रबंधन में स्वायत्तता सुनिश्चित करता है। अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्त (ECs) शामिल होते हैं, जिनकी संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।

राष्ट्रपति द्वारा की गई उनकी नियुक्ति, जो संसदीय कानून के अधीन होती है, इस निकाय को संवैधानिक मान्यता प्रदान करती है और साथ ही वैधानिक नियंत्रण की व्यवस्था भी सुनिश्चित करती है।अनुच्छेद 324(3) के अनुसार, जब अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की जाती है, तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) भारत का निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं। यह व्यवस्था प्रशासनिक नेतृत्व सुनिश्चित करती है साथ ही सामूहिक निर्णय-निर्माण संरचना को भी बनाए रखती है।

ऐतिहासिक रूप से संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (EC) की नियुक्ति के लिये कोई विशिष्ट विधायी प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई थी, जिससे यह कार्य कार्यपालिका पर निर्भर रहा (राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर)।वर्ष 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ के मामले में देश की शीर्ष अदालत ने निर्णय दिया कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक नियुक्तियाँ एक कोलेजियम, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल हों, के माध्यम से की जानी चाहिये, ताकि निकाय को कार्यपालिका के पक्षपात से सुरक्षित रखा जा सके।

इसके बाद संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित किया, जिसमें चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया।आलोचक यह तर्क देते हैं कि इससे चयन प्रक्रिया में कार्यपालिका को 2:1 का बहुमत प्राप्त हो जाता है, जिससे संस्थागत तटस्थता से समझौता होने की आशंका उत्पन्न होती है।

चुनाव आयोग में विरोधाभास और असहमति का देश में एक लंबा इतिहास रहा है l वर्ष 1989 में मुख्य चुनाव आयुक्त आरवींएस पैरी शास्त्री ने दो नए आयुक्त की नियुक्ति का विरोध किया था l उसके बाद टी एन शेषन ने संसद से पारित कानून को चुनौती देते हुए अन्य दो आयुक्त को काम करने की इजाजत नहीं दी थी l इसके पश्चात शेषन के विरोध को दरकिनार करते हुए देश की शीर्ष अदालत ने तीनों चुनाव आयुक्त को बराबरी का संवैधानिक दर्जा देने का फैसला किया लेकिन तीन सदस्य आयोग में आंतरिक विरोधाभास का सिलसिला लगातार जारी रहा वर्ष 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त गोपाल स्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ राजनीतिक जुड़ाव की शिकायत की थी लेकिन हटाने के बजाय चावला को अगला मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया गया l

चुनाव आयोग का एक प्रमुख कार्य देश के हर योग्य मतदाता को वोट देने के लिए अधिकृत करना और अयोग्य मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाना भी है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि मौजूदा मतदाता सूचियों में अनेक ऐसे नाम हैं, जो या तो कहीं स्थानांतरित हो चुके हैं या फिर जिनका निधन हो चुका है। इसी तरह तमाम नामों का दोहराव भी है। मतदाता सूचियों में अनेक नाम घुसपैठियों के भी हैं। यह एक तथ्य है कि पिछले दशकों में देश में बड़े पैमाने पर घुसपैठ हुई है और घुसपैठियों ने छल-छद्म से आधार एवं अन्य दस्तावेजों के अलावा मतदाता पहचान पत्र भी हासिल कर लिए हैं। देश के सीमांत राज्यों में ऐसा अधिक हुआ है और इसका कारण यह है कि इन राज्यों के राजनीतिक दलों ने घुसपैठियों को मतदाता बनाने का काम जानबूझकर किया है, ताकि चुनावी लाभ हासिल किया जा सके।

सिर्फ भारत के नागरिकों का नाम ही मतदाता सूची में शामिल किया जा सकता है इसे सुनिश्चित करने के लिए सिलसिलेवार तरीके से राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया हो रही है बिहार राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को मंजूरी दी थी तब चीफ जस्टिस श्री सूर्यकांत ने कहा था कि बिहार के अनुभव से सबक लेकर एसआईआर की प्रक्रिया को सरल और अधिक व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता है परंतु 13 करोड लोगों के नाम वोटर लिस्ट से बाहर होने के कारण बढ़ रहे विवाद और आक्रोश का समाधान भी उतना ही जरूरी है l 99% से अधिक नोटिस नाम ,उम्र और मैपिंग में गड़बड़ी के कारण जारी हुए हैं इससे साफ है कि यह लोग घुसपैठिये तो नहीं है उन्हें तकनीकी कारणों से बेवजह परेशानी का सामना करना पड़ रहा है इसका समाधान भी आवश्यक है l

नए मतदाताओं को शामिल करने वाले फॉर्म 6 के साथ जुड़े घोषणा पत्र को उच्चतम न्यायालय ने अनुमोदित कर दिया है लेकिन बेवजह उत्पीड़न से चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों का विश्वास कम हो सकता है और इससे अंततः नुकसान लोकतंत्र का ही होगा l मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए यदि राज्यों में विवाद और मुकदमेबाजी बढ़ती है तो लोगों का चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर हो सकता है इस बात का सदैव ध्यान रखा जाए की मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया आसान हो l

भारत में जब भी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और उसकी स्वतंत्रता की बात की जाती है तो पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को याद किया जाता है, शेषन दिसंबर 1990 से दिसंबर 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे थे l शेषन ने कहा था कि चुनाव आयोग भारत का होता है, न कि भारत सरकार का,भारत में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जब भी सवाल उठता है तो शेषन की यह टिप्पणी चर्चा में आ जाती है l जस्टिस दीपंकर दत्ता ने इस बार इस बात पर जोर दिया की चुनाव आयोग स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए l चुनाव आयोग न केवल संवैधानिक संस्था है बल्कि वह एक स्वतंत्र संस्था भी है इस विवाद से सबक लेकर हमें संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है l परंतु यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस तरह के बेतुके विवाद संवैधानिक संस्थाओं की छवि को न केवल धूमिल करते है बल्कि लोकतंत्र पर जनता के विश्वास को भी कमजोर करते है , आवश्यक है कि इस तरह के विवाद को अब खत्म किया जाना चाहिए l

डॉ भूपेंद्र करवंदे
सहायक प्राध्यापक विधि
शा जे योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय रायपुर

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