पितृपक्ष की समाप्ति पर सर्वपितृ अमावस्या के अगले दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र शुरू होता है। घर और मंदिरों में देवी के नौ रूपों की पूजा होती है। इस पूजा की शुरुआत जिस प्रक्रिया से होती है, वह धार्मिक होने के साथ कृषि परंपरा से भी जुड़ी हुई है। पूजा स्थल पर जौ या दूसरे अन्न के बीज बोए जाते हैं और बीच में जल से भरा कलश स्थापित होता है। इसे जंवारा, जवारा या जयी बोना कहते हैं।
शास्त्रीय परंपरा में वर्ष में चार नवरात्रियां मानी गई हैं: चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ। आषाढ़ और माघ की नवरात्रियां गुप्त नवरात्र कहलाती हैं और साधना व उपासना तक सीमित रहती हैं। चैत्र और आश्विन की नवरात्रियां सार्वजनिक रूप से मनाई जाती हैं। दोनों में घटस्थापना होती है, देवी के गीत गाए जाते हैं और जंवारा बोया जाता है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के बड़े हिस्से में जसगीत और जवारा गीत इस पर्व की पहचान हैं। गुजरात में छिद्रों वाले मिट्टी के घड़े गरबो में दीप जलता है और माता के स्थान पर जौ बोया जाता है। महाराष्ट्र में घटस्थापना के साथ नौ दिन तक अन्न की क्यारी रखी जाती है। नेपाल में दशैं पर जमरा बोया जाता है और विजयादशमी के दिन बड़े बुजुर्ग इसे आशीर्वाद के रूप में माथे और सिर पर लगाते हैं।
जौ भारत की पुरानी फसलों में से एक है। वैदिक साहित्य में इसे यव कहा गया है और यज्ञ की सामग्री में इसका स्थान रहा है। पुरातात्विक खुदाइयों में सिंधु सभ्यता के स्थलों से भी जौ और गेहूं के अवशेष मिले हैं। इसका अर्थ है कि अनाज के रूप में जौ का इतिहास बहुत पुराना है। जौ कम पानी और कम उपजाऊ मिट्टी में भी हो जाता है, ठंडे मौसम में जल्दी उगता है और अपेक्षाकृत कम समय में अंकुर देता है। नवरात्र जैसे मौके पर, जब नौ दिन में परिणाम दिखना जरूरी है, जौ इसीलिए सबसे सुविधाजनक बीज साबित होता है।
कई क्षेत्रों में पांच या सात प्रकार के अन्न बोने का विधान है। सप्तधान्य की सूचियों में सामान्यतः जौ, तिल, धान, मूंग, कंगनी, चना और गेहूं गिने जाते हैं। नवग्रह पूजा में नवधान्य की परंपरा भी है। जहां जो फसल उपलब्ध थी, उसी का उपयोग किया गय। दोनों नवरात्रियां खेती के दो मौसमों की संधि पर पड़ती हैं। बुआई से पहले बीज की जांच खेती का पुराना और जरूरी चरण है। आज भी बीज अंकुरण का परीक्षण होता है, जिसमें सौ बीजों में से कितने अंकुरित हुए, यह गिना जाता है। हर फसल के प्रमाणित बीज के लिए न्यूनतम अंकुरण प्रतिशत तय रहता है।
जंवारा उगाने के लिए चार चीजें चाहिए, पानी, उपयुक्त तापमान, हवा और स्वस्थ बीज। जौ और गेहूं जैसे रबी अनाज के लिए सामान्यतः पंद्रह से पच्चीस डिग्री का तापमान अनुकूल रहता है। इसलिए अक्टूबर की हल्की ठंडक वाली सुबहें इनके लिए ठीक बैठती हैं।
अलग अलग अन्न एक ही गति से नहीं उगते। मूंग और चना जल्दी फूटते हैं, गेहूं और जौ कुछ पीछे चलते हैं, तिल जैसे छोटे बीज अपनी गति से निकलते हैं। इसी कारण जंवारा में हरियाली कुछ बीजों की पहले और कुछ की बाद में दिखती है। खेत में भी फसलों का अपना अपना स्वभाव यही बताता है।
सप्तधान्य की सूची किसान की पूरी थाली और पूरी खेती का सार है। अनाज पेट भरते हैं, दलहन प्रोटीन देते हैं और अपनी जड़ों की गांठों में रहने वाले जीवाणुओं की मदद से मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाते हैं। तिलहन से तेल मिलता है। मोटे अनाज कम पानी वाले इलाकों में भी टिक जाते हैं। भारत सरकार के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित किया था। इससे इन अनाजों की चर्चा फिर तेज हुई, पर हमारी परंपरा में ये हमेशा से मौजूद थे। कंगनी जैसा दाना सप्तधान्य में इसी की याद दिलाता है।
जंवारे की बढ़वार को लेकर कई मान्यताएं हैं। कहीं घने और गहरे हरे जंवारे को शुभ माना जाता है, कहीं कहा जाता है कि पीले या कमजोर जंवारे अशुभ संकेत हैं। इन मान्यताओं का अपना लोक सांस्कृतिक महत्व है और उसका सम्मान होना चाहिए।
आज शहरों में पले बच्चों के लिए अन्न प्रायः दुकान के पैकेट में मिलने वाली वस्तु है। गेहूं की बाली कैसी होती है, जौ का पौधा कितना ऊंचा जाता है या मूंग का दाना मिट्टी में क्या करता है, यह देखने का मौका कम ही मिलता है। जंवारा यह कमी कुछ हद तक पूरी करता है। बच्चा रोज सुबह जंवारा देखता है, पानी डालता है, किस दिन कौन सा बीज फूटा यह गिनता है और पूरा चक्र अपनी आंखों से देखता है। पुराने समय में बड़े बुजुर्ग बिना किताब खोले यही शिक्षा परंपरा के बहाने दे देते थे। कृषि शिक्षक आज भी विद्यालयों में बीज अंकुरण के प्रयोग कराते हैं। घर में नवरात्र की वेदी यह प्रयोग बिना किसी प्रयोगशाला के करा देती है।
नवमी या दशमी के दिन जंवारे का विसर्जन होता है। कई जगह इसे नदी या तालाब में प्रवाहित किया जाता है, कई जगह परिवारजन प्रसाद के रूप में इसे सिर या कान पर रखते हैं, और कुछ स्थानों पर इसे पौधों की मिट्टी में मिला देते हैं। जिस मिट्टी और जल से अन्न उपजा, वह उसी में लौट जाता है। यह लौटना भी खेती के चक्र की याद दिलाता है, जहां कुछ भी बेकार नहीं जाता।
देवी को शक्ति कहा गया है और अन्न भी जीवन की शक्ति है। नवरात्र में देवी की उपासना के साथ धरती, जल और बीज के प्रति कृतज्ञता भी प्रकट होती है। जिससे जीवन चलता है, उसकी पूजा उपासना करना हमारी संस्कृति की सनातन परम्परा है।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
