“एक बीज जड़ों, तनों, शाखाओं, पत्तियों, फूलों और फलों के रूप में व्यक्त होता है, फिर भी हम बीज के माध्यम से उसकी एकता को पहचानते हैं।”
— पंडित दीनदयाल उपाध्याय
भारत की विकास यात्रा को केवल आर्थिक प्रगति के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। भारत की अपनी एक जीवन-दृष्टि है, जिसमें व्यक्ति, समाज, प्रकृति और राष्ट्र को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जाता। इसी भारतीय चिंतन को आधुनिक संदर्भ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने ‘एकात्म मानव दर्शन’ के रूप में प्रस्तुत किया। भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक अधिष्ठान की मूल प्रेरणा भी इसी दर्शन में निहित है।
जिस प्रकार एक बीज जड़, तना, शाखा, पत्ती, फूल और फल के रूप में अनेक रूपों में दिखाई देता है, लेकिन उसकी मूल एकता बनी रहती है, उसी प्रकार समाज में व्यक्ति, परिवार, ग्राम, राष्ट्र और संपूर्ण सृष्टि अलग-अलग दिखाई देते हुए भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। विकास की भारतीय दृष्टि इसी एकात्मता को स्वीकार करती है।
दीनदयाल जी के अनुसार मनुष्य केवल शरीर नहीं है। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वय से उसका व्यक्तित्व पूर्ण होता है। इसलिए विकास का लक्ष्य केवल भौतिक सुविधाओं की वृद्धि नहीं हो सकता। ऐसा विकास आवश्यक है जो व्यक्ति के जीवन में सुख और सम्मान लाए, समाज को सशक्त बनाए और प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करे।
इसी समग्र दृष्टि से ‘अंत्योदय’ का विचार सामने आता है—समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का उदय। वह व्यक्ति जिसके पास संसाधनों का अभाव है, जिसकी आवाज व्यवस्था तक आसानी से नहीं पहुंचती, उसके जीवन में सम्मान, सुरक्षा, अवसर और आत्मनिर्भरता लाना ही विकास की वास्तविक कसौटी है।
अंत्योदय में गरीब केवल किसी योजना का लाभार्थी नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सहभागी है। इसलिए लक्ष्य केवल सहायता पहुंचाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को सशक्त और स्वावलंबी बनाना है।
आज जनधन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी अनेक पहलें गरीब और वंचित वर्ग को मूलभूत सुविधाओं तथा अवसरों से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। इनका महत्व केवल सुविधा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। जब किसी गरीब परिवार को अपना घर मिलता है, स्वास्थ्य सुरक्षा मिलती है, बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंच मिलती है और मूलभूत आवश्यकताओं की चिंता कम होती है, तो उसके भीतर आत्मविश्वास और सम्मान की भावना मजबूत होती है।
लेकिन अंत्योदय की यात्रा सहायता पर समाप्त नहीं होती। उसकी अगली सीढ़ी है स्वावलंबन। व्यक्ति को ऐसी क्षमता और अवसर देना कि वह अपने श्रम, कौशल और सामर्थ्य से आगे बढ़ सके। इसी दृष्टि से दीनदयाल अंत्योदय योजना के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण परिवारों, विशेषकर महिलाओं को आजीविका और वित्तीय सशक्तिकरण से जोड़ने के प्रयास महत्वपूर्ण हैं। कौशल विकास और रोजगार से जुड़ी पहलें भी इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं।
ग्रामीण भारत में वीबी–जी राम जी जैसी पहल इस विचार को एक और आयाम देती है। यदि रोजगार को केवल मजदूरी तक सीमित न रखकर जल संरक्षण, सिंचाई, ग्रामीण आधारभूत संरचना और आजीविका से जुड़ी स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण से जोड़ा जाए, तो आज का श्रम आने वाले कल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की शक्ति बन सकता है। रोजगार के साथ गांव की उत्पादक क्षमता बढ़ाना अंत्योदय को स्वावलंबन से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है।
यहां दीनदयाल जी का स्थानीय स्वावलंबन और विकेंद्रीकरण का विचार भी प्रासंगिक हो जाता है। गांव का व्यक्ति अपने गांव में रोजगार पाए, स्थानीय संसाधनों का उपयोग हो, स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन मिले और गांव की अर्थव्यवस्था मजबूत हो—यह उस विकास दृष्टि का हिस्सा है जिसमें विकास ऊपर से नीचे तक पहुंचने वाली प्रक्रिया मात्र नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर उठने वाली जनभागीदारी भी है।
दीनदयाल जी की दृष्टि आर्थिक विकास से आगे बढ़कर सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकात्मता की भी दृष्टि है। भारतीय चिंतन में व्यक्ति और समाज के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि परस्पर पूरकता का भाव है। इसलिए विकास का अर्थ किसी एक वर्ग को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलना है।
आज भारत ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में विकास की कसौटी केवल बड़े उद्योग, आधुनिक तकनीक और आर्थिक वृद्धि नहीं हो सकती। ये आवश्यक हैं, लेकिन भारत की विकास दृष्टि इससे आगे जाती है। विकसित भारत वह होगा जहां अंतिम व्यक्ति के जीवन में भी परिवर्तन दिखाई दे; गरीब के पास सम्मानजनक आवास हो, युवा के पास कौशल और अवसर हों, महिला आत्मनिर्भर बने, किसान और श्रमिक सशक्त हों तथा गांव विकास की मुख्यधारा से मजबूती से जुड़े हों।
यही अंत्योदय से विकसित भारत तक की यात्रा है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और सृष्टि के बीच जिस एकात्म संबंध को समझाया, उसमें मनुष्य विकास का केंद्र है, लेकिन अकेला नहीं। उसका कल्याण समाज के कल्याण से और समाज का कल्याण राष्ट्र की शक्ति से जुड़ा है।
इसलिए अंत्योदय किसी एक योजना का नाम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की दृष्टि है। जब जनकल्याण अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, जब रोजगार स्वावलंबन से जुड़े, जब गांव स्थानीय संसाधनों और श्रम के आधार पर सशक्त हों और समाज का प्रत्येक वर्ग विकास में सहभागी बने, तब दीनदयाल जी का दर्शन केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जीवन और व्यवस्था में दिखाई देता है।
अंत्योदय का अर्थ अंतिम व्यक्ति को विकास की कतार में सबसे पीछे छोड़ देना नहीं, बल्कि उसे विकास की यात्रा का सहभागी बनाना है। और विकसित भारत का अर्थ है—इस यात्रा में कोई पीछे न छूटे।
यही पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों की प्रासंगिकता है और यही भारत की अपनी विकास-दृष्टि की शक्ति भी है।
– शताब्दी सुबोध पांडे,
प्रवक्ता प्रदेश भाजपा

