भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में उस दिन एक नया अध्याय जुड़ गया जब सुलभ और त्वरित न्याय की दिशा मे देश की शीर्ष अदालत में समाधान समारोह 2026 के तहत 21 से 23 अगस्त तक तीन दिवसीय विशेष लोक अदालत का आयोजन किया गया जिसमें वर्षों से लंबित मामलों का समाधान किया गया l इस पहल से उन मामलों का भी सौहार्दपूर्ण अंत हुआ जो कई दशकों से अदालत की फाइलों में उलझे हुए थे l आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में 96 हजार से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 10 हजार से ज्यादा मामले एक दशक से अधिक समय से फैसले की बाट जोह रहे थे। ऐसे में इस विशेष लोक अदालत ने कुल 3,285 सूचीबद्ध मामलों में से 1,712 मामलों का सफलतापूर्वक निपटारा किया, जिसमें 48 मामले मध्यस्थता के जरिये सुलझाए गए। इस दौरान कुल 240.94 करोड़ रुपये की राशि भी वितरित की गई।
लोक अदालत शब्द का अर्थ है पीपुल्स कोर्ट यह भारत में विवादों का शीघ्र, सरल और समझौते के आधार पर निपटारा करने की एक वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था है इसका उद्देश्य न्यायालय में लंबित मामलों का बोझ कम करना और पक्षकारों को कम खर्चे में तत्काल न्याय उपलब्ध कराना है,यह न्यायनिर्णयन की एक प्राचीन भारतीय प्रणाली है जो गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है lस्वतंत्र भारत की पहली लोक अदालत शिविर 1982 में गुजरात में आयोजित किया गया था जिसकी सफलता के बाद इसका पूरे देश में विस्तार हुआ l इसके पश्चात विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के द्वारा लोक अदालत को विधिक मान्यता प्रदान की गई l
भारतीय संविधान की प्रस्तावना प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी को सुनिश्चित करती है l भारतीय विधि व्यवस्था का यह सामान्य नियम है कि न्याय किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि दिखाना भी चाहिए कि न्याय हुआ है इसी व्यवस्था को लोक अदालत चरितार्थ करती है l न्याय का सिद्धांत कहता है कि देर से मिला हुआ न्याय अन्याय के बराबर है मूलतः इसी स्थिति से पार पाने के लिए भारतीय संविधान में 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा अनुच्छेद 39A जोड़ा गया जो सामन न्याय और निशुल्क विधिक सहायता के संबंध में प्रावधान करता है l इस अनुच्छेद को राज्य के नीति निर्देशक तत्व में जोड़कर यह स्पष्ट कर दिया गया कि यह राज्य की जवाबदारी होगी कि वह इस प्रकार की व्यवस्था बनाएं की आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई भी नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए l
इसी प्रकार वृहद जेल लोक अदालत राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) द्वारा जेलों में बंद विचाराधीन और छोटे-मोटी आपराधिक धाराओं के बंदियों के मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए आयोजित किया जाने वाला एक विशेष अभियान है। इसका मुख्य उद्देश्य जेलों में बंदियों की संख्या को कम करना और छोटे अपराधों में निरुद्ध कैदियों को शीघ्र न्याय व रिहाई का अवसर देना है। यह लोक अदालत न्यायालय परिसरों के बजाय सीधे केंद्रीय व जिला जेल के भीतर आयोजित की जाती है। इसमें शमनीय आपराधिक मामले, छोटे और मामूली अपराध,ऐसे विचाराधीन कैदी जो अपने द्वारा किए गए अपराध की अधिकतम सजा का एक बड़ा हिस्सा या आधी सजा पहले ही जेल में काट चुके हैं, इससे लंबे समय से छोटे मामलों में बंद कैदियों को तुरंत रिहाई मिलती है और समय व धन की बचत होती है। नियमित अदालतों पर लंबित मुकदमों का बोझ कम होता है और जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की समस्या से राहत मिलती है और जेल प्रबंधन सुगम होता है।
न्याय का आशय यह भी है, ‘न्याय संबंधी कानूनों का सही तरीके से लागू होना। अगर न्याय देने वाले कानूनों, व्यवस्थाओं का समुचित क्रियान्वयन किया जा रहा है तो उसे एक न्यायपूर्ण समाज कहा जाता है। समाज में न्याय को केवल कानूनों की सही व्याख्या और उनके पर्याप्त पालन से ही प्राप्त किया जा सकता है। हमें यह भी समझना होगा कि न्याय एवं निष्पक्षता निकट से जुड़े हुए शब्द हैं जिन्हें कभी-कभी एक दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त कर लिया जाता है।
देश में न्याय की स्थापना और संविधान की प्रस्तावना में दी गई न्याय की अवधारणा को साकार करने में न्यायपालिका ने खास भूमिका निभाई है जिसमे लोक अदालत एक महत्वपूर्ण तंत्र रहा है l इस संबंध में न्यायपालिका का दृष्टिकोण प्रगतिशील रहा है और इसने अपने निर्णयों के माध्यम से यह दर्शाया है कि न्याय एक विकसित और कानून का पालन करने वाले समाज का एक अनिवार्य घटक है।
डॉ. भूपेन्द्र करवन्दे
सहायक प्राध्यापक (विधि)
शासकीय जे. योगानन्दम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर
