राजमहल झरोंखों से बाहर देखने पर दुनिया कुछ और दिखाई देती है। दूर तक फैली संपत्ति, सम्मान में झुकते लोग और जीवन की ऐसी व्यवस्था, जिसमें बहुत-सी चीजें अपने आप मिल जाती हैं। लेकिन भारत की आजादी के बाद राजमहलों के बाहर की दुनिया तेजी से बदल रही थी। जिन महलों में कभी राजसिंहासन था, उन्हें अब मतपेटी और जनता के निर्णय के सामने खड़ा होना था। विजयाराजे सिंधिया का जीवन इसी बदलते भारत की कहानी है।
12 अक्टूबर 1919 को सागर में जन्मी विजयाराजे सिंधिया विवाह के बाद ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार में आईं। 21 फरवरी 1941 को उनका विवाह ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया से हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में देश की राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही थीं और रियासतों की पुरानी व्यवस्था भी समाप्ति की ओर बढ़ रही थी। 1961 में जीवाजीराव के निधन के बाद विजयाराजे की पहचान राजमाता के रूप में अधिक प्रमुख हुई, लेकिन उनका जीवन राजसी औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रहा।
स्वतंत्र भारत में राजपरिवारों के सामने नई परिस्थितियां थीं। सत्ता का केंद्र राजमहलों से लोकतांत्रिक संस्थाओं की ओर जा रहा था। विजयाराजे ने राजनीति का रास्ता चुना। 1957 में उन्होंने गुना से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लोकसभा का चुनाव जीता। 1962 में वे ग्वालियर से फिर कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचीं। उनके राजनीति में प्रवेश को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आग्रह से भी जोड़कर देखा जाता है।
लेकिन कांग्रेस के साथ उनका राजनीतिक सफर लंबा नहीं चला। 1960 के दशक के मध्य में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के साथ उनके मतभेद गहराए। 1967 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और विपक्ष की राजनीति में उतर गईं।
1967 का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ था। उन्होंने गुना लोकसभा सीट से स्वतंत्र पार्टी और करैरा विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ा। दोनों चुनावों में जीतने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी और मध्यप्रदेश विधानसभा में विपक्ष की नेता बनीं। यह केवल कांग्रेस से अलग होने का प्रसंग नहीं था। इसके साथ वे उस विपक्षी राजनीति का हिस्सा बनीं, जो कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती दे रही थी।
1971 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भिंड से भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की। उसी चुनाव में उनके पुत्र माधवराव सिंधिया गुना से जनसंघ के टिकट पर निर्वाचित हुए और अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर से जीते। आगे चलकर विजयाराजे सिंधिया जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख नेताओं में शामिल हुईं। 1973 में वे जनसंघ की उपाध्यक्ष बनीं। 1980 में भाजपा के गठन के समय भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
राजनीति के साथ शिक्षा और सामाजिक कार्यों में उनकी रुचि बनी रही। ग्वालियर का सिंधिया कन्या विद्यालय इसका प्रमुख उदाहरण है। 1956 में स्थापित इस विद्यालय का उद्घाटन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था। विद्यालय के इतिहास में विजयाराजे को इसकी संस्थापक बताया गया है। लड़कियों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में यह उनकी महत्त्वपूर्ण पहल थी। वे ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस की ग्वालियर शाखा से भी लंबे समय तक जुड़ी रहीं। संसद के आधिकारिक परिचय में बच्चों के कल्याण और महिला शिक्षा के क्षेत्र में उनके कार्यों का उल्लेख मिलता है।
1975 में आपातकाल लगा तो विपक्ष के अनेक नेताओं के साथ विजयाराजे सिंधिया भी गिरफ्तार हुईं। उन्हें तिहाड़ जेल में रखा गया। राजपरिवार की सदस्य होने के बावजूद उन्हें राजनीतिक विरोधी के रूप में जेल में रहना पड़ा। जेल से अपनी बेटियों को लिखे उनके पत्र भी चर्चित हुए। इस दौर ने उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष सामने रखा, जो राजमहल की पारंपरिक छवि से अलग था।
आपातकाल के बाद विजयाराजे और उनके पुत्र माधवराव सिंधिया के राजनीतिक रास्ते अलग हो गए। 1980 में विजयाराजे ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के विरुद्ध चुनाव लड़ा। वे जनता पार्टी की उम्मीदवार थीं। इस चुनाव में इंदिरा गांधी को 2,23,903 और विजयाराजे को 50,249 वोट मिले। वे बड़े अंतर से पराजित हुईं, लेकिन प्रधानमंत्री के विरुद्ध चुनाव लड़ना उनके राजनीतिक जीवन का उल्लेखनीय प्रसंग रहा।
1989 में वे भाजपा उम्मीदवार के रूप में गुना से लोकसभा पहुंचीं। 1991, 1996 और 1998 में भी उन्होंने इसी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। संसद के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार वे 1957 से 1967, 1971 से 1977 और 1989 से 1999 तक लोकसभा की सदस्य रहीं। इसके अतिरिक्त, वे 1978 से 1989 तक राज्यसभा में भी रहीं। 1999 उनके अंतिम लोकसभा कार्यकाल का समापन वर्ष था।
उनकी लेखकीय रुचि भी उल्लेखनीय थी। संसद के अभिलेखों में उनकी पुस्तकों The Last Maharani of Gwalior और राजपथ से लोकपथ का उल्लेख मिलता है। दूसरी पुस्तक का शीर्षक उनके जीवन की दिशा को व्यक्त करता है। राजपथ उन्हें विवाह के बाद मिला था, लेकिन लोकपथ पर अपनी पहचान बनाने के लिए उन्हें चुनाव, संगठन और राजनीतिक संघर्षों से गुजरना पड़ा।
25 जनवरी 2001 को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ। उन्हें केवल ग्वालियर की राजमाता कहकर याद करना उनके जीवन का अधूरा परिचय होगा। उन्होंने कांग्रेस से शुरुआत की, विपक्ष की राजनीति में अपनी जगह बनाई, जनसंघ और भाजपा के संगठन में काम किया, महिला शिक्षा के लिए योगदान दिया और आपातकाल में जेल भी गईं।
उनके पास राजमहल की विरासत थी, लेकिन जनपथ की पहचान विरासत में नहीं मिली। उसके लिए उन्हें राजनीति में उतरना पड़ा, चुनाव लड़ना पड़ा, विरोध सहना पड़ा और अपने विचारों के पक्ष में खड़ा होना पड़ा। ‘राजमहल से जनपथ तक’ उस महिला की यात्रा है, जिसने राजसी पृष्ठभूमि से निकलकर स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
