चारों आश्रमों की आधारभूमि माता और मातृ नवमी

सुबह घर में दिन की शुरुआत अक्सर मां की आवाज से होती है। रसोई से आती अदरक कूटने की आवाज, बच्चों के लिए नाश्ते की तैयारी, पति की जरूरतों का ध्यान, बुजुर्गों की दवा और घर की छोटी बड़ी व्यवस्थाएं उसके आसपास चलती रहती हैं। जब तक मां घर में रहती है, शायद ही कोई सोचता है कि यह सब चल कैसे रहा है। मां का होना इतना स्वाभाविक लगता है कि उसकी भूमिका दिखाई नहीं देती। लेकिन जब मां नहीं रहती, तब पता चलता है कि घर से केवल एक सदस्य नहीं गया, घर की एक पूरी व्यवस्था चली गई।
भारतीय मनीषा ने मां को इसी व्यापक अर्थ में देखा है। माता केवल संतान को जन्म देने वाली स्त्री नहीं है। वह जीवन की पहली निर्माता है। शरीर उसके गर्भ से बनता है, संस्कार उसकी गोद से आते हैं और माथे पर भाग्य की पहली रेखाएं उसके सान्निध्य में खिंचती हैं। इसलिए “माता निर्माता भवति” भारतीय मातृत्व को समझने का सार्थक सूत्र है।
भारतीय जीवन दर्शन ने मनुष्य के जीवन को चार आश्रमों में देखने की व्यवस्था दी, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। इन्हें केवल जीवन की चार अवस्थाएं मानें तो माता की भूमिका सीमित दिखाई दे सकती है, लेकिन यदि इन्हें मनुष्य के क्रमिक निर्माण की यात्रा मानें तो चारों आश्रमों की आधारभूमि में मातृत्व की गहरी छाप दिखाई देती है।
ब्रह्मचर्य की पहली पाठशाला मां की गोद है। बालक गुरु के आश्रम में जाकर वेद, विद्या, अनुशासन और जीवन के कर्तव्य सीखता था, लेकिन गुरु के पास पहुंचने से पहले वह जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ घर में सीख चुका होता था। बोलना, चलना, भोजन करना, बड़ों का सम्मान करना, सत्य और असत्य का अंतर समझना तथा दूसरे के दुख के प्रति संवेदनशील होना, शिक्षा के आरंभिक संस्कार हैं। तैत्तिरीय उपनिषद का प्रसिद्ध उपदेश है,
“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।”
अर्थात माता को देवता के समान मानो, पिता को देवता के समान मानो, आचार्य को देवता के समान मानो और अतिथि को देवता के समान मानो।
यह क्रम भी विचारणीय है। गुरु ज्ञान को व्यवस्थित करता है, लेकिन सीखने की पहली प्रवृत्ति परिवार में पैदा होती है। इस अर्थ में मां औपचारिक शिक्षा से पहले ही ब्रह्मचर्य की आधारभूमि तैयार कर देती है।
गृहस्थ आश्रम में मातृत्व जीवन के विस्तार का केंद्र बनता है। भारतीय आश्रम व्यवस्था में गृहस्थ को विशेष महत्व दिया गया, क्योंकि परिवार और समाज की आर्थिक व्यवस्था का बड़ा दायित्व उसी पर था। मनुस्मृति में माता के गौरव को अत्यंत ऊंचा स्थान दिया गया है,
“उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते॥”
इसका आशय कोई तुलना करना नहीं, बल्कि माता के प्रति सर्वोच्च सम्मान की अभिव्यक्ति है। जिस स्त्री ने जीवन को जन्म दिया और उसे संस्कारों से आकार दिया, उसके प्रति कृतज्ञता भारतीय परंपरा में गहरी रही है।
वानप्रस्थ में मातृत्व का दूसरा रूप दिखाई देता है। वानप्रस्थ का अर्थ केवल वन चले जाना नहीं था। यह जीवन की उस अवस्था का संकेत था जब व्यक्ति धीरे धीरे सांसारिक उत्तरदायित्व अगली पीढ़ी को सौंपते हुए आत्मचिंतन की ओर बढ़ता है।
बचपन में मां बच्चे को अपने पास रखती है, उसकी आवश्यकताएं पूरी करती है और उसे सुरक्षित वातावरण देती है। समय आने पर वही मां उसे अपने पैरों पर खड़ा होना भी सिखाती है। निर्णय लेने देना, जिम्मेदारी सौंपना और अपनी भूमिका धीरे धीरे पीछे करना भी मातृत्व का हिस्सा है।
जिस बच्चे को कभी मां ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, एक दिन वही परिवार की जिम्मेदारी संभालता है। इस परिवर्तन के पीछे वर्षों का मातृ संस्कार होता है। इसलिए वानप्रस्थ केवल व्यक्ति की व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच उत्तरदायित्व के हस्तांतरण की प्रक्रिया भी है।
संन्यास तक पहुंचने वाला मनुष्य भी उसी परिवार और संस्कार संसार से निकलता है। भारतीय दर्शन में संन्यास मोह, अहंकार और सांसारिक आसक्ति से ऊपर उठकर आत्मबोध की दिशा में जाने का प्रयास है। संन्यास लेने वाला संसार से घृणा नहीं करता, बल्कि संबंधों के मोह से ऊपर उठने का प्रयत्न करता है।
इस प्रकार चारों आश्रमों को एक साथ देखें तो मातृत्व एक निरंतर धारा के रूप में दिखाई देता है। ब्रह्मचर्य में मां संस्कार देती है, गृहस्थ में अगली पीढ़ी का निर्माण करती है, वानप्रस्थ में उत्तरदायित्व सौंपने योग्य बनाती है और संन्यास की दिशा में जाने वाले मनुष्य के भीतर त्याग तथा संयम की प्रारंभिक भूमि तैयार करती है। महाभारत के यक्ष प्रश्न प्रसंग में कहा गया है,
“माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा।”
अर्थात माता पृथ्वी से भी भारी और पिता आकाश से भी ऊंचे हैं। यहां भारी होने का अर्थ बोझ नहीं, बल्कि गौरव और महत्ता है। पृथ्वी जिस प्रकार सबको धारण करती है, मां भी जीवन को धारण करती है।
इसीलिए प्रश्न उठता है कि पितृ पक्ष में माता के लिए विशेष स्मरण की आवश्यकता क्यों पड़ी। पितृ पक्ष भारतीय परंपरा में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय है। सामान्य रूप से जिस पितर की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, उस तिथि पर श्राद्ध करने की परंपरा है। पितृ पक्ष की नवमी को नवमी श्राद्ध कहा जाता है। लोक परंपरा में यही दिन मातृ नवमी के रूप में माता, दादी, नानी और अन्य दिवंगत स्त्री पूर्वजों के स्मरण से विशेष रूप से जुड़ा है।
इस परंपरा का संदेश महत्वपूर्ण है। परिवार की परंपरा और वंश की निरंतरता केवल पुरुष पूर्वजों से नहीं बनती। परिवार के भीतर जीवन, संस्कार, संबंध और संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी पहुंचाने में मातृ शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए मातृ नवमी उस ऋण को याद करने का अवसर है जिसे सामान्य जीवन की व्यस्तता में हम अक्सर भूल जाते हैं।
मां के हाथ का भोजन, बीमारी में माथे पर रखा उसका हाथ, परीक्षा के दिनों में देर रात तक जागना, बाहर गए बच्चे की राह देखना और विवाह के बाद भी उसकी चिंता करते रहना, इन अनुभवों का कोई हिसाब नहीं होता। मां जीवन भर देती रहती है और बदले में बहुत कम मांगती है। उसके जाने के बाद घर की वस्तुएं वही रहती हैं, लेकिन घर का अर्थ बदल जाता है।
श्राद्ध का अर्थ केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है। उसके भीतर कृतज्ञता का भाव भी है। तर्पण और अन्न अर्पण हमें यह स्वीकार करने का अवसर देते हैं कि हमारा वर्तमान केवल हमारे अपने श्रम का परिणाम नहीं है। हमारे पीछे अनेक लोगों का प्रेम, श्रम, त्याग और आशीर्वाद है। मातृ नवमी इसी कृतज्ञता को मातृ पक्ष की ओर विशेष रूप से मोड़ती है।
“माता निर्माता भवति।”
मां शरीर की निर्माता है, संस्कारों की निर्माता है, परिवार की निर्माता है और समाज के लिए मनुष्य की निर्माता है। चारों आश्रमों की यात्रा में मनुष्य बदलता रहता है, उसकी जिम्मेदारियां बदलती रहती हैं, उसका जीवन दृष्टिकोण बदलता रहता है, लेकिन उसके व्यक्तित्व की पहली आधारभूमि वही रहती है जहां से उसने जीवन का पहला पाठ सीखा था।
मां चली जाती है, लेकिन उसके दिए संस्कार ब्रह्मचर्य से गृहस्थ, गृहस्थ से वानप्रस्थ और वानप्रस्थ से संन्यास तक मनुष्य के साथ चलते रहते हैं। मातृ नवमी इसी निरंतरता को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करने का अवसर है। यह केवल दिवंगत माताओं को याद करने की तिथि नहीं, बल्कि उस मातृ शक्ति के प्रति कृतज्ञ होने का दिन है जिसने हमारे जीवन की पहली सीढ़ी बनाई।
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

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