आधुनिक भौतिक युग में मनुष्य ने बाहर की दुनिया को साधा, लेकिन धीरे धीरे अपने से दूर होता गया। सुविधा बढ़ी, साधन बढ़े, गति बढ़ी, लेकिन मन की शांति उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। आज आदमी के पास सूचना है, मनोरंजन है, धन कमाने के असंख्य रास्ते हैं, दुनिया से जुड़े रहने के साधन हैं, फिर भी चिंता, अकेलापन, असंतोष और मानसिक थकान बढ़ती दिखाई देती है। आज मानसिक स्वास्थ्य की चिंता का उत्तर आधुनिक चिकित्सा में दिखाई नहीं देता, इसका मार्ग हमारी अपनी प्राचीन परम्परागत जीवन शैली में दिखाई देता है।
सनातन भारतीय दर्शन मनुष्य को केवल शरीर नहीं मानता। उसके लिए मनुष्य शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित रूप है। इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल अधिक पाना नहीं, बल्कि अपने भीतर संतुलन स्थापित करना भी है। ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले जिस जीवन पद्धति की रचना की, उसमें आहार, निद्रा, संयम, श्रम, अध्ययन, साधना, परिवार, समाज और प्रकृति, सबके लिए स्थान था। आज हमारी परेशानी का एक बड़ा कारण यही है कि हमने जीवन के साधनों को तो बचाए रखा, लेकिन जीवन को साधने की पद्धति को छोड़ दिया।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥” अर्थात योग में स्थित होकर कर्म करो, आसक्ति छोड़कर सफलता और असफलता में समान भाव रखो; यही समत्व योग कहलाता है। यह केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं, मानसिक संतुलन का अत्यंत व्यावहारिक सूत्र है। आज की अशांति का एक कारण परिणाम से अत्यधिक चाह होना है। सफलता मिली तो हम प्रसन्न, असफल हुए तो टूट गए। प्रशंसा मिली तो आत्मविश्वास बढ़ा, आलोचना हुई तो मन उदास हो गया। ऋषि परंपरा कहती है कि कर्म हमारे हाथ में है, परिणाम पर अधिकार नहीं। यह दृष्टि मन को परिणाम के उतार चढ़ाव से बचाती है।
गीता का एक और वचन है, “उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥” अर्थात मनुष्य स्वयं अपने को ऊपर उठाए, स्वयं को नीचे न गिराए; मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु। व्यक्ति के विचारों, आदतों और व्यवहार की भूमिका महत्वपूर्ण है। भारतीय ऋषि इसे बहुत पहले समझ चुके थे। मन को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो वही चिंता, भय, ईर्ष्या और मोह का कारण बनता है; साध लिया जाए तो वही मनुष्य का सबसे बड़ा सहायक बन सकता है।
पतंजलि योगसूत्र में योग की परिभाषा है, “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।” अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। इसका अर्थ विचारों को जबरिया समाप्त करना नहीं, बल्कि मन की चंचलता पर संयम स्थापित करना है। आज मन सुबह उठते ही सूचनाओं और संदेशों से भर जाता है, दिनभर एक विषय से दूसरे विषय पर दौड़ता है और रात को भी शांत नहीं होता। योग इस भागती हुई वृत्ति को विराम देने की साधना है। आसन शरीर को, प्राणायाम श्वास को और ध्यान मन को अनुशासन में लाने का अभ्यास है।
भारतीय जीवन पद्धति में यज्ञ का स्थान भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि अपने से बड़े संसार के प्रति दायित्व स्वीकार करना है। जब मनुष्य केवल अपने सुख के लिए जीता है तो इच्छाओं का अंत नहीं होता। यज्ञ उसे देने की संस्कृति सिखाता है। परिवार के लिए समय देना, समाज के लिए कुछ करना, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना और अपने अर्जन में दूसरों का भी हिस्सा समझना यज्ञ भावना का विस्तार है। आज जब अकेलापन बढ़ रहा है, तब प्राचीन ज्ञान मनुष्य को “मैं” से “हम” की ओर ले जाता है।
ईशावास्योपनिषद कहता है, “ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥” अर्थात इस जगत में जो कुछ है, वह ईश्वर से व्याप्त है; त्याग भाव से उसका उपभोग करो और किसी दूसरे के धन के प्रति लोभ मत करो। यह मंत्र उपभोग का विरोध नहीं करता, बल्कि उसमें संयम और त्याग की भावना रखता है। आधुनिक जीवन का संकट केवल वस्तुओं की अधिकता नहीं, बल्कि अधिक पाने की कभी समाप्त न होने वाली इच्छा है। इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा सामने खड़ी हो जाती है। संतोष का अभ्यास इसी अंतहीन दौड़ को विराम दे सकता है।
स्वाध्याय इस जीवन पद्धति का महत्वपूर्ण आधार है। तैत्तिरीय उपनिषद में गुरु शिष्य से कहते हैं, “सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।” अर्थात सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो और स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। यहां स्वाध्याय केवल पुस्तक पढ़ना नहीं है। श्रेष्ठ ग्रंथों का अध्ययन उसके साथ स्वयं का अध्ययन भी है। आज हम दूसरों के जीवन को देखने में घंटों लगाते हैं, लेकिन अपने मन को देखने के लिए कुछ मिनट नहीं निकालते। दिन के अंत में स्वयं से पूछना कि आज मैंने क्या सोचा, किस बात पर क्रोधित हुआ, किससे ईर्ष्या हुई, किसका मन दुखाया और क्या अच्छा किया, आत्मपरीक्षण की शुरुआत है।
तैत्तिरीय उपनिषद की यही शिक्षा आगे कहती है, “मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।” अर्थात माता, पिता, आचार्य और अतिथि के प्रति देवतुल्य सम्मान का भाव रखो। यह केवल संस्कार नहीं, संबंधों के प्रति उत्तरदायित्व की शिक्षा है। आज मानसिक परेशानी का एक बड़ा कारण संबंधों का कमजोर होना है। परिवार साथ रहते हुए भी अलग अलग दुनिया में जी रहा है। बुजुर्ग अकेले हैं, बच्चे दबाव में हैं और युवा अपनी चिंता में घिरे हैं। भारतीय दर्शन ने परिवार को केवल रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक सहारे की व्यवस्था माना था।
मानसिक स्वास्थ्य के संकट में भारतीय जीवन दर्शन के कुछ उपाय आधुनिक जीवन में फिर से अपनाए जा सकते हैं। सुबह की शुरुआत प्रार्थना, सूर्योपासना, योग या प्राणायाम से हो सकती है। दिन में कुछ समय बिना मोबाइल के परिवार के साथ बिताया जा सकता है। संबंधों में संवाद। प्रतिदिन स्वाध्याय और आत्मपरीक्षण की आदत बनाई जा सकती है। ये अभ्यास मन को दिशा दे सकते हैं।
हर मानसिक बीमारी का कारण सनातन जीवन पद्धति से दूर होना है, मानसिक रोग के उपचार में योग, यज्ञ, स्वाध्याय और आयुर्वेद पद्धति से कुपथ्य का त्याग एवं पथ्य का सेवन महत्वपूर्ण है। मानसिक रोगों के जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण भी होते हैं और आवश्यकता होने पर चिकित्सक तथा मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लेनी ही चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उपचार के साथ जीवन को ऐसा बनाया जाए जिसमें मन को बार बार विचलित करने वाले कारण कम हों।
ऋषियों ने मनुष्य को संसार से भागने का मार्ग नहीं दिखाया था। उन्होंने संसार में रहते हुए संयमित, कर्तव्यनिष्ठ और आत्मजाग्रत जीवन जीने की दिशा दिखाई। गीता का समत्व, पतंजलि का योग, उपनिषदों का स्वाध्याय, यज्ञ की भावना और परिवार के प्रति कर्तव्य, सब मिलकर जीवन को एक आधार देते हैं। हमने जब इस आधार को छोड़कर जीवन को केवल उपभोग, प्रतिस्पर्धा और उपलब्धि से मापना शुरू किया, तब मन के सामने भी बोझ बढ़ता गया।
आज जरूरत आधुनिकता को छोड़ने की नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन में सनातन जीवन दर्शन को फिर से समाहित करने की है। मोबाइल रहे, लेकिन मौन भी रहे। धन हो, लेकिन संतोष भी हो। काम हो, लेकिन विश्राम भी हो। संबंध हों, तो उनमें संवाद भी हो। ज्ञान मिले, तो आत्मज्ञान की खोज भी हो। मनुष्य बाहर की दुनिया को जितना साधता है, उतना ही अपने भीतर उतरना भी सीखे। मानसिक स्वास्थ्य की सबसे गहरी कुंजी यही है कि जीवन केवल बाहर से सुविधाजनक न बने, भीतर से भी संतुलित हो।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
